गंगा के नाम पर राजनीति

निशंक सरकार एवं उसकी पुलिस योग गुरु बाबा रामदेव के सामने नतमस्तक है. देवभूमि में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की महज़ खानापूर्ति की जा रही है. इस बात का खुलासा हरिद्वार की कनखल पुलिस द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करने वाले 150 अज्ञात आंदोलनकारियों के ख़िला़फ दर्ज की गई प्राथमिक सूचना रिपोर्ट से हुआ. उल्लेखनीय है कि बाबा रामदेव ने हरिद्वार में अपने घोषित कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग दो घंटे तक गंगा रक्षा संगठन के बैनर तले जाम किया था. ज़िला प्रशासन ने इस कार्यक्रम की वीडियोग्राफी भी कराई थी. बाबा रामदेव एवं उनके चेलों ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को तार-तार करते हुए घंटों राजमार्ग जाम करके अपनी राजनीति चमकाई. सैकड़ों लोग इस जाम में फंसकर बेहाल रहे. बाबा की इस दादागिरी को जब मीडिया ने उछाला, तब प्रशासन ने अपनी जान बचाने के लिए कनखल थाने में 150 अज्ञात लोगों के ख़िला़फ प्राथमिकी दर्ज की.

एक प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने अपने शासनकाल में गंगा कार्ययोजना की शुरुआत करके किया था, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते अरबों रुपये ख़र्च होने के बाद भी गंगा को बचाने का काम नहीं हो सका. गंगा को निर्मल बनाने की ज़िम्मेदारी जिन लोगों को सौंपी गई, उन्होंने गंगा साफ होने से पहले ही योजना के समूची रकम साफ कर दी.

देवभूमि उत्तराखंड में इन दिनों गंगा को मुद्दा बनाकर अपनी राजनीति चमकाने की होड़ चल रही है. योगगुरु को भी राजनीति का रोग लग गया है. उन्होंने गंगा को मुद्दा बनाकर एक आंदोलन शुरू किया है. रामदेव ने गंगा पर बन रहे बांधों के विरोध में राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करने की घोषणा की थी. उसी के तहत शंकराचार्य चौक के पास राजमार्ग बंद कर प्रदर्शन किया गया. इस दौरान पूरा प्रशासन मूकदर्शक बना हाथ पर हाथ धरे खड़ा रहा. यहां विकास एवं बांधों के चलते गंगा की जो दुर्दशा हो रही है, वह जगज़ाहिर है. गंगोत्री से उत्तरकाशी तक गंगा की अविरल धारा प्रवाहित नहीं हो पा रही है. लोग लाखों टन कचरा गंगा में गिरा रहे हैं, जिससे अमृत कहा जाने वाला गंगाजल प्रदूषित हो चुका है. हरिद्वार में आज भी कई साधु-संतों के आश्रमों की हज़ारों टन गंदगी गंगा में सीधे गिराई जा रही है. उधर प्रदेश सरकार एवं मुख्यमंत्री निशंक गंगा को लेकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं. उन्होंने अपनी लिखी पुस्तक स्पर्श गंगा की सार्थकता सिद्ध करने के लिए आयोजित कार्यक्रम में जिस तरह सांसद हेमामालिनी को बुला कर जनता की गाढ़ी कमाई लुटा दी, उससे तो गंगा का अब तक कोई भला हुआ नहीं दिखता. गंगा अब इस राज्य में सबके लिए अपनी राजनीति चमकाने का एक नया प्लेटफार्म बनकर उभरी है. एक बड़ा तबका, जिसमें ठेकेदार एवं उनके समर्थक शामिल हैं, बांधों का खुला समर्थन कर रहा है. वहीं तीन बड़े संत द्वारिका पीठाधीश्वर स्वरूपानंद सरस्वती, वासुदेव नंद सरस्वती एवं माधवाश्रम महाराज सनातन धर्मावलंबियों के बीच जान देकर भी गंगा को बचाने की शपथ खाते हैं. हिमालय की कोख में जब तक उक्त संत रहते हैं, तब तक स्थानीय जनता के दबाव में चुप्पी साधे रहते हैं. पहाड़ से उतरते ही इन्हें भी गंगा पर राजनीति सूझती है. सच्चाई यह है कि जनता को गंगा के महत्व के बारे में इन संतों ने बताना ही बंद कर दिया है. उसे यह नहीं बताया-समझाया जा रहा है कि गंगा सबकी मां है, गंगाजल अमृत समान है. प्रदेश के राजनेता भी गंगाजल और बांध बनाकर बिजली बेचकर धन कमाने के मंसूबे पाले बैठे हैं. किसी के मन में गंगा के प्रति आदर नहीं बचा है.

एक प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने अपने शासनकाल में गंगा कार्ययोजना की शुरुआत करके किया था, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते अरबों रुपये ख़र्च होने के बाद भी गंगा को बचाने का काम नहीं हो सका. गंगा को निर्मल बनाने की ज़िम्मेदारी जिन लोगों को सौंपी गई, उन्होंने गंगा साफ होने से पहले ही योजना के समूची रकम साफ कर दी. एक बार फिर मनमोहन सिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करते हुए गंगा बेसिन अथारिटी का गठन करके उसके महत्व को स्वीकारा है. इसके बावजूद पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश एवं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री निशंक समेत अनेक लोग गंगा पर राजनीति कर रहे हैं.

गंगा को बचाने के लिए चिपको जैसे आंदोलन की आवश्यकता है. स्थानीय लोगों को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर एक ईमानदार कोशिश करनी होगी. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती का मानना है कि जिस तरह मां गंगा ने हमें सब कुछ दिया है, उसी तरह हम सबको भी ईमानदार प्रयास करना चाहिए. बाबा रामदेव द्वारा गंगा के नाम पर राजनीति और जनता के लिए परेशानी खड़ा करने से पूरा संत समाज दु:खी है. गंगा को बचाने के लिए प्रो. जी डी अग्रवाल भी हरिद्वार के मातृ सदन में गांधीवादी तरीक़े से आमरण अनशन कर रहे हैं. उनके आंदोलन को पूरे देश से समर्थन मिल रहा है. सूबे की सरकार एवं पुलिस ने रामदेव को राजनीति करने का जो मंच प्रदान किया, उससे बाबा की जमकर चर्चा हुई, लेकिन इस तरह के आंदोलनों से गंगा का भला नहीं होने वाला. रामदेव को समझना चाहिए कि सबकी मां गंगा को ऐसा कोई रास्ता पसंद नहीं है, जो लोगों को परेशानी में डालता हो, शांति भंग करता हो.

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One thought on “गंगा के नाम पर राजनीति

  • September 5, 2010 at 1:51 PM
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    सरकार को कानून का राज लाना चहिया .कोई बाबा कानून से बड़ा नहीं है बाबा रामदवे को कानून की मर्यादा का धयान रखना चाहिया .गंगा तो सब की माँ है .

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