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आम लोगों के लिए हथियार बना सूचना अधिकार क़ानून

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अक्सर कहा जाता है कि किसी भी चीज के निर्माण, उसका समुचित प्रदर्शन सुनिश्चित करने और उसमें आवश्यक सुधार के लिए सूचना या जानकारी का होना पहली शर्त है. मनुष्य के अस्तित्व से जुड़े हर पहलू के लिए यह आधारभूत ज़रूरत है, चाहे वह ज्ञानार्जन हो, अपने दायित्वों का निर्वहन हो, नियम-क़ानूनों का अनुपालन हो या कमियों के मद्देनज़र व्यवस्था में सुधार हो. इसी ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए साल 2005 में हमारे देश में सूचना अधिकार क़ानून (आरटीआई एक्ट) लागू किया गया था. अस्तित्व में आने के बाद से ही यह क़ानून आम लोगों के लिए एक कारगर हथियार के रूप में सामने आया है. देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक अधिकारों की मज़बूती के लिए इसका व्यापक इस्तेमाल हो रहा है. अपना पक्ष रखने का अधिकार न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत का एक अभिन्न पहलू है और इस लिहाज से सूचना हासिल करने का अधिकार एक आवश्यक शर्त है.

आरटीआई कानून के अस्तित्व में आने से प्रशासन में आम लोगों की भागीदारी बढ़ी है तो व्यवस्था में उत्तरदायित्व की भावना में भी इजाफा हुआ है. सभी सूचनाएं अब लोगों की नजरों में हैं और अपनी स्वार्थ सिद्धि की कोशिश में लगे सरकारी अधिकारियों को कोई भी गलत काम करने से पहले यह सोचना पड़ता है कि भविष्य में कभी भी उन्हें अपने फैसलों या गलत कामों का हिसाब देना पड़ सकता है.

सूचना अधिकार क़ानून के तहत आम जनता को मिले अधिकारों का देश में शासन को प्रभावी बनाने के लिए व्यापक इस्तेमाल किया गया है. पिछले कुछ सालों से सरकार और उसकी प्रशासनिक संस्थाएं लोगों द्वारा मांगी गई सूचनाओं को उपलब्ध कराने में व्यस्त रही हैं. सूचना अधिकार क़ानून के अंतर्गत मिली सूचनाओं के आधार पर व्यवस्था में जो कमियां सामने आई हैं, उन्हें दूर करने के लिए एक नई जंग की शुरुआत हो चुकी है, जिसे स्वतंत्रता की तीसरी लड़ाई का नाम दिया गया है. अब वे दिन लद गए, जबकि नौकरशाही सरकारी गोपनीयता क़ानून (ऑफिसियल सीक्रेट्‌स एक्ट) 1923 का बहाना बनाकर लोगों को आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराने से इंकार कर देती थी. यदि मामला सार्वजनिक हित से जुड़ा है तो उनके लिए ऐसा करना अब असंभव है.

भारत में आरटीआई क़ानून 2005 में भले अस्तित्व में आया हो, लेकिन हमारे प्रजातांत्रिक मूल्यों के अभिन्न अंग के रूप में यह हमेशा से मौजूद रहा है. रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, कंज़्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 1986, इंडियन फैक्ट्रीज एक्ट 1948, भारत का संविधान (धाराएं 19, 21 एवं 22), इंडियन एविडेंस एक्ट 1941, द क्रिमिनल प्रॉसिजर कोड 1973, द पब्लिक रिकॉड्‌र्स एक्ट जैसे क़ानूनों के प्रावधानों एवं अदालतों के विभिन्न फैसलों में सूचना अधिकार क़ानून किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है. वैश्विक स्तर पर भी यह विचार का विषय बनता रहा है और वैश्विक मानवाधिकार क़ानून 1948 सहित कई विकासशील देशों के क़ानूनों में इसे जगह दी गई है.

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी क़ानून की प्रभावकारिता की पहली शर्त यही है कि आम लोग इसके सभी पहलुओं से भलीभांति वाक़ि़फ हों. इतना ही नहीं, उन्हें यह एहसास दिलाना भी ज़रूरी है कि क़ानून के तहत मिले अधिकारों का किस तरह वे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. सूचना अधिकार क़ानून भी इसका अपवाद नहीं है. इसकी मदद से देश के नागरिकों के अधिकारों में वृद्धि हुई है और इसके प्रावधानों के प्रभावी इस्तेमाल से व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया में भी तेज़ी आई है.

आरटीआई क़ानून के अस्तित्व में आने से प्रशासन में आम लोगों की भागीदारी बढ़ी है तो व्यवस्था में उत्तरदायित्व की भावना में भी इज़ा़फा हुआ है. सभी सूचनाएं अब लोगों की नज़रों में हैं और अपनी स्वार्थ सिद्धि की कोशिश में लगे सरकारी अधिकारियों को कोई भी ग़लत काम करने से पहले यह सोचना पड़ता है कि भविष्य में कभी भी उन्हें अपने फैसलों या ग़लत कामों का हिसाब देना पड़ सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि सूचना अधिकार क़ानून की मदद से प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की भावना में इज़ा़फा हुआ है.

निरंतरता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की भावना अच्छे प्रशासन के सबसे आवश्यक पहलू होते हैं. सूचना अधिकार क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद से देश की प्रशासनिक व्यवस्था में इन पहलुओं की बढ़ी मौजूदगी को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है. लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इस क़ानून को ज़्यादा प्रभावकारी बनाने के लिए अभी और भी क़दम उठाने की ज़रूरत है. आरटीआई क़ानून की धाराओं 4 एवं 5 के अंतर्गत विभिन्न एजेंसियों द्वारा सूचनाओं के प्रकाशन और लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) की नियुक्ति का अभी भी पूरी तरह पालन नहीं किया जा रहा है. इस क़ानून की धारा 4 की उपधारा 2 के मुताबिक़, उपखंड बी की उपधारा 1 के अंतर्गत हर लोकसेवक का यह कर्तव्य है कि वह इंटरनेट सहित विभिन्न माध्यमों की मदद से आम लोगों को ज़रूरी सूचनाएं उपलब्ध कराने की हरसंभव कोशिश करेगा, ताकि सूचना हासिल करने के लिए आम लोगों को आरटीआई क़ानून का कम से कम इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़े. सूचना अधिकार क़ानून थ्योरी ऑफ फुल बेली पर आधारित है. इसका तात्पर्य यह है कि यदि किसी का पेट भरा हो तो वह और भोजन की मांग नहीं करेगा. इसी तरह यदि आम लोगों के पास सूचनाएं ख़ुद ही पहुंचती रहेंगी तो उन्हें आरटीआई क़ानून के इस्तेमाल की ज़रूरत ही नहीं होगी.

इसी तरह आरटीआई क़ानून के खंड 5 के उपखंड 1 के अनुसार, इस क़ानून के अस्तित्व में आने (21 जून, 2005) के एक सौ दिनों के अंदर हर शासकीय संस्था में केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी, जैसी भी आवश्यकता हो, की नियुक्ति अनिवार्य है, ताकि सूचना अधिकार क़ानून के तहत सूचना की मांग करने वाले लोगों की अपीलों का निष्पादन संभव हो सके. इस क़ानून के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए जितनी जल्दी हो सके, इसके प्रावधानों का पूरी तरह अनुपालन आवश्यक है. पूरे देश में 50 लाख से ज़्यादा सरकारी संस्थाएं हैं, लेकिन कई संस्थाएं ऐसी हैं, जिनमें अभी तक लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की गई है. कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें सूचना अधिकारियों को नियुक्त किया गया है, लेकिन इसकी सार्वजनिक सूचना न होने से आरटीआई की अपीलों के निष्पादन में संदेह बना रहता है और देर होती है. कई जगहों पर पूरे संगठन के लिए केवल एक सूचना अधिकारी नियुक्त किया गया है. एक व्यक्ति पर इस निर्भरता से सूचना हासिल करने की प्रक्रिया लंबी और मुश्किल हो जाती है. यदि एक से ज़्यादा लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति की जाए तो उनके बीच कार्य का विभाजन संभव हो सकता है और आरटीआई के तहत दायर अपीलों के शीघ्र निष्पादन की उम्मीद भी की जा सकती है.

शुरुआती दिनों में लोक अधिकारी सूचना अधिकार क़ानून के प्रावधानों का पूरी तरह पालन न होने के पीछे कोष की कमी का बहाना बनाते थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत इसके लिए अलग से फंड की व्यवस्था की गई है, ताकि आरटीआई क़ानून के प्रावधानों का प्रभावी तरीक़े से इस्तेमाल किया जा सके. हालांकि यह भी सच है कि सूचनाओं के प्रकाशन के लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारी मौजूद नहीं हैं. इससे निपटने के लिए यह काम उन एजेंसियों को सौंपा जा सकता है, जो ऐसे काम करने में दक्ष हों. ऐसा करते हुए यह ध्यान रखना होगा कि उपलब्ध कराई गई सूचना समझने में आसान हो और ऐसे माध्यम से लोगों तक पहुंचाई जाए, जो सर्वसुलभ हो.

(लेखक पश्चिम बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)

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