देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत के सामान्य निर्वाचन-2010 का शंखनाद हो चुका है. ये चुनाव 15 सितंबर से लेकर 31 अक्टूबर के बीच होंगे. उधर सूबे के आदिवासियों में केंद्र और राज्य सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है. वे अपने लोकतांत्रिक अधिकार हासिल करने के लिए धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल, आमरण अनशन, जेल भरो आंदोलन, चक्का जाम और चुनाव बहिष्कार के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिल पा रही है. मालूम हो कि अपनी उपेक्षा के चलते ही सूबे के लाखों आदिवासी पंचायत से लेकर लोकसभा तक का चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं और न सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले पा रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002 ने एक बार फिर आदिवासी जातियों के लोगों के घाव पर हाथ रख दिया. इस अधिनियम के तहत अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल हुई आदिवासी जातियों को आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया. ऐसा केंद्र एवं राज्य सरकार के कारण हुआ. दोनों ने सूबे में अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल हुई जातियों की जनगणना कराकर उनकी आबादी के अनुपात में पंचायत से लेकर लोकसभा तक की सीटों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं की. इसका ख़ामियाजा इन आदिवासियों को अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित होकर भुगतना पड़ रहा है.
बीते एक माह के दौरान वे सोनभद्र, मिर्जापुर एवं चंदौली समेत देश एवं राज्य की राजधानी में कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं. उन्होंने बीते दिनों लखनऊ में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए दो दिवसीय भूख हड़ताल भी की और शासन को अपना मांगपत्र सौंपा. इसके बावजूद केंद्र एवं राज्य सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. आदिवासियों की इस समस्या को हल करने में सुप्रीम कोर्ट ने भी असमर्थता जता दी है. आम आदमी के हितों की अनदेखी करने वाली कार्यपालिका और विधायिका की कारगुज़ारियों के आगे देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था भी खुद को पंगु महसूस कर रही है. विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका आज़ादी मिलने के साढ़े छह दशक बाद भी आदिवासियों को न्याय दिलाने में असफल हैं. लोकतंत्र के इन पहरुओं की असफलता आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में एक बार फिर दिखाई देने वाली है. आदिवासियों की समस्याएं सामाजिक कुरीतियों की देन हैं. सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, आदिवासी जहां के तहां रह जाते हैं, उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आता. विभिन्न राजनीतिक दल भी आदिवासियों की तरफ कोई ध्यान नहीं देते.
वर्ष 1967 में केंद्र सरकार ने अनुसूचित जनजाति अधिनियम (उत्तर प्रदेश) पारित किया और सबसे निचले तबके पर थोप दिया. इस क़ानून के तहत प्रदेश की पांच आदिवासी जातियों भोटिया, भुक्सा, जन्नसारी, राजी एवं थारू को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया गया. शेष कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, मलार, बादी, कंवर, कंवराई, गोंड़, धूरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुइया एवं भुनिया आदि आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजाति वर्ग में नहीं रखा गया. जबकि इन जातियों की सामाजिक स्थिति आज भी उक्त पांचों आदिवासी जातियों के समान है. सरकार के ख़िला़फ इन जातियों की आवाज़ धीरे-धीरे मुखर होने लगी और आदिवासी अपने अधिकार पाने के लिए संघर्ष करने लगे. आदिवासियों का संघर्ष रंग लाया. वर्ष 2002 में केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने सूबे की गोंड़, धूरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुइया एवं भुनिया आदिवासी जातियों को अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए संसद में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002 पेश किया, जिसे संसद ने पारित कर दिया. क़ानून बनने के बाद केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने 8 जनवरी, 2003 को भारत सरकार का राजपत्र (भाग-2, खंड-1) जारी करते हुए गोंड़ (राजगोंड़, धूरिया, पठारी, नायक एवं ओझा) जाति को उत्तर प्रदेश के 13 जनपदों महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर एवं सोनभद्र में अनुसूचित जाति वर्ग से अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया. साथ में खरवार एवं खैरवार को देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और सोनभद्र में, सहरिया को ललितपुर में, परहिया, बैगा, अगरिया, पठारी, भुइया, भुनिया को सोनभद्र में, पंखा, पनिका को सोनभद्र और मिर्जापुर में एवं चेरो को सोनभद्र और वाराणसी में अनुसूचित जनजाति में शामिल कर दिया गया. लेकिन सूबे की कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, धांगर, मलार, बांदी, कंवर एवं कंवराई आदि आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजाति वर्ग में ही रहने दिया गया. जबकि इनकी भी सामाजिक स्थिति उपरोक्त जनजातियों के समान है.
उधर कोल, कंवर एवं धांगड़ (उरांव) को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, कोरबा को बिहार, मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में, मझवार को मध्य प्रदेश में, बादी (बर्दा) को गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल किया गया है. उत्तर प्रदेश में भी इन जातियों के लोगों की सामाजिक स्थिति उपरोक्त प्रदेशों में निवास करने वाली आदिवासी जातियों के समान है. उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002 ने एक बार फिर आदिवासी जातियों के लोगों के घाव पर हाथ रख दिया. इस अधिनियम के तहत अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल हुई आदिवासी जातियों को आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया. ऐसा केंद्र एवं राज्य सरकार के कारण हुआ. दोनों ने सूबे में अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल हुई जातियों की जनगणना कराकर उनकी आबादी के अनुपात में पंचायत से लेकर लोकसभा तक की सीटों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं की. इसका ख़ामियाजा इन आदिवासियों को अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित होकर भुगतना पड़ रहा है. सूबे की तत्कालीन बसपा सरकार ने भी आनन-फानन में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, विधानसभा एवं लोकसभा की सीटों में आदिवासियों की आबादी के अनुसार आरक्षण की व्यवस्था किए बिना केंद्र सरकार के उस क़ानून को लागू कर दिया. क़ानून लागू होने के क़रीब दो माह बाद ही मायावती सत्ता से हाथ धो बैठीं.
इसके बाद सूबे की कमान समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के हाथ में आ गई. मुलायम सिंह भी आदिवासियों के घावों पर मरहम रखने में असफल रहे. फिलहाल उन्होंने आदिवासियों की संख्या जानने के लिए विभागीय सर्वेक्षण 2003-04 कराया, जिसमें सबसे ख़राब स्थिति सोनभद्र एवं नवसृजित जनपद चंदौली की रही. उत्तर प्रदेश शासन के समाज कल्याण अनुभाग-3 द्वारा 3 जुलाई, 2003 को जारी शासनादेश के अनुसार, गोंड़, धूरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुइया एवं भुनिया आदि अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया गया. इन जातियों के अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के कारण सोनभद्र में अनुसूचित जनजातियों की संख्या तीन लाख 78 हजार चार सौ बयालिस (विभागीय सर्वेक्षण-2003-04 के अनुसार) हो गई, जो सोनभद्र की आबादी का एक चौथाई (करीब 25 प्रतिशत) है. वहीं सोनभद्र में अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल जातियों की आबादी 42 फीसदी (जनगणना-2001 के अनुसार) से घटकर 16 फीसदी हो गई. कई-कई ग्राम सभाओं में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या नगण्य हो गई, जिसकी वजह से आज भी क़रीब आधा दर्जन ग्रामसभाएं असंगठित हैं. दुद्धी विकास खंड की जाबर, नगवां विकास खंड की रामपुर, बैजनाथ, दरेव एवं पल्हारी ग्राम सभाएं इसका उदाहरण हैं, जहां वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुई ग्राम प्रधान एवं ग्राम पंचायत सदस्य आदि सीटों पर योग्य उम्मीदवारों की पर्याप्त दावेदारी न होने के कारण ग्राम पंचायत सदस्यों की दो तिहाई सीटें खाली हैं. इस वजह से इन ग्राम सभाओं का गठन नहीं हो पाया है, क्योंकि गठन के लिए ग्राम पंचायत सदस्यों की संख्या दो तिहाई होना ज़रूरी है. इन ग्राम सभाओं में ज़िला प्रशासन द्वारा तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर विकास कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है. नगवां विकासखंड की पल्हारी ग्रामसभा इसका उदाहरण है. 13 सदस्यों वाली इस ग्रामसभा में पंचायत चुनाव-2005 के दौरान कुल 1006 मतदाता थे. इस गांव में अनुसूचित जाति का एक परिवार था. शेष लोग अनुसूचित जनजाति एवं अन्य वर्ग के थे. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 12 ग्राम पंचायत सदस्य के पद खाली हैं, क्योंकि उन पर अनुसूचित जाति का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ सका. ग्राम पंचायत सदस्यों के दो तिहाई से अधिक पद खाली होने के कारण पल्हारी ग्रामसभा का गठन नहीं हो पाया. ज़िला प्रशासन द्वारा गठित समिति विकास कार्यों को अंजाम दे रही है. आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भी एक बार फिर ऐसा ही होने वाला है. क़ानून की इन विसंगतियों के ख़िला़फ आदिवासियों की आवाजें मुखर होने लगी हैं. कई ग़ैर सरकारी संगठन भी आदिवासियों की आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. पंचायत चुनाव-2005 के दौरान भी आदिवासियों एवं कुछ राजनीतिक पार्टियों ने सरकार की नीतियों के ख़िला़फ आवाज उठाई थी. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने आदिवासियों की बात सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए म्योरपुर विकासखंड के करहिया गांव में पंचायत चुनाव के दौरान समानांतर बूथ लगाकर आदिवासियों से मतदान कराया था. भाकपा (माले) के इस अभियान में 500 लोगों ने अपने मत का प्रयोग किया. वहीं राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायत चुनाव के दौरान लगाए गए बूथ पर मात्र 13 वोट पड़े. अनुसूचित जाति के दो परिवारों (दयाद) के सदस्यों में से एक व्यक्ति नौ वोट पाकर ग्राम प्रधान चुना गया. शेष सदस्य निर्विरोध चुन लिए गए. आदिवासियों और भाकपा (माले) के इस अभियान ने राजनीतिक हलके में हड़कंप मचाकर रख दिया. इसके बाद भी केंद्र एवं राज्य सरकार की नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल हुईं इन जातियों की यह समस्या स़िर्फ ग्राम पंचायत तक ही सीमित नहीं है. यही दिक्कत क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में भी है. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002 में आरक्षण की विसंगति के कारण आदिवासी बहुल दुद्धी विधानसभा क्षेत्र से 27 सालों तक विधायक एवं समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री रहे विजय सिंह गोंड़ पूर्व में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सके थे. सत्ताधारी समाजवादी पार्टी भी विजय सिंह के घाव पर मरहम नहीं रख सकी थी.
Related posts:
- आदिवासी एकता ही हलचल से परेशान कांग्रेस और भाजपा
- पंचायत चुनाव की कठिन डगर
- आदिवासी लड़की से बलात्कारः रसू़खदारों के आगे पुलिस कमज़ोर
- वनवासियों का त्रासद विस्थापनः कोई कुनो की सुनो
- कोरकू बोली का शब्दकोष और व्याकरण तैयार
|
|
|



