घोटाले के घेरे में गोगोई सरकार

जब से असम के उत्तर कछार पर्वतीय स्वशासी ज़िला परिषद में एक हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले का मामला उजागर हुआ है, तबसे राज्य की तरुण गोगोई सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई है. इस घोटाले से स्पष्ट हो गया है कि असम के शासन तंत्र में भ्रष्टाचार किस हद तक प्रभावी हो चुका है. इस घोटाले का भी पता न चल पाता, अगर उग्रवादी संगठन डीएचडी के कुछ सदस्य एक करोड़ रुपये की नगदी के साथ रंगे हाथ पकड़े नहीं जाते. शुरू-शुरू में ऐसा लगा कि स्वशासी ज़िला परिषद के कुछ अधिकारियों एवं उग्रवादियों की साठगांठ से यह घोटाला हुआ, जिसके तहत विकास मद की राशि का दुरुपयोग किया गया. लेकिन जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अपने पहले मामले के रूप में इस घोटाले की जांच शुरू की, तब स्पष्ट होने लगा कि इस घोटाले के तार गोगोई मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों और एक पूर्व राज्यपाल से भी जुड़े हुए थे. एक राष्ट्रीय अंग्रेजी साप्ताहिक में जब इस घोटाले से संबंधित रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो असम की राजनीति में भूचाल आ गया. जब विपक्ष ने इस मामले को लेकर हंगामा खड़ा कर किया तो मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने अख़बार की रिपोर्ट को ग़लत बताते हुए विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह राजनीतिक फायदे के लिए बिना वजह शोरशराबा कर रहा है. विपक्ष मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहा था, जिसे गोगोई बराबर ठुकराते रहे, लेकिन जब केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने मुख्यमंत्री गोगोई को दिल्ली बुलाकर मामले की सीबीआई जांच कराने के लिए कहा, तब गोगोई को मजबूरी में जांच का आदेश देना पड़ा.

तरुण गोगोई की व्यक्तिगत छवि अब तक जनता की नज़रों में स्वच्छ और ईमानदार नेता के रूप में रही है. अभी भी उनके ख़िला़फ सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगाया गया है. मुख्यमंत्री के रूप में उनके दूसरे कार्यकाल में उत्तर कछार का घोटाला सामने आने पर भी उनकी ईमानदारी पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया गया.

इससे सवाल पैदा होता है कि केंद्र के दबाव के बावजूद गोगोई सरकार सीबीआई जांच टालने की कोशिश क्यों कर रही थी? क्या सरकार को इस बात का डर था कि सीबीआई जांच होने पर कई ताक़तवर मंत्री बेनकाब हो सकते थे? शायद यही वजह है कि राज्य सरकार ने सीबीआई को समूचे घोटाले की जांच करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि उत्तर कछार स्वशासी ज़िला परिषद के केवल पांच विभागों में वित्तीय अनियमितताओं की जांच का दायित्व सौंपा. गोगोई सरकार के इस रवैये की वजह से असम की जनता के मन में स्वाभाविक रूप से सरकार की भूमिका को लेकर संदेह पैदा हुआ है. इसी बीच एक ग़ैर सरकारी संगठन कृषक मुक्ति संग्राम परिषद के नेता अखिल गोगोई ने गुवाहाटी में संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर कुछ प्रमाण पेश करते हुए गोगोई मंत्रिमंडल के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत विश्वकर्मा पर आरोप लगाया कि घोटाले की रकम से उन्होंने 40 लाख रुपये की दो कारें ख़रीदी हैं. पुरी में एक अतिथिगृह बनाया है, जिसकी क़ीमत बीस करोड़ रुपये है और करोड़ों रुपये की लागत से टीवी चैनल खोला है.

हालांकि गोगोई सरकार ने सीबीआई को घोटाले की जांच के लिए सीमित अधिकार दिए, इसके बावजूद ज़िले के समाज कल्याण अधिकारी आर एच ख़ान और उग्रवादी संगठन डीएचडी के अध्यक्ष निरंजन होजाई की गिरफ़्तारी से सीबीआई कई महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करने में सफल रही है. गोगोई मंत्रिमंडल के एक मंत्री ने हवाला के ज़रिए राज्य के बाहर करोड़ों रुपये भेजे थे. गुवाहाटी में हवाला कारोबार करने वाले तीन व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया है. आर एच ख़ान के एक रिश्तेदार के घर से सीबीआई ने 14 करोड़ रुपये बरामद किए हैं. इस तरह के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि विकास मद की राशि मंत्रियों, अधिकारियों और उग्रवादियों ने आपस में बांट ली थी. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम से मिलकर अनुरोध किया कि उत्तर कछार के घोटाले की विस्तृत जांच कराई जाए और दोषियों को गिरफ़्तार किया जाए. जब महंत ने चिदंबरम से मुलाक़ात की तो उसके अगले ही दिन महंत पर दबाव बनाने के लिए तरुण गोगोई ने घोषणा की कि वह महंत के कार्यकाल में हुए एलओसी घोटाले की जांच सीबीआई से कराएंगे. सवाल यह पैदा होता है कि एलओसी घोटाले के मुद्दे पर गोगोई पिछले नौ सालों से ख़ामोश क्यों थे और अब वह अचानक उसकी जांच क्यों कराना चाहते हैं? इससे स्पष्ट होता है कि उत्तर कछार घोटाले को लेकर विपक्ष के तेवरों से मुख्यमंत्री बौखला गए हैं.

तरुण गोगोई की व्यक्तिगत छवि अब तक जनता की नज़रों में स्वच्छ और ईमानदार नेता के रूप में रही है. अभी भी उनके ख़िला़फ सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगाया गया है. मुख्यमंत्री के रूप में उनके दूसरे कार्यकाल में उत्तर कछार का घोटाला सामने आने पर भी उनकी ईमानदारी पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया गया. अल्पसंख्यक वोट बैंक के प्रति कांग्रेस की चिरपरिचित कमज़ोरी के बावजूद जब इत्र के कारोबारी बदरुद्दीन अजमल ने सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत की तो गोगोई ने उनके साथ गठजोड़ से इंकार करके जनता के बीच एक ज़िम्मेदार नेता की छवि बनाई. पहले कार्यकाल के अंत में जब गोगोई ने कबूल किया कि वह शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार को रोक नहीं पा रहे हैं तो लोगों ने उनकी साफगोई की तारी़फ की. एक ऐसे स्पष्टवादी मुख्यमंत्री को अब हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले को लेकर रक्षात्मक मुद्दा अपनाना पड़ रहा है. इसे देखते हुए लोगों के मन में संदेह पैदा हो रहा है.

शुरू से ही इस घोटाले को लेकर गोगोई घबराहट का परिचय दे रहे हैं. सबसे पहले उन्होंने घोषणा की कि उनका कोई मंत्री उत्तर कछार के घोटाले में शामिल नहीं है. इस तरह की घोषणा के साथ ही गोगोई ने संकेत दे दिया कि वह बचाव की मुद्रा अपना रहे हैं. फिर उन्होंने सीबीआई जांच की मांग को ठुकराया और केंद्र के दबाव में जांच का आदेश दिया भी तो सीबीआई को सीमित अधिकार दिए. अगर गोगोई को पूरा विश्वास था कि उनके मंत्रिमंडल का कोई मंत्री घोटाले से जुड़ा नहीं है तो उन्हें फौरन सीबीआई जांच कराकर जनता का विश्वास जीत लेना चाहिए था. गोगोई की घबराहट से जनता के बीच यही संकेत गया है कि सरकार घोटाले में लिप्त मंत्रियों का बचाव करना चाहती है और कुछ अधिकारियों को बलि का बकरा बनाना चाहती है.

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