सस्‍ता कोयला देने वालों पर कसा शिंकजा

सीसीएल द्वारा फर्ज़ी फैक्ट्रियों को लिंकेज के तहत सस्ते दामों पर कोयला आपूर्ति करने के मामले की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है. जांच से इस धंधे में शामिल उद्यमियों में खलबली मच गई है. इस संबंध में सीबीआई ने सीसीएल मुख्यालय के महाप्रबंधक (सेल्स) के खिला़फ न केवल मामला दर्ज किया है, बल्कि सीबीआई ने अधिकारियों के ठिकानों पर छापेमारी कर गड़बड़ी का पता लगाने की कोशिश शुरू कर दी है. सीबीआई की इस कार्रवाई से सीसीएल के विक्रय विभाग एवं कोयला कारोबारियों में खलबली मच गई है. हालांकि भ्रष्टाचार और अनियमितता के मामलों पर नज़र रखने और इस संबंध में कार्रवाई करने के लिए सीसीएल में अलग से निगरानी विभाग है, लेकिन उसकी निष्क्रियता के चलते ऐसे मामलों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. लिहाज़ा इस मामले को सीबीआई ने अपने हाथ में ले लिया. देश भर में कोयला आधारित उद्योगों को सीसीएल करीब 1200 रुपये मीट्रिक टन की दर से लिंकेज के माध्यम से प्रतिमाह एक निश्चित मात्रा में कोयला उपलब्ध कराती है. इस कोयले की कीमत खुले बाज़ार में दोगुने से भी अधिक है. ऐसे में सीसीएल के विक्रय विभाग के अफसरों की मिलीभगत से ऐसे उद्योगों को भी कोयले की आपूर्ति की जा रही थी, जिनका धरातल पर कोई अस्तित्व नहीं है.

देश भर में कोयला आधारित उद्योगों को सीसीएल करीब 1200 रुपये मीट्रिक टन की दर से लिंकेज के माध्यम से प्रतिमाह एक निश्चित मात्रा में कोयला उपलब्ध कराती है. इस कोयले की कीमत खुले बाज़ार में दोगुने से भी अधिक है. ऐसे में सीसीएल के विक्रय विभाग के अफसरों की मिलीभगत से ऐसे उद्योगों को भी कोयले की आपूर्ति की जा रही थी, जिनका धरातल पर कोई अस्तित्व नहीं है. रामगढ़ ज़िले में भी कई ऐसे उद्योग हैं, जो सीसीएल से सस्ते दरों पर लिंकेज के माध्यम से कोयला प्राप्त कर बाज़ार में उसे ऊंची कीमतों पर बेचते हैं और इससे भारी मुना़फा कमाते हैं, जबकि खदानों के अगल-बगल स्थित उद्योगों को कोयला नहीं मिल पाता.

रामगढ़ ज़िले में भी कई ऐसे उद्योग हैं, जो सीसीएल से सस्ते दरों पर लिंकेज के माध्यम से कोयला प्राप्त कर बाज़ार में उसे ऊंची कीमतों पर बेचते हैं और इससे भारी मुना़फा कमाते हैं, जबकि खदानों के अगल-बगल स्थित उद्योगों को कोयला नहीं मिल पाता. रामगढ़ स्थित झारखंड सरकार का बिजली संयंत्र कोयले के अभाव में दम तोड़ रहा है. रामगढ़ ज़िले के भुरकुंडा में स्थित देश के प्रथम शीशा उद्योग को लिंकेज से कोयला लेने में पसीने छूट गए, लेकिन फर्ज़ी फैक्ट्रियों के नाम पर इस धंधे से जुड़े लोग आसानी से कोयला प्राप्त कर रहे हैं. सीबीआई अभी सीसीएल के अधिकारियों की भूमिका की जांच कर रही है. जांच के दायरे में कई उद्यमी भी आ सकते हैं.

दस साज में पौने दो लाख कर्मी कम हुए

सार्वजनिक क्षेत्र की होल्डिंग कंपनी के रूप में वर्ष 1975 में अस्तित्व में आए कोल इंडिया लिमिटेड एवं उसकी सहायक कंपनियों के कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने से उनकी संख्या में तेज़ी से कमी आ रही है. पिछले दस सालों में कोल इंडिया एवं उसकी सहायक कंपनियों से 1,65,729 कर्मियों को निकाला गया. अप्रैल 2000 में कोल इंडिया एवं उसकी सहायक कंपनियों में 5,67,071 कर्मी थे, लेकिन अप्रैल 2010 में कर्मियों की संख्या घटकर 3,96,342 हो गई. सूत्रों के मुताबिक़, कोल इंडिया में हर वर्ष औसतन 16 हज़ार कर्मी सेवानिवृत्त हो रहे हैं या वीआरएस लेकर नौकरी से अलग हो रहे हैं. कोल इंडिया की एक प्रमुख सहायक कंपनी सीसीएल में पिछले दस सालों में 27 हज़ार कर्मी कम हुए हैं. सत्तर के दशक में जब कोयला उद्योग का सरकार ने अधिग्रहण किया था तो यहां कर्मियों की संख्या आठ लाख के करीब थी और देश में रेलवे के बाद कोयला उद्योग में ही सबसे ज़्यादा कर्मचारी थे. सरकारीकरण के समय ज़्यादातर कर्मी या तो सेवानिवृत्त हो गए या सेवानिवृत्ति के क़रीब थे, जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में कोल इंडिया एवं उसकी सहायक कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या घटकर दो से ढाई लाख के बीच रह जाएगी. ऐसे में उत्पादन की गति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त कर्मियों की ज़रूरत पड़ेगी. देश में ऊर्जा की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती बन सकती है. मज़दूर संगठनों खासतौर से वामदलों के संगठनों का कहना है कि सरकार अब कोयला उद्योग को निजी हाथों में सौंपने की साज़िश कर रही है. वैसे कोल इंडिया के विनिवेश को सरकार की हरी झंडी मिल गई है. सरकार कोल इंडिया की दस फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी और इससे 12,000 करोड़ की पूंजी जुटाएगी. सब कुछ ठीकठाक रहा तो इस वर्ष सितंबर तक कोल इंडिया का आईपीओ आ जाएगा. हालांकि मज़दूर संगठन इसका जमकर विरोध कर रहे हैं. सरकार ने एक फीसदी शेयर कोल इंडिया एवं उसकी सहायक कंपनियों के कर्मियों के लिए सुरक्षित किए हैं और उन्हें पांच फीसदी छूट देने का भी ऐलान किया है. हालांकि कोल इंडिया के विनिवेश के बाद भी उसकी 90 फीसदी हिस्सेदारी सरकार के पास होगी, लेकिन मज़दूर संगठनों को आशंका है कि सरकार धीरे-धीरे कोल इंडिया को निजी हाथों में सौंप देगी.