खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन बना रही है. इस विधेयक को लाने के पीछे सरकार की दलील है कि इससे मुल्क में जीएम फूड और फसलों को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ भूख की समस्या भी हल होगी. ऐसे व़क्त में जब दुनिया के कई मुल्कों ने अपने यहां जेनेटिक मोडिफिकेशन से विकसित फसलों की खेती पर पाबंदी लगा दी है, तब हमारे मुल्क के नीति नियंताओं द्वारा इसकी खेती के लिए दरवाजे खोलना किसी के भी गले नहीं उतर रहा है. ग़ौरतलब है कि बीते साल जैव प्रौद्योगिकी नियामक द्वारा बीटी बैगन की व्यवसायिक खेती को मंजूरी मिलने के बाद से ही पूरे मुल्क में यह बहस जारी है कि जीन परिवर्धित खाद्यानों की खेती क्या हमारी ज़रूरत बन गई है या हम इसे हड़बड़ी में बिना इसके ख़तरों को जाने-पहचाने अपने यहां लागू कर रहे हैं? बीटी बैगन के देशव्यापी विरोध के बाद हालांकि सरकार ने उस व़क्त अपने बढ़ते क़दम पीछे खींच लिए थे, लेकिन अपना इरादा नहीं बदला. इसी का नतीजा है कि जीएम फूड लाने के लिए इस मर्तबा सरकार पूरी तैयारी से आ रही है. संसद में इसके लिए बाक़ायदा विधेयक लाया जा रहा है. इस विधेयक में अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे कई प्रावधान हैं, जो विधेयक की नीयत पर सीधे-सीधे सवाल खड़े करते हैं.
अमेरिका की जीएम फूड कंपनियों और उनके उत्पाद मुल्क में जल्द से जल्द और बिना किसी रोक-टोक आ सकें, इसके लिए सरकार कमर बांध कर तैयारियों में लगी हुई है. विधेयक के मार्फत दरअसल सरकार जीएम फसलों के विरोध को पूरी तरह कुचलना चाहती है. इस पूरी कवायद के पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निजी हित भी काम कर रहे हैं. लिहाज़ा वे जीएम फसलों के हक़ में माहौल बना रही हैं. प्रायोजित रिसर्च के जरिए इन फसलों के फायदे गिना रही हैं. अफसोस की बात यह है कि इन प्रायोजित रिसर्चों में हमारे कृषि वैज्ञानिक भी आगे-आगे हैं.
बीते कुछ सालों से खाद्य सुरक्षा, जीएम तकनीक एवं उसके उत्पादों के नतीजों की ओर अवाम और सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचने में सक्रिय संगठन पैरवी के निदेशक अजय कुमार झा विधेयक के कई प्रावधानों से सहमत नहीं हैं. वह कहते हैं कि इस विधेयक में स्वास्थ्य और जैव सुरक्षा को लेकर बहुत कमज़ोर नियम हैं. यहां तक कि हिंदुस्तानी हालत और उपयुक्तता को देखने के लिए कई इलाक़ों में परीक्षण की बात यह विधेयक नहीं करता है. ग़ैर जीएम प्रजातियों के संदूषण को रोकने के लिए भी इसमें कोई प्रावधान नहीं है. न ही संदूषण के लिए बीज निर्माता पर कोई ज़िम्मेदारी डाली गई है. जानकारी के संदर्भ में भी इसमें बहुत बेतुके प्रावधान हैं. इनके मुताबिक़ जीएम फूड के बारे में किए गए किसी भी निर्णय को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा गया है. साथ ही जीएम फूड और फसलों के बारे में बिना सबूत ग़लत और भ्रामक जानकारी फैलाने वालों के लिए गंभीर दंड का प्रावधान है. जब दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों में मानव, जीव-जंतुओं और पर्यावरण पर जीएम फूड के दूरगामी प्रभावों के बारे में एक राय नहीं है, ऐसे में इन प्रावधानों का मक़सद निश्चित तौर पर जीएम फूड और फसलों का विरोध कर रहे लोगों को प्रताड़ित करना है.
विधेयक में इसके अलावा एक कमी और है, इसमें स्वामीनाथन टास्क फोर्स की अनुशंसाओं को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया है. स्वामीनाथन टास्क फोर्स ने सरकार को अपनी स़िफारिशें सौंपते हुए कहा था कि किसी भी बायो तकनीक नियमन नीति का मक़सद पर्यावरण की सुरक्षा, किसान परिवार का कल्याण, कृषि व्यवस्था का पर्यावरणगत एवं आर्थिक टिकाऊपन, उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के मामले में सुरक्षा और देशी-विदेशी व्यापार की सुरक्षा एवं देश की जैव सुरक्षा. लेकिन अफसोस! विधेयक बनाते समय इन चिंताओं पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया. विधेयक में जिस तरह के प्रावधान हैं, वे जीएम तकनीक और उत्पादों का नियमन नहीं, बल्कि विनियमन का काम करेंगे. दिखने में भले ही यह विधेयक नया दिख रहा हो, पर एक तरह से देखें तो यह विधेयक पुराने एनबीआरए नामक बिल का थोड़ा बदला रूप है, जिसका मुल्क भर में कृषि विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और 11 सूबाई सरकारों ने कड़ा विरोध किया था. बावजूद इसके अमेरिका की जीएम फूड कंपनियों और उनके उत्पाद मुल्क में जल्द से जल्द और बिना किसी रोक-टोक आ सकें, इसके लिए सरकार कमर बांध कर तैयारियों में लगी हुई है. विधेयक के मार्फत दरअसल सरकार जीएम फसलों के विरोध को पूरी तरह कुचलना चाहती है. इस पूरी कवायद के पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निजी हित भी काम कर रहे हैं. लिहाज़ा वे जीएम फसलों के हक़ में माहौल बना रही हैं. प्रायोजित रिसर्च के जरिए इन फसलों के फायदे गिना रही हैं. अफसोस की बात यह है कि इन प्रायोजित रिसर्चों में हमारे कृषि वैज्ञानिक भी आगे-आगे हैं. यहां तक कि सरकार भी राष्ट्रीय हितों की ह़िफाज़त करने के बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वागत में लगी हुई है.
कुल मिलाकर जीएम फसलों के टेस्ट के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से जितने गहन और लंबे परीक्षण की ज़रूरत होती है, वे वास्तव में हमारे यहां हुए ही नहीं हैं. और यदि हुए हैं तो भी वे नाकाफी हैं. दुनिया भर का तजुर्बा हमें यह बतलाता है कि खेती में जेनेटिक इंजीनियरिंग ख़तरनाक ही साबित हुई है. जहां-जहां भी जीएम खाद्य फसलों का उत्पादन हो रहा है, वहां यह फूड क्रॉप्स के तौर पर नहीं है. अमेरिका, जिसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में हिंदुस्तान के बीज बाज़ार पर क़ब्ज़ा करने की होड़ लगी है, में भी स़िर्फ जीएम सोयाबीन एवं मक्का पैदा किया जा रहा है और उसका इस्तेमाल फूड क्रॉप्स के तौर पर नहीं किया जाता. यूरोप के मुल्कों ने साफ तौर पर अपने यहां बीटी बैगन जैसे जेनेटिक मोडिफिकेशन से विकसित फसलों की खेती पर पाबंदी लगा रखी है. जीएम फूड के नतीजों का गंभीरता से जायज़ा लिए बिना उसे बढ़ावा देने की कोशिश आख़िरकार हिंदुस्तानी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से खेलना है. गोया कि यह फसलें इंसान की सेहत और पर्यावरण दोनों के एतबार से ख़तरनाक हैं. जब तक दीगर मुल्कों में जीएम फसलों के नतीजे साफ नहीं हो जाते, तब तक हिंदुस्तानी सरकार को भी इन फसलों की पैरवी करने से बचना चाहिए, क्योंकि एक बार यह विधेयक पास हो गया तो फिर सरकार के हाथ में भी कुछ नहीं रह जाएगा.
(लेखक अल्पसंख्यक मामलों के जानकार हैं.)
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