जो कुछ नहीं कर सकता, वह लॉ कर लेता है…, इस सवाल से सबकी फटती क्यों है?, लाइफ बड़ी कुत्ती चीज़ है…और इस दुनिया में कुत्तों का स़िर्फ एक ही जवाब है…कमीने.
इन सतही, घटिया संवादों को किसी राह चलते शोहदे या सिरफिरे ने अचानक अपने मुंह से नहीं उगला है, बल्कि इनकी बाक़ायदा रचना की गई है, वर्तमान तथाकथित संवाद लेखकों ने. पहले दो संवाद फिल्म गुलाल (2009) के हैं और तीसरा फिल्म कमीने (2009) का. गुलाल के संवाद लिखे हैं अनुराग कश्यप ने और कमीने में अपनी रचनाकारी का प्रदर्शन किया है विशाल भारद्वाज ने कैनेडियन कैजेटन ब्वॉय के साथ मिलकर. कमीने का ही एक और संवाद देखिए-मेरे पास ड्यूरेक्स नहीं है…वैसे भी हमारे बीच कोई तीसरा आए, मुझे पसंद नहीं है. अगर आपने असली दूध पिया है तो बूझिए कि संवाद का संदेश क्या है, अन्यथा माथा पीट लीजिए, लेखक तो अपने मकसद में स़फल हो गया.
माना कि व्यवसायिकता की धुंध और फिल्म निर्माताओं का ज़बरदस्त दबाव है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि लेखक अपना धर्म ही भुला दे? क्या वह अपने रचनाकर्म की गरिमा को नज़रअंदाज़ कर देगा, यह जानते हुए भी कि उसके द्वारा जो लिखा जा रहा है, वह उसी समाज, घर-परिवार के लिए है, जिसका लेखक-रचनाकार खुद सदस्य है?
अब वाकई लगने लगा है कि ज़माना बदल गया है. कब कौन किस बात को गीत कहकर सामने परोस देगा, कब संवाद कहकर, कहा नहीं जा सकता. रचनाकारों की लेखनी ने अपना स्वभाव बदल लिया है, कोई भी नैतिक मूल्य उसके लिए मायने नहीं रखता. उद्देश्य स़िर्फ इतना है कि जो लिख गया, वह बिक जाए या फिर जो बिके, वही लिखा जाए. समाज, घर-परिवार, लाज-शर्म जाए भाड़ में. अगर ऐसा न होता तो कोई रचनाकार यह नहीं लिख सकता कि लाइफ बड़ी कुत्ती चीज़ है… क्योंकि जीवन बहुत अनमोल है, ईश्वर का वरदान है…और कुत्ता भी एक जीव है, जिसे उसी विधाता ने बनाया है, जिसने हम सबको बनाया है और कई मामलों में कुत्ते इंसान से कहीं बेहतर साबित होते हैं.एक जमाना था, जब संवाद किसी फिल्म की जान हुआ करते थे.
लोग सिनेमाहॉल से घर पहुंचते-पहुंचते उन संवादों को कई-कई बार दोहराया करते थे, ताकि याद हो जाएं और वे उन्हें मौक़ा पड़ने पर इस्तेमाल कर सकें. तब संवादों के अर्थ होते थे, फूहड़ता-अश्लीलता उनके पास फटकती तक नहीं थी. संवाद किसी का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि नायक का दबदबा कायम करने के लिए लिखे जाते थे. इसलिए 1975 में आई फिल्म शोले का संवाद-तेरा क्या होगा कालिया, लोग जब-तब अपने किसी मित्र-विरोधी के लिए बेहिचक इस्तेमाल कर लिया करते हैं, वह भी घर-परिवार के बीच बैठे हुए भी. फिल्म दीवार (1975) का संवाद- मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता, 35 सालों बाद भी खुद्दारी की निशानी माना जाता है.
मेरे पास मां है (दीवार), हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं, चल धन्नो आज तेरी इज्ज़त का सवाल है, पचास-पचास कोस दूर गांव में जब रात में बच्चा रोता है… (शोले), जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते, डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है (डॉन), हम जहां पर खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है (कालिया), आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें ज़मीन पर मत रखिएगा, मैले हो जाएंगे (पाकीज़ा) एवं अनारकली, सलीम की मोहब्बत तुम्हें मरने नहीं देगी और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे (मुगलेआज़म) जैसे संवाद देखते-देखते कालजयी हो गए. वजह इन संवादों के अपने अर्थ हैं, संदेश हैं, इनमें वजन है. सबसे बड़ी बात यह कि खुलेपन के नाम पर इनमें फूहड़पन नहीं हैं. इन्हें कहीं भी-कभी भी बोला-दोहराया जा सकता है.
आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें ज़मीन पर मत रखिएगा… (पाकीज़ा-1972) जैसे सौम्य, शिष्ट संवाद ने कई बार विज्ञापन फिल्मों में जगह पाई थी. इसे रचा था कमाल अमरोही ने. ऐसा होता था तब के संवादों का जादू.अपने जमाने के प्रख्यात खलनायक-चरित्र अभिनेता कादर ़खान को भी संवाद लेखन में महारत महारत हासिल थी. मूछें हो तो नत्थूलाल जैसी, संवाद आज 26 साल बाद भी उतना ही ताजा है, बड़ी-बड़ी घनी मूछों वाले किसी शख्स को देखते शराबी (1984) का यह संवाद बरबस मुंह पर आ जाता है.
यही नहीं, बीते ज़माने के अभिनेता, चरित्र अभिनेता एवं खलनायक संवाद अदायगी के फन में माहिर थे. एक-एक शब्द चबा कर बोलना कोई राजकुमार से सीखे-जॉनी, ये बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं, चल जाए तो जान भी जा सकती है… अमिताभ बच्चन की फिल्में देखते समय लोगों का ध्यान संवादों पर ज़रूर रहता था. नाना पाटेकर भी अपनी उम्दा संवाद अदायगी के लिए मशहूर हैं-मराठा मारता है या मरता है…मेरा भारत महान, सौ में निन्यानबे बेईमान… शोले का संवाद-बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना सुनते ही वीरू यानी धर्मेंद्र अनायास याद आ जाते हैं. उनके पुत्र सन्नी देओल ने भी फिल्म दामिनी (1993) में बेहतरीन संवाद अदायगी की- तारीख पर तारीख…, यह ढाई किलो का हाथ किसी पर पड़ जाता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है. इस संवाद के लिए सन्नी देओल को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. अपने जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना की संवाद अदायगी का अपना एक अलग ही अंदाज था. फिल्म अमर प्रेम (1972) में उनके द्वारा बोला गया संवाद- पुष्पा, ऐ पुष्पा आई हेट टियर्स रे…तब लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था. राजेश खन्ना अभिनीत फिल्म आनंद (1971) का एक संवाद आज भी लोगों को जीवन दर्शन का संदेश देता है-जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है, जिसे न आप बदल सकते हैं, न मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ बंधी है. कब कौन कैसे उठेगा, यह कोई नहीं जानता.
कहने का आशय यह है कि संवाद हों या गीत अथवा अन्य कोई रचना, लेखक-रचनाकार का उद्देश्य हमेशा यह होना चाहिए कि उसका रचनाकर्म सार्थक, सद्अर्थी एवं सकारात्मक रहे, ताकि उसका संदेश किसी भी मायने में भटकाव न पैदा करे, क्योंकि वह पूरे समाज और प्रत्येक घर-परिवार तक पहुंचता है, उसके हर सदस्य से रूबरू होता है, जो बड़ा-बूढ़ा भी हो सकता है और किशोरवय भी.
Related posts:
- ये कहां आ गए संजू बाबा
- फिल्म रिव्यूः अपार्टमेंट की थ्रिलर कहानी
- बारबरा की शैतानी
- मैं किसी से कम नहीं
- बदले बदले से जनाब
|
|
|



