दहाई में नहीं पहुंचेंगे लालूः रंजन यादव

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चालीस सालों तक लालू प्रसाद के हमसफर रहे जदयू सांसद रंजन प्रसाद यादव जब नीतीश का गुणगान करने लगे तो उनसे नए सवालों की गुंजाइश कम होती चली गई. लगा कि कहीं चालीस सालों तक रंजन नीतीश के साथ तो नहीं थे? लेकिन जब धीरे-धीरे उन्होंने लालू-राबड़ी शासन के ग़लत फैसलों पर से पर्दा उठाना शुरू किया तो सा़फ होता चला गया कि लालू से उनकी चार दशक पुरानी दोस्ती क्यों टूटी और इन दिनों वह नीतीश कुमार पर इतने मेहरबान क्यों हैं. पंद्रह साल के राजद शासन के दौरान अपने कई खट्टे-मीठे अनुभवों को उन्होंने चौथी दुनिया के साथ बांटा. प्रस्तुत हैं उनके साथ सरोज सिंह की बातचीत के खास अंश:

लालू प्रसाद को इतनी ऊंचाई तक पहुंचाने के बाद आप उनसे इतने नाराज क्यों हो गए?

सवाल मेरी नाराजगी का नहीं है, सवाल बिहार की बेहतरी का है. बिहार के लोगों ने बड़ी उम्मीद के साथ एक ग़रीब के बेटे को सत्ता सौंपी थी. लोगों को उम्मीद थी कि हर मायने में पिछड़े बिहार को लालू प्रसाद विकास के रास्ते पर ले जाएंगे. हर जगह अमन-चैन होगा और यहां के बच्चे पढ़-लिखकर दुनिया में नाम कमाएंगे. लेकिन क्या हुआ, सब जानते हैं. लालू प्रसाद बिहार के पिछड़ेपन का इतिहास तो नहीं बदल सके. हां, यह ज़रूर हुआ कि सत्ता के मोह में उन्होंने यहां का भूगोल बदल दिया. जो लालू प्रसाद कहते थे कि बिहार मेरी लाश पर बंटेगा, उन्होंने ही इसे बांटकर, इस ग़रीब राज्य को रसातल में पहुंचा दिया. लालू प्रसाद को यहां की जनता को बताना चाहिए कि ऐसी कौन सी मजबूरी थी, जिस कारण उन्होंने इस राज्य को बंटने दिया. लालू प्रसाद के इस फैसले से राज्य को राजस्व का भारी ऩुकसान तो हुआ ही, बिजली, शिक्षा एवं कल-कारखानों के मामले में भी हम पचास साल पीछे चले गए.

जब यह सारा कुछ हो रहा था तो आप भी लालू के साथ थे. आपने उन्हें रोका क्यों नहीं?

सही बात है, मैं उस समय लालू प्रसाद के साथ था और आपके माध्यम से बिहार की जनता को बताना चाहता हूं कि मैंने लालू प्रसाद के हर उस फैसले का विरोध किया, जो बिहार के हित में नहीं था. मैंने उनके किसी भी ग़लत काम में साथ नहीं दिया. सभी जानते हैं कि लालू चारा घोटाले में फंसे, जेल गए, पर किसी ने मुझ पर उंगली नहीं उठाई. क्या सीबीआई ने कभी मुझसे पूछताछ की. मैं तो राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में भी नहीं था. मैं जानता था कि इससे बिहार को पीछे जाने से कोई नहीं रोक सकता. लालू प्रसाद से मेरा मतभेद इन्हीं सवालों पर था. मैंने हमेशा उनसे जनादेश का सम्मान करने की बात कही, पर वह नहीं माने और सत्ता से बाहर हो गए.

आपको लगता है कि इन्हीं गलतियों की वजह से लालू प्रसाद केवल यादवों के नेता बनकर रह गए?

नेता तो वह होता है, जो समाज को बचाता है, पर लालू प्रसाद ने यादवों का जितना ऩुकसान किया, उतना शायद ही किसी ने किया होगा. यादवों को समाज में बिल्कुल अलग कर दिया. उनके राज में कितनी मां-बहनें विधवा हुईं, इसे कोई भूल सकता है क्या? इस समाज के लोग पढ़ाई से दूर होते चले गए. अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए रैलियां करते रहे और नारा देते रहे-तेल पिलावन, लाठी घुमावन और राज चलावन. जबकि मैं कहता था-पेन चलावन, इंक पिलावन और ज्ञान बढ़ावन. मुझमें और लालू में यही फर्क है. अब यादव समाज भी जान गया है कि उसका असली नेता कौन है.

लालू प्रसाद एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने के लिए जनादेश मांग रहे हैं. कह रहे हैं कि मैं बदल गया हूं.

सपना देखने में कोई हर्ज नहीं है और इसमें पैसा भी नहीं लगता है. आज क्या कोई सोच सकता है कि बिहार की जनता लालू प्रसाद को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहेगी. यहां की मां-बहनें, जिनका घर से निकलना मुश्किल हो गया था, वे लालू प्रसाद को वोट देंगी? वे युवक, जिन्हें लालू प्रसाद के ग़लत फैसलों के कारण नौकरी नहीं मिल पाई, लालू प्रसाद को वोट देंगे? धंधा-रोज़गार वाले जिनका पूरा दिन दहशत में गुजरता था, वे राजद को वोट देंगे? मैं आपको बता दूं कि बिहार की जनता पूरी तरह सतर्क है और वह लालू प्रसाद के बहलावे में आने वाली नहीं है. लालू लाख जोर लगा लें इस चुनाव में, उनका दहाई पार करना भी मुश्किल है.

आप लालू की तमाम खामियां गिना रहे हैं, लेकिन यह तो बताइए कि जनता नीतीश कुमार को वोट क्यों दे?

नीतीश कुमार ने जनादेश का सम्मान किया है. लालू-राबड़ी के शासन से त्रस्त जनता ने नीतीश कुमार के कंधे पर बिहार को फिर से बनाने का जिम्मा सौंपा था, जिसमें वह पूरी तरह खरे उतरे हैं. गांवों से लेकर राज्य मुख्यालय तक सड़कों का जाल बिछा दिया है. बिहार की जनता के दिलों से भय का माहौल भागा है. अब मां-बहनें बिना खौफ के निकल रही हैं. रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन भी रुका है. गांव की लड़कियां अब साइकिल से स्कूल जा रही हैं. यह छोटा बदलाव थोड़े ही है. नीतीश कुमार ने जर्जर बिहार को विकास की पटरी पर लाकर खड़ा कर दिया. इस कारण बिहार की जनता नीतीश कुमार को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने के लिए बेताब है.

नीतीश राज में भी लोग बिजली के लिए तरसते रहे और राज्य में कोई बड़ा उद्योग नहीं लग सका.

मैंने आपसे पहले भी कहा कि केवल सत्ता बचाने के लिए लालू प्रसाद ने इस राज्य का भूगोल बदल दिया. बिजली उत्पादन की बड़ी इकाइयां झारखंड में चली गईं और बिहार के खाते में बस जर्जर कांटी एवं बरौनी थर्मल बच गईं. इसके अलावा केंद्र को बिजली के मामले में जितना सहयोग करना चाहिए, उतना नहीं हो रहा है. अब तो केंद्र कोल लिंकेज की जगह कोल ब्लाक की बात कर रहा है. चीनी मिल के बारे में केंद्र सरकार की नीतियों के कारण कल-कारखाने का रास्ता बंद पड़ा है, लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार इन संकटों पर काबू पा लेगा और विकास का नया इतिहास लिखेगा.

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