दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है. आज इन सबकी ज़ुबान पर एक ही सवाल है, आख़िर जाएं तो जाएं कहां? 32 साल का दिलीप मंडल दिल्ली के मंगोलपुरी इलाक़े में एक झुग्गी-झोपड़ी कालोनी में रहता है. मूलत: बिहार के पूर्णिया ज़िले का निवासी दिलीप पिछले सात साल से राजधानी में रहकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता है. वह एक एक्सपोर्ट हाउस में सिक्युरिटी गार्ड का काम करता है. महज 3500 रुपये मासिक वेतन के सहारे वह अपने, पत्नी और पांच बच्चों के लिए दो जून की रोटी का इंतज़ाम करता है. हालांकि इतने पैसों में वह दो साल पहले तक बड़े मजे से अपनी ज़िंदगी गुजार रहा था. पत्नी और बच्चे भी उसके साथ ही रहते थे. पत्नी आसपास के घरों में काम करके थोड़ा-बहुत कमा लेती थी और बच्चे एक स्कूल में पढ़ने जाते थे. दिन भर कड़ी मेहनत के बाद दिलीप जब शाम को घर लौटता तो बच्चों के हंसते चेहरों को देखकर उसकी सारी थकान दूर हो जाती थी, लेकिन सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई ने उसकी ख़ुशहाल ज़िंदगी में मानो ब्रेक लगा दिए. रोजमर्रा के ज़रूरत की चीजों की बढ़ती क़ीमतों से बेहाल दिलीप ने पहले तो बच्चों का स्कूल जाना बंद कराया और फिर परिवार को अपने गांव भेज दिया. अब वहां जाकर उसके बच्चे पढ़ते नहीं, पत्नी खेतों में मज़दूरी करती है और वह यहां अकेले रहने को मजबूर है. ज़िंदगी को लेकर उसके तमाम सपने आज काफूर हो चुके हैं. रोटी, कपड़ा और मकान की बुनियादी ज़रूरतों का ख़र्च पिछले दो सालों में क़रीब दोगुना हो चुका है, लेकिन आमदनी नहीं बढ़ी. दिलीप अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहता है, ताकि वे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें, लेकिन वह करे भी तो क्या? सरकार की नीतियों में ग़रीबों की चर्चा ज़रूर होती है, लेकिन चर्चा करने से किसी का पेट नहीं भरता.

ग़रीबी और बेरोज़गारी से त्रस्त लोगों के लिए दिल्ली आख़िरी आसरा है. एक अनुमान के मुताबिक़, हर साल दो से तीन लाख लोग रोजी-रोटी की तलाश में राजधानी आते हैं और यहीं के होकर रह जाते हैं. राजधानी की कुल आबादी का तक़रीबन 40 प्रतिशत इन्हीं प्रवासियों का है, जो सुनहरे भविष्य के सपने लिए अपना घर-बार छोड़कर यहां आते हैं, लेकिन दिल्ली की यह प्रवासी आबादी बढ़ती महंगाई से हलकान है. दिल्ली के मूल वाशिंदों की तुलना में इनकी ज़िम्मेदारियां ज़्यादा हैं और समस्याएं भी, लेकिन जीवन की आधारभूत ज़रूरतों की बढ़ती क़ीमतों से आबादी के इस तबके के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं.

देश की राजधानी दिल्ली को आज छोटा भारत कहा जाता है, क्योंकि पूरे देश के लोग यहां रहते हैं. ग़रीबी और बेरोज़गारी से त्रस्त लोगों के लिए दिल्ली आख़िरी आसरा है. एक अनुमान के मुताबिक़, हर साल दो से तीन लाख लोग रोजी-रोटी की तलाश में राजधानी आते हैं और यहीं के होकर रह जाते हैं. राजधानी की कुल आबादी का तक़रीबन 40 प्रतिशत इन्हीं प्रवासियों का है, जो सुनहरे भविष्य के सपने लिए अपना घर-बार छोड़कर यहां आते हैं, लेकिन दिल्ली की यह प्रवासी आबादी बढ़ती महंगाई से हलकान है. दिल्ली के मूल वाशिंदों की तुलना में इनकी ज़िम्मेदारियां ज़्यादा हैं और समस्याएं भी, लेकिन जीवन की आधारभूत ज़रूरतों की बढ़ती क़ीमतों से आबादी के इस तबके के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले से आए सुरेंद्र का कहना है कि क़ीमतों में वृद्धि के चलते जीना दूभर हो चुका है. सरकार हमें प्रलोभन और आश्वासन तो ढेर सारे देती है, लेकिन जब बच्चा दूध के लिए घर में रोता है, तो सारी बातें भद्दा मज़ाक लगने लगती हैं.

बिहार के मधुबनी ज़िले का निवासी आशानंद भी पांच सालों से दिल्ली में रह रहा है. वह कपड़ों पर कढ़ाई का काम करता है. क़रीब एक साल पहले तक उसके पास एक दर्जन मशीनें थीं, अच्छी-खासी कमाई हो जाती थी, लेकिन आज हालत यह है कि उसके पास केवल एक मशीन बची है. महंगाई के चलते जब ज़रूरत की चीजों के लिए पैसे कम पड़ने लगे तो उसे एक-एक करके सारी मशीनें बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. अब वह अकेला दिन भर अपनी एक मशीन पर लगा रहता है और किसी तरह अपना और चार बच्चों का पेट भरता है. आशानंद बताता है कि पहले इतनी कमाई हो जाती थी कि रोजाना की ज़रूरतें आसानी से पूरी हो जाती थीं और गाहे-बगाहे परिवार के साथ घूमना-फिरना भी हो जाता था, लेकिन अब तो हालत यह है कि स्कूल की फीस देने के लिए भी सोचना पड़ता है. कमाई घटती जा रही है और महंगाई बढ़ती जा रही है. सवाल यह है कि हम जैसे ग़रीब जाएं तो कहां जाएं, क्या करें. अपना घर-बार छोड़कर इस उम्मीद के साथ दिल्ली आए थे कि ज़िंदगी आराम से कट जाएगी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी हो जाएगी, लेकिन बढ़ती महंगाई ने हमारे भविष्य पर ग्रहण लगा दिया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि महंगाई ने पूरे देश में ग़रीबों का जीना मुहाल कर दिया है, लेकिन राजधानी की इस प्रवासी आबादी के सामने मुश्किलें कुछ ज़्यादा हैं. घर से हज़ारों किलोमीटर दूर रहकर जीने को विवश इन लोगों का मासिक ख़र्च कम होने की कोई गुंजाइश नहीं. घर का किराया, खाने-पीने का सामान एवं बच्चों की पढ़ाई-लिखाई आदि ख़र्चों में कमी नहीं की जा सकती. दिल्ली में कॉस्ट ऑफ लिविंग जिस तरह लगातार बढ़ती जा रही है, उससे इनके सामने भुखमरी के हालात पैदा हो रहे हैं, लेकिन न तो सरकार और न ही स्वयंसेवी संस्थाओं को इसकी कोई चिंता है. सरकारी गोदामों में रखा अनाज सड़ रहा है, उसे जलाया जा रहा है, लेकिन हमारे कृषि मंत्री उसे ग़रीबों के बीच बांटने से इंकार करते हैं. ग़रीब करें तो क्या करें? सरकार की नीतियां मध्य और उच्च वर्गीय लोगों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं. कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के लिए हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च किए जा रहे हैं, लेकिन प्रवासी लोगों के जीवन को आसान बनाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. यह हालत तब है, जबकि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश एवं उड़ीसा जैसे राज्यों से आने वाले प्रवासी दिल्ली की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. स्वतंत्रता की63वीं वर्षगांठ मना चुका भारत क्या वास्तव में स्वतंत्र है? इस साल 15 अगस्त को राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री के संबोधन को सुनने के बाद यही लगा कि हमारा देश विकास के रास्ते पर आगे भले निकल रहा हो, लेकिन हम अभी भी तमाम तरह के बंधनों के साथ जीने को मजबूर हैं. कश्मीर की समस्या जस की तस बनी हुई है, नक्सलवाद धीरे-धीरे पूरे देश में अपने पैर फैलाता जा रहा है, आर्थिक विषमताओं से सामाजिक ताने-बाने के छिन्न-भिन्न होने का ख़तरा अभी भी मौजूद है और सबसे बड़ी बात यह कि बढ़ती महंगाई ने समाज के निम्न तबके के सामने भुखमरी के हालात पैदा कर दिए हैं. राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने इन सभी समस्याओं के ख़िला़फ कड़े क़दम उठाने का आश्वासन ज़रूर दिया, लेकिन ऐसे आश्वासन तो हम हर साल सुनते आ रहे हैं. कमरतोड़ महंगाई से ग़रीबों के लिए दो जून की रोटी का उपाय करना लगातार दूभर होता जा रहा है और देश की राजधानी दिल्ली में प्रवासी आबादी के सामने भुखमरी की समस्या पैदा हो रही है.

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One thought on “दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

  • September 10, 2010 at 6:21 AM
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    सरे देश में गरीबो का ख्याल नही किया जाता न बजट बनाते वक़्त न पैसा बट्टे वक़त देश को अगर बुलंदी तक ले जाना हे तो सबसे पहले गरीबी को हटाना पड़ेगा लेकिन जो भी सरकार आती हे वो गरीबी तो नही हटा पति लेकिन गरीबो को ज़रूर हटा देती हे असल में देश में बन्ने अली सभी सरकारे अपनी सत्ता को बचने या सत्ता को पाने की जुगत में देश में सम्पर्दयिकता फेलाने से भी नही चुकती अगर इन लोगो को देश के गरीबो की चिंता हो जाये तो गरीबी मिट जाएगी देश से बहार जाने वाले माल पर अगर सरकार टेक्स कम रखे तो देश से जादा माल बहार जायेगा और रोज़गार भी बढता जायेगा जेसे चीन का विश्व की हर मार्केट पर कब्ज़ा हे चीन सस्ता माल दुन्य में बेच रहा हे जिससे उसके माल की खपत जादा हो रही हे इस तरह हम भी कर सकते हे आज हम बहार के माल पर निर्रभर हे जबकि हमारे पास दुनिया के बाज़ार पर अपना माल देने की शमता हे सर्कार की गलत नीतियों के कारन देश देश गरब हे

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