संकट में फल्‍गू का अस्तित्‍व

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माता सीता के शाप से शापित होने के बावजूद पौराणिक काल से पितरों को मोक्ष दिलाती आ रही गया की पवित्र फल्गू नदी का वजूद आज ख़तरे में है. देश-विदेश से लाखों लोग प्रति वर्ष इसे नमन करने आते हैं. यह नदी मगध के लोगों की जीवनरेखा है, लेकिन विगत कुछ वर्षों से इसमें शहर भर का कूड़ा-कचरा फेंका जा रहा है. यही नहीं, 15 बड़े नालों का गंदा पानी भी इसे प्रदूषित कर रहा है, जिसके चलते भू-क्षरण, भूगर्भ जल के विनाश, पर्यावरण असंतुलन और प्रदूषण की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है. फल्गू नदी की गिनती देश की पौराणिक नदियों में की जाती है. प्रमुख धर्मग्रंथों जैसे वायु पुराण, अग्नि पुराण और महाभारत में इस नदी की चर्चा है. वायु पुराण में इसे फल्गू तीर्थ के नाम से जाना जाता है. अग्नि पुराण में इसे देविका या आकाश गंगा कहा गया है, जबकि महाभारत में इसका नाम महानदी है. इसकी अनेक शाखाएं थीं, जो ब्रह्मयोनि पहाड़ी से निकल कर पूरब की ओर छोटी-छोटी सरिताओं के रूप में बहकर फल्गू में मिलती थीं. इसमें धृत कुल्या, दही कुल्या एवं मधु कुल्या प्रमुख थीं. इसके अलावा कपिला और आकाश गंगा भी थीं. लेकिन इनका स्थान अब सड़क के छोटे-बड़े नालों ने ले लिया है. फल्गू नदी को अंत:सलिला भी कहा जाता है. इस नदी में 40 फिट की गहराई तक पानी रहता है.

पितरों को मोक्ष दिलाने वाली फल्गू नदी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. इस स्थिति के लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों ज़िम्मेदार हैं. शहर के पंद्रह नालों का गंदा पानी इस नदी में गिर रहा है. कूड़ा-कचरा भी इसी में फेंका जा रहा है, जिससे इसका पानी प्रदूषित हो रहा है. अगर समय रहते ध्यान न दिया गया तो इसका अस्तित्व मिट जाएगा.

फल्गू नदी दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है और गया शहर को पूरब से घेरती है. यह झारखंड के छोटा नागपुर के पहाड़ी भाग से मोहाने एवं लीलाजन नदी के रूप में निकल कर बोधगया के उत्तरी भाग में एक-दूसरे से मिलकर निरंजना से फल्गू बनती है. यह नदी पूरी तरह बरसाती है, जो बरसात के दिनों में जल से भरी रहती है, लेकिन बाद के महीनों में नदी सूखी रहती है. यह नदी आगे जाकर पुनपुन में मिल जाती है. फल्गू नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर के दर्शन एवं पिंडदान करने के लिए हज़ारों तीर्थ यात्री यहां प्रतिदिन आते हैं. स्थानीय लोगों के लिए फल्गू नदी का स़िर्फ धार्मिक ही नहीं, सामाजिक, आर्थिक, कृषि, सिंचाई एवं पर्यावरण आदि की दृष्टि से भी काफी महत्व है. लेकिन हाल के कुछ वर्षों से फल्गू नदी की ज़मीन पर धड़ल्ले से अतिक्रमण किया जा रहा है. जलस्रोत तेज़ी से घट रहे हैं. प्रतिदिन लाखों लीटर गंदा पानी इस नदी को अपवित्र कर रहा है. विष्णुपद मंदिर के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र से लेकर कंडी नवादा तक कूड़े-कचरे का अंबार लगा हुआ है. गया का महाश्मशान भी मंदिर के किनारे ही स्थित है. यहां प्रतिदिन दर्ज़नों लाशें जलाई जाती हैं और उनकी राख फल्गू में प्रवाहित कर दी जाती है. इसका सीधा असर यहां के लोगों के साथ-साथ पर्यटन, कृषि, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर पड़ रहा है. इस नदी से गया शहर, मानपुर, सेना सेवाकोर (उत्तर), अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज एवं मगध विश्वविद्यालय बोधगया आदि क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति की जाती है. बताया जाता है कि जब सुरेश प्रभाकर प्रभु केंद्रीय मंत्री थे तो उन्होंने इंटरबेसिन वाटर ट्रांसफर लिंक्स के तहत फल्गू नदी को जल से लबालब करने की रूपरेखा बनाई थी. उन्होंने तकनीकी विशेषज्ञों को इसके लिए योजना तैयार करने को कहा था. योजना के अनुसार सोन बैराज का पानी दक्षिणी वितरणी के माध्यम से फल्गू नदी में पहुंचाया जाना था. इस योजना के लागू हो जाने से फल्गू में हमेशा पानी उपलब्ध रहता. योजना को राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण की भी मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन सुरेश प्रभु के पद से हटते ही यह योजना खटाई में पड़ गई. गया शहर के विधायक एवं सूबे के तत्कालीन पीएचईडी मंत्री प्रेम कुमार ने पाइप लाइन के सहारे गंगा का पानी फल्गू में लाकर इसे और पवित्र बनाने की घोषणा की थी, लेकिन राज्य के मुखिया की अनुमति के बिना इतनी बड़ी घोषणा करना प्रेम कुमार को महंगा पड़ा. मुख्यमंत्री ने घोषणा पर आपत्ति जता दी. नतीजतन मंत्री को चुप रहना पड़ा.

फल्गू नदी दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है और गया शहर को पूरब से घेरती है. यह झारखंड के छोटा नागपुर के पहाड़ी भाग से मोहाने एवं लीलाजन नदी के रूप में निकल कर बोधगया के उत्तरी भाग में एक-दूसरे से मिलकर निरंजना से फल्गू बनती है.

अब पुन: एक बार फल्गू नदी को प्रदूषण मुक्त करके उसके अस्तित्व को बचाने के लिए राज्य सरकार की ओर से पहल की गई है. गया ज़िला पदाधिकारी से मुख्यमंत्री सचिवालय ने नदी से जुड़े विभिन्न पहलुओं की रिपोर्ट मांगी है. ज़िला पदाधिकारी संजय कुमार सिंह ने फल्गू नदी की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दी है. देखना यह है कि पितरों को मोक्ष दिलाने वाली पौराणिक फल्गू नदी को सरकार मोक्ष दिला पाती है या नहीं.

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