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यह पाकिस्तान की मजबूरी है

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एक महीने पहले जब मैंने यह लिखा था कि पाकिस्तान में सेना दस्तक दे रही है तो कई लोगों ने आश्चर्य जताया. दरअसल सारे संकेत इस ओर इशारा कर रहे थे कि सितंबर महीने तक सेना सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाएगी. इसी बीच प्रधानमंत्री गिलानी ने जल्दबाज़ी में आयोजित देश के नाम संबोधन में कयानी को तीन साल का सेवा विस्तार देने की घोषणा कर दी. दरअसल, गिलानी का यह क़दम देश की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के लिए एक मजबूरी था और निश्चित लग रहे सैन्य तख्ता पलट को टालने का ज़रिया भी.

कयानी पाकिस्तानी सेना के उस धड़े से जुड़े हैं, जो आईएसआई के साथ मिलकर आतंकी संगठनों को बढ़ावा देता है. सैन्य तख्ता पलट की इस योजना में कयानी को पाक सेना के साथ आतंकी संगठनों, कट्टरवादी राजनीतिक पार्टियों और अमेरिका का भी समर्थन हासिल था. ऐसी हालत में गिलानी सरकार के सामने अपने अस्तित्व का संकट खड़ा था और उसे कयानी को तीन साल का सेवा विस्तार देने के लिए मजबूर होना पड़ा.

सेना में स्थिरता पाकिस्तान की ज़रूरत है. वर्तमान सरकार अपने कार्यकाल के बीच में किसी दूसरे सेनाध्यक्ष पर भरोसा नहीं कर सकती. जनरल कयानी को नवंबर में रिटायर होना था. सरकार अगर किसी और को जनरल नियुक्त करती तो दो स्थितियां पैदा हो सकती थीं. जनरल कयानी या तो करामात की तरह बाइज़्ज़त कुर्सी छोड़ देते या फिर मुशर्ऱफ की तरह सर्वशक्तिमान बन जाते. अगर वह कुर्सी छोड़ देते तो नवंबर के बाद नया सेनाध्यक्ष क्या करता, यह कोई नहीं जानता. ऐसी परिस्थिति बन सकती थी, जो पाकिस्तान की सरकार के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी मुश्किलें पैदा करती. इस मायने में यह फैसला एक मास्टर स्ट्रोक है. इस फैसले से पाकिस्तान की सरकार के साथ-साथ अमेरिका को भी फायदा मिलेगा. जनरल कयानी के लिए अच्छी बात यह है कि पाकिस्तान की जनता उन्हें प्रजातंत्र के समर्थक के रूप में जानती है. उन्हें प्रजातंत्र के लिए ख़तरा नहीं मानती. यह फैसला अमेरिका के लिए इसलिए फायदेमंद है, क्योंकि जनरल कयानी ने जनरल मुशर्रफ से बेहतर तरीक़े से स्वात और दक्षिण वजीरिस्तान में आतंकवादियों के ख़िला़फ लड़ाई लड़ी है.

घटना पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच हुई वार्ता की है. भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा का पाक प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी के साथ मिलने का कार्यक्रम तय था. इसी बीच सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी गिलानी से मिलने पहुंचे और कृष्णा के साथ उनकी मीटिंग को टाल दिया गया. यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि पाकिस्तान में सत्ता का केंद्र कहां स्थित है. सच्चाई तो यह है कि कयानी को सेवा विस्तार न मिलता तो पाकिस्तान में सैन्य तख्ता पलट की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी. पाकिस्तान में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सेना प्रमुख को किसी चुनी हुई सरकार द्वारा सेवा विस्तार हासिल हुआ है. हालात इसी ओर इशारा करते हैं कि सरकार ने यह फैसला अपनी मर्ज़ी से नहीं लिया. गिलानी ने यह निर्णय अमेरिकी दबाव में लिया है.

अ़फग़ानिस्तान में तालिबान और अलक़ायदा के ख़िला़फ जारी कार्रवाई में पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण है और अमेरिका यह नहीं चाहता कि उसमें कोई खलल पड़े. पाकिस्तान में अगले आम चुनाव 2013 में संभावित हैं और अमेरिका की इच्छा यही है कि अगली सरकार ऐसी हो, जो उसके मुताबिक़ काम करे. इस लिहाज़ से कयानी की भूमिका काफी अहम है. पाकिस्तान की अंदरूनी हालत अच्छी नहीं है. देश भर में हो रही आतंकी वारदातों, फर्ज़ी डिग्री घोटाले और हत्या की साजिश में केंद्रीय मंत्री की संलिप्तता की ख़बरों के चलते आम जनता निराश है. देश के अधिकांश हिस्सों में क़ानून और व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है. जनता राजनीतिक नेतृत्व से निराश है, न्यायपालिका देश की हालत से ज़्यादा अपनी शक्तियों को लेकर फिक्रमंद है. कयानी ने इस मौक़े का भरपूर फायदा उठाया. वह सामने नहीं थे, लेकिन सत्ता का सूत्र उन्हीं के हाथों में था. भारत के साथ संबंधों की बात हो या अ़फग़ानिस्तान में जारी संघर्ष, पर्दे के पीछे सारे फैसले सेना ही ले रही है. कयानी ने पहले तो गिलानी और ज़रदारी के बीच जंग को हवा दी और आज ऐसी हालत में हैं कि बिना किसी ज़िम्मेदारी के सत्ता के शीर्ष पर बने हुए हैं.

कयानी के सेवा विस्तार को केवल सैन्य मामलों से संबंधित एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में देखना ग़लत होगा, क्योंकि एक तो पाकिस्तान के मौजूदा हालात और दूसरा ख़ुद कयानी का पिछला रिकॉर्ड इसकी गवाही नहीं देते. अपने पूरे करियर में कयानी हमेशा मुल्क के राजनीतिक नेतृत्व के साथ अपनी निकटता बनाए रखने में कामयाब रहे हैं, चाहे वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो. बदलते राजनीतिक माहौल के साथ अपनी प्रतिबद्धताएं बदलने में उनका कोई सानी नहीं. वह बेनजीर भुट्टो के प्रधानमंत्रित्व काल में डिप्टी मिलिट्री सेक्रेटरी हुआ करते थे तो परवेज़ मुशर्ऱफ की सैन्यशाही के दौर में उनके निकटतम सहयोगियों में शामिल थे, जबकि भुट्टो परिवार के प्रति मुशर्ऱफ की ऩफरत किसी से छुपी नहीं है.

सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चौधरी की पुनर्बहाली को लेकर आंदोलन कर रहे पीएमएल-एन के नेता नवाज़ शरी़फ को इस्लामाबाद मार्च से रोकने में भी उनकी ही भूमिका सबसे अहम थी. पिछले तीन सालों के दरम्यान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष राष्ट्रपति ज़रदारी और उनकी ही पार्टी के प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी के बीच जारी सत्ता संघर्ष को बढ़ावा देने में भी उन्होंने अपनी भूमिका बख़ूबी निभाई. इस बीच कयानी अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के साथ भी अपनी नज़दीकियां बढ़ाने में कामयाब रहे और सेवा विस्तार के इस फैसले के पीछे भी अमेरिकी दबाव की बात सभी मानते हैं. इसके अलावा यह भी एक सच्चाई है कि कयानी पाकिस्तानी सेना के उस धड़े से जुड़े हैं, जो आईएसआई के साथ मिलकर आतंकी संगठनों को बढ़ावा देता है. सैन्य तख्ता पलट की इस योजना में कयानी को पाक सेना के साथ आतंकी संगठनों, कट्टरवादी राजनीतिक पार्टियों और अमेरिका का भी समर्थन हासिल था. ऐसी हालत में गिलानी सरकार के सामने अपने अस्तित्व का संकट खड़ा था और उसे कयानी को तीन साल का सेवा विस्तार देने के लिए मजबूर होना पड़ा.

इसमें कोई संदेह नहीं कि कयानी का सेवा विस्तार पाकिस्तान का एक अंदरूनी मामला है, लेकिन इसके राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं की अनदेखी नहीं की जा सकती. ख़ासकर, भारत के परिप्रेक्ष्य में सेना प्रमुख के रूप में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है. वह जेहनी तौर पर भारत विरोधी रहे हैं. अ़फग़ानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित हक्कानी नेटवर्क द्वारा भारत के हितों को ठेस पहुंचाने की कोशिशें कयानी की सरपरस्ती में ही अंजाम दी जा रही हैं. वह लश्करे तैयबा के ख़िला़फ कार्रवाई की राह में भी रोड़े अटकाते रहे हैं. पिछले दिनों पाकिस्तान में हुए संवैधानिक सुधारों के बाद यह धारणा बनने लगी थी कि मुल्क में सेना के मुक़ाबले सरकार की हालत मज़बूत हुई है. सार्क सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी के बीच हुई बातचीत में जब आतंकवाद के अलावा अन्य मुद्दों पर भी विचार-विमर्श करने की सहमति बनी थी तो उसकी पृष्ठभूमि में भी यही धारणा थी. लेकिन पिछले महीने दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई वार्ता जिस तरह से टांय-टांय फिस्स साबित हुई, उसे देखकर तो यही लगता है कि पाकिस्तानी सेना भारत के साथ बातचीत और मतभेदों को सुलझाने के लिए तैयार नहीं है. कयानी की मौजूदगी के नजरिए से भारत इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकता. सबसे ज़्यादा ख़तरा पाकिस्तान को है, क्योंकि अमेरिका के साथ जनरल कयानी की नज़दीकियां इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि पाकिस्तानी सेना अब उत्तरी वजीरिस्तान में भी युद्ध शुरू करने वाली है.

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