बुद्ध की नगरी सरकारी भूमि की लूट

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दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लोग जीवन में कम से कम एक बार बोधगया की यात्रा ज़रूर करना चाहते हैं. बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए बोधगया मक्का है. जबसे बोधगया का महाबोधि मंदिर वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल हुआ है, तबसे बोधगया बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है. इसलिए यहां आने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. यही कारण है कि हर कोई बोधगया में अपना आशियाना बनाना चाहता है. यहां पदस्थापित सरकारी कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों, दबंगों और प्रमुख व्यवसायियों ने बोधगया मठ की भूमि, परवाना, गैर मजरुआ भूमि के साथ-साथ श्मशान घाट की भूमि के फर्ज़ी काग़जात बनवा कर उनका निबंधन करा लिया है. इनमें से अधिकांश ज़मीनों पर विदेशी बौद्ध मठों की स्थापना की गई है. इतना ही नहीं, ऐसी ही भूमि पर अतिक्रमण करके होटल, मार्केट कांप्लेक्स और अन्य भवन भी बना लिए गए हैं.

बुद्ध की नगरी में सरकारी भूमि की सरेआम लूट हो रही है. भू-माफिया फर्जी कागजात बनाकर सरकारी जमीन बेच रहे हैं और प्रशासन उन्हें रोकने के बजाय मूकदर्शक बना हुआ है. इस लूट में सरकारी कर्मचारी, जनप्रतिनिधि, दबंग और प्रमुख व्यवसायी आदि सभी शामिल हैं. यही वजह है कि कोई कार्रवाई अंजाम तक नहीं पहुंच पाती है.

बुद्ध की नगरी में सरकारी भूमि की जमकर लूट हुई और इस बहती गंगा में लगभग सभी ने हाथ सा़फ किया. ग़ौरतलब है कि बोधगया में ज़मीन की क़ीमत प्रति एकड़ एक करोड़ रुपये है. विदेशी धार्मिक संस्थाएं यहां की ज़मीन के लिए मुंहमांगी क़ीमत देती हैं. यही वजह है कि बोधगया में सक्रिय भू-माफियाओं ने फर्जी कागजात बनवा कर परचा, परवाना, गैर मजरुआ एवं श्मशान घाट की ज़मीनों को बेच डाला. यह भी बताया जा रहा है कि यदि शासन-प्रशासन बोधगया में परचा, परवाना समेत अन्य सरकारी भूमि पर ईमानदारी से दखल-क़ब्ज़ा करना शुरू कर दे, तो यहां आधे से अधिक होटल, विदेशी बौद्ध मठ अतिक्रमण के दायरे में आ जाएंगे. अगर इस मामले में शासन-प्रशासन सख्त होता है तो बोधगया में सक्रिय भू-माफिया विदेशी बौद्ध मठों के संचालकों की ओर से भारत सरकार के गृह मंत्रालय एवं अपने-अपने दूतावासों को यह लिखवा देते हैं कि यहां के सरकारी पदाधिकारी अतिक्रमण के नाम पर हम सभी को तंग कर रहे हैं, क्यों न यहां से बौद्ध मठ हटा लिया जाए. इसके बाद भू-माफिया बोधगया में यह अफवाह फैलाते हैं कि सरकारी पदाधिकारियों के रवैये से विदेशी पर्यटक बोधगया आना नहीं चाहते हैं. इससे विदेशों में भारत की छवि खराब होती है. इतना ही नहीं, बिहार सरकार को विदेशी मुद्रा के साथ-साथ सरकारी राजस्व की भी क्षति होती है. यही वजह है कि प्रशासन बौद्ध मठों, होटलों और अन्य अवैध भवनों के खिला़फ कार्रवाई नहीं करता. अगर कार्रवाई करता भी है तो उसे बीच में ही बंद करना पड़ता है. इस स्थिति में बोधगया के सभी होटल एवं बौद्ध मठों के संचालक एकजुट हो जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि सरकारी भूमि, भूमिहीनों के बीच वितरित की गई भूमि और श्मशान घाट की भूमि के फर्ज़ी काग़जात बना लिए गए हैं, जिनकी सही जांच सीबीआई ही कर सकती है. इतना ही नहीं, फर्ज़ी काग़जात के सहारे निबंधन भी करा लिए गए हैं. इसकी फेहरिस्त काफी लंबी है. बोधगया के मस्तीपुर मौजा में भूमि अर्जन वाद संख्या 16/55-56 द्वारा 72 एकड़ भूमि अर्जित की गई थी. इस भूमि के प्लॉट  संख्या 352, 353, 358, 359, 361 को थाईलैंड बौद्ध मठ एवं प्लॉट संख्या 287, 288, 283 को जापानी बौद्ध मठ को लीज पर दिया गया था. शर्तों के मुताबिक़, लीज पर दी गई भूमि का स्वामित्व सरकार का और क़ब्ज़ा लीज धारक का होता है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों की मेहरबानी से 1981 में हुए सर्वे में उक्त दोनों मठों के नाम से ही खाता खोल दिया गया. सड़क के लिए अर्जित भूमि (प्लॉट संख्या 1966) पर होटल एंबेसी का अधिकांश भाग निर्मित है. इसी प्रकार खाता संख्या 285 प्लॉट संख्या 2008 रकबा 85 डिसमिल गैर मजरुआ भूमि का फर्ज़ी दस्तावेज तैयार कराकर इस जगह पर आम्रपाली गेस्ट हाउस बना लिया गया है. दोराहे पर स्थित होटल डेल्टा के संचालक भी 44 डिसमिल सरकारी भूमि पर क़ब्ज़ा जमाए बैठे हैं. यही स्थिति खाता संख्या 1034 प्लॉट संख्या 3113 पर निर्मित तथागत होटल का है. वहीं प्रिंस होटल के मालिक गोपाल प्रसाद का मकान भी (प्लांट संख्या 2279) गैर मजरुआ ज़मीन पर बना है.

यदि शासन-प्रशासन बोधगया में परचा, परवाना समेत अन्य सरकारी भूमि पर ईमानदारी से दखल-क़ब्ज़ा करना शुरू कर दे, तो यहां आधे से अधिक होटल, विदेशी बौद्ध मठ अतिक्रमण के दायरे में आ जाएंगे.

अमवां में गया होम्योपैथिक कॉलेज भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत की गई भूमि पर बना है. इस कॉलेज के सचिव राज्य के पथ निर्माण मंत्री एवं गया शहर के विधायक डॉ. प्रेम कुमार हैं. निरंजना नदी के किनारे हाल में ही थावोर्न इंडिया सोसाइटी की ओर से लगभग तीन एकड़ भूमि पर निरंजना थाई मंदिर का निर्माण किया गया है, जबकि सोसाइटी ने मात्र 20 डिसमिल खतियानी भूमि ही खरीदी थी. बताया जाता है कि अन्य भूमि विवादास्पद है. सर्वे नक्शा में खाता संख्या 449, प्लॉट संख्या 679, 681 श्मशान घाट के रूप में दर्ज है, लेकिन भू-माफियाओं ने इसका भी फर्जी कागजात बना लिया और इस जमीन को विदेशी संस्थाओं के हाथों बेच दी. इस संस्था ने सड़क के लिए अधिग्रहीत ज़मीन को भी अपने क़ब्ज़े में कर लिया. यह देख ग्रामीण गुस्साए हुए हैं. इसका विरोध करने पर गांव के उप मुखिया राजेश कुमार को जेल भी जाना पड़ा. ऐतिहासिक कालचक्र मैदान की भूमि के साथ-साथ बोधगया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पास स्थित भूमि का भी ग़लत तरीके से निबंधन करा लिया गया है. इस भूमि पर एक चिकित्सक नर्सिंग होम का संचालन कर रहे हैं. इन सारे मामलों को लेकर जिलाधिकारी संजय कुमार सिंह काफी गंभीर हैं. वह सारे काग़जात मंगाकर जांच कराने में लगे हैं. उन्होंने कहा कि जांच के बाद यदि सरकारी भूमि पर अवैध क़ब्ज़े की बात सामने आती है तो संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी.

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