आज़ादी के 63 बरसों बाद भी बेगाने

हमारे मुल्क के नीति नियंता किस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी और बिना दूरअंदेशी से अपनी नीतियां बनाते हैं, इसका एहसास हमें अभी हाल में आए शत्रु संपत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण विधेयक का हश्र देखकर होता है. हिंदुस्तानी मुसलमानों की ज़मीन-जायदाद से सीधे-सीधे जुड़े इस संवेदनशील विधेयक, जिस पर मुल्क भर में बहुत विचार-विमर्श की ज़रूरत थी, को गोया इस तरह पेश करने की तैयारी थी, मानो यह कोई मामूली विधेयक हो. जुलाई में सरकार द्वारा इस संबंध में अध्यादेश लाए जाने के बाद से ही मुसलमानों में सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. बहरहाल इस फैसले की भनक लगते ही कि सरकार इस संसद सत्र में विधेयक संसद में लाएगी, मुख़तल़िफ सियासी पार्टियों के अल्पसंख्यक समुदाय के सांसद सक्रिय हुए और उन्होंने जब इस विधेयक को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अपना विरोध जताया, तब जाकर यह विधेयक टला. वरना विधेयक को इसी सत्र में पारित कराने की पूरी-पूरी तैयारी थी. ज़ाहिर है, सरकार के इस क़दम से मुल्क में रह रहे उन लाखों मुसलमानों ने राहत की सांस ली, जिनके अपने बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे. विधेयक के टलने से जहां पाकिस्तान चले गए लोगों की संपत्ति पर हिंदुस्तान में रह रहे उनके वारिस अपना हक़ जता सकेंगे, वहीं जो लोग इन संपत्तियों पर बरसों से काबिज़ हैं, उन्हें भी बेदख़ल नहीं किया जा सकेगा.

आज़ाद हिंदुस्तान में यह कोई पहली बार नहीं है, जब मुसलमानों को अपनी सरजमीं में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ी हो, बल्कि मुल्क की आज़ादी के बाद हिंदुस्तानी मुसलमानों के ऊपर सबसे पहले जो बिजली गिरी, वह थी उनके उद्योग, व्यापार, दुकान, मकान, ज़मीन, जायदाद और संपदा का हरण. इस बिना पर कि वे या उनके परिवार के सदस्य पाकिस्तान चले गए. ऐसा निष्क्रांत संपत्ति क़ानून के तहत किया गया, जो मुल्क में आज़ादी के तुरंत बाद अमल में आ गया था.ज़ाहिर है, इस तरह हज़ारों-लाखों परिवार कंगाल हो गए. सांप्रदायिक दंगों की वजह से जिन्होंने मजबूरी में देश बदला या स़िर्फ अपने रिश्तेदारों से मिलने पाकिस्तान गए, उनकी संपत्तियों को सरकार ने ज़ब्त कर लिया.

ग़ौरतलब है कि 1965 में सरकार ने मुल्क में बाक़ायदा एक अधिसूचना जारी कर यह बंदोबस्त किया था कि जो लोग पाकिस्तान चले गए हैं, उनकी संपत्तियां अब उनकी न रहकर अभिरक्षा शत्रु संपत्ति के अधीन रहेंगी और उन पर अब किसी का कोई मालिकाना हक नहीं होगा. ज़ाहिर है, सरकार की इस अधिसूचना के बाद उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, दिल्ली, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की करोड़ों रुपये की संपत्ति सरकार ने शत्रु संपत्ति मानकर अपने क़ब्ज़े में ले ली. सरकार के इस फैसले से सबसे ज़्यादा नुक़सान उन हिंदुस्तानी मुसलमानों को हुआ, जिन्होंने मुल्क के बंटवारे के बाद हिंदुस्तान को चुना था. वे रातोंरात अपने पुरखों की ज़मीन-जायदाद से बेदख़ल हो गए. बावजूद इसके कुछ लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और इंसा़फ के लिए अदालतों के दरवाजे खटखटाए. मुल्क की मुख़तल़िफ अदालतों में चले इन मुक़दमों में सरकार कई मामलों में हार गई. ज़ाहिर है, अदालत में अपनी लगातार शिकस्त से आजिज़ आकर ही सरकार ने शत्रु संपत्ति क़ानून 1968 को संशोधित करने का फैसला किया और मौजूदा विधेयक इसी से मुताल्ल़िक था.

ताजा विवाद राजा महमूदाबाद की उन जायदादों को लेकर शुरू हुआ, जिन्हें सरकार ने शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया था. इसकी लड़ाई महमूदाबाद के वारिस राजा मोहम्मद अमीर ख़ान ने सरकार से लड़ी. बहरहाल, तीन दशक की लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने महमूदाबाद के वारिस के हक़ में फैसला दिया. साल 2005 में आए इस फैसले के बाद न स़िर्फ महमूदाबाद की करोड़ों की संपत्ति उनके वारिस को मिल गई, बल्कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश से उन सैकड़ों मुसलमानों को भी फायदा हुआ, जो बंटवारे के बाद हिंदुस्तान में रह गए थे. उनके पुरखों की ज़मीन-जायदाद पर उन सभी लोगों के हक़ को मानते हुए सुप्रीमकोर्ट ने उसे शत्रु संपत्ति न मानते हुए अपने आदेश से वापस दिलवाया, जिसका मुल्क में हर ओर से ख़ैरमक़दम किया गया. ज़ाहिर है, सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद इस तरह के सभी मामलों पर विराम लग जाना चाहिए था, लेकिन आदेश के 5 साल बाद सरकार फिर उसी जिन्न को दोबारा बाहर निकाल लाई, जो कभी का दफन हो चुका था. सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद इस तरह के ग़ैर मुनासिब और ग़ैर ज़रूरी अध्यादेश की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी.

दरअसल हमारे मुल्क की सत्ता में आज़ादी के बाद से ही एक ऐसा वर्ग रहा है, जो मुसलमानों के ख़िला़फ साज़िशें बुनता रहता है. इतने सालों के बाद भी मुसलमानों के प्रति उनके सांप्रदायिक पूर्वाग्रह ज्यों के त्यों बने हुए हैं. उन हिंदुस्तानी मुसलमानों, जो 63 साल से इस मुल्क में एक अच्छे शहरी बनकर गुजर-बसर कर रहे हैं, के पुरखों की संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित करना कहां तक सही है. जहां तक राजा महमूदाबाद की संपत्ति का सवाल है तो राजा महमूदाबाद के वालिद पाकिस्तान गए, लेकिन उनकी मां हिंदुस्तान में ही रह गईं. इस मामले में ख़ास बात यह है कि राजा महमूदाबाद के वालिद ने बाद में पाकिस्तान भी छोड़ दिया और लंदन में जाकर बस गए और वहीं उनका इंतकाल हुआ. इन हालात में यदि उनके वारिस उनकी संपत्ति पर अपना हक़ मांग रहे हैं तो कहां से नाजायज़ है. फिर राजा महमूदाबाद के मामले में तो ख़ुद सुप्रीमकोर्ट ने उनका पक्ष लेते हुए उनके हक़ में फैसला दिया था.

आज़ाद हिंदुस्तान में यह कोई पहली बार नहीं है, जब मुसलमानों को अपनी सरजमीं में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ी हो. बल्कि मुल्क की आज़ादी के बाद हिंदुस्तानी मुसलमानों के ऊपर सबसे पहले जो बिजली गिरी, वह थी उनके उद्योग, व्यापार, दुकान, मकान, ज़मीन, जायदाद और संपदा का हरण. इस बिना पर कि वे या उनके परिवार के सदस्य पाकिस्तान चले गए. ऐसा निष्क्रांत संपत्ति क़ानून के तहत किया गया, जो मुल्क में आज़ादी के तुरंत बाद अमल में आ गया था.

ज़ाहिर है, इस तरह हज़ारों-लाखों परिवार कंगाल हो गए. सांप्रदायिक दंगों की वजह से जिन्होंने मजबूरी में देश बदला या स़िर्फ अपने रिश्तेदारों से मिलने पाकिस्तान गए, उनकी संपत्तियों को सरकार ने ज़ब्त कर लिया. प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल मंत्री मेहरचंद खन्ना, जो इस क़ानून का क्रियान्वयन करा रहे थे, ख़ुद पाकिस्तान से आए शरणार्थी थे और पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में अपना सब कुछ गवां कर आए थे. ज़ाहिर है, मंत्री मेहरचंद खन्ना के दिल में हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए कोई हमदर्दी नहीं थी. उनका मानना था कि उन जैसे हिंदुओं को अपने घर-बार से वंचित करने के लिए पाकिस्तान में रह गए मुसलमान ज़िम्मेदार हैं. लिहाज़ा निष्क्रांत संपत्ति कानून को उन्होंने सभी जगह पर बड़ी बेरहमी से मुसलमानों पर लागू किया. इस क़ानून से उस व़क्त हज़ारों मुसलमान परिवार सरकार की मनमानी कार्रवाई के शिकार हुए. उन्होंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि पाकिस्तान बनने के बाद उनकी ऐसी दुर्गति होगी, अपनी जन्मभूमि में वे बेगाने हो गए और अपने सपनों की सरजमीं में अस्वीकार्य.

हिंदुस्तानी मुसलमान पहले ही निष्क्रांत संपत्ति क़ानून से अपना बहुत कुछ खो चुके हैं. ऐसे में आज़ादी के 63 सालों बाद एक बार फिर इस तरह का क़ानून उनकी आर्थिक कमर तोड़ने वाला साबित होता. यूपीए सरकार ने भले ही इस विवादास्पद विधेयक से क़दम पीछे खींचकर एक बिना वजह के विवाद को शुरू होने से पहले ही थाम लिया हो, मगर हुकूमत के अंदर अभी भी ऐसे तत्वों की शिनाख्त ज़रूरी है, जो मुल्क के अंदर समय-समय पर जानबूझ कर मुसलमानों के ख़िला़फ ऐसे शिगूफे छोड़ते रहते हैं.

(लेखक अल्पसंख्यक मामलों के जानकार हैं)

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