कला का राजनीति से कोई नाता नहीं

यदि आज के हालात में बस्तर जाने के नाम पर कुछ लोगों को सिहरन होने लगे तो ग़लत नहीं होगा, किंतु व्यापक संदर्भ में ऐसा नहीं है. नक्सली हिंसा के चलते इस क्षेत्र के बारे में दुनिया में एक दूसरी ही छवि बनी है, लेकिन बस्तर की अपनी ही दुनिया है. ऐसी दुनिया, जहां प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाले लोग रहते हैं, जहां आज भी छल-प्रपंच एवं आडंबर का नामोनिशान नहीं है. अपनापन है, सादगी है. यहां की अपनी अनूठी संस्कृति और परंपराएं हैं, लेकिन सुविधाभोगी सभ्य समाज की नज़र में यह क्षेत्र जंगली और पिछड़ा है. यहां की निराली परंपराओं से ही अभिभूत होकर ब्रिटेन से आए मिशनरी वेरियर एल्विन अपना कार्य छोड़कर यहां पहले सेवा करने लगे और फिर अध्ययन में जुट गए. यहीं इन्होंने विवाह भी किया. बस्तर के आदिवासी समाज की परंपराओं में ढोकरा शिल्प निर्माण भी एक है. वैसे तो यहां पर काष्ठ, प्रस्तर, लौह एवं टेराकोटा शिल्प भी है, किंतु यहां के धातु शिल्प ढोकरा का कोई जवाब नहीं है. आज भी यह अपने आदिरूप में देखने को मिलता है. आदि है तो अनूठा है और सुंदर भी. लोकतत्वों से भरपूर इस शिल्प की बाज़ार में मांग है. जिस तरह तीजनबाई पंडवानी शैली को छत्तीसगढ़ की धरती से देश-दुनिया में ले गईं, ठीक वही श्रेय जयदेव बघेल को जाता है, जिन्होंने प्रयोगधर्मिता का समावेश कर बस्तर के धातु शिल्प को देश-दुनिया तक पहुंचाया. मान-सम्मान मिलने के बाद ज़्यादातर लोग अपनी माटी को छोड़ चमक-दमक भरी ज़िंदगी अपना लेते हैं, किंतु जयदेव ने ऐसा नहीं किया. वह गांव जहां उन्होंने इस कला का ककहरा पढ़ा, आज भी उनकी कर्मस्थली है. यह गांव है राष्ट्रीय राजमार्ग-43 पर रायपुर से 230 किलोमीटर दूर बस्तर ज़िले में कोंडागांव से सटा भेवलवांपदरपारा.

आदिवासी क्षेत्रों में गढ़वा या ढोकरा शिल्प सदियों पुराना है, किंतु बस्तर के इस शिल्प की अपनी पहचान है. इसके लिए कच्चा माल यानी मिट्टी, मोम, पीतल एवं तांबा आदि सब जगह मिल जाता है. ढोकरा कला 4000 साल पुरानी है. यहां बनने वाली कलाकृतियां बहुत कुछ सिंधु घाटी एवं हड़प्पा से मिली वस्तुओं से मेल खाती हैं. 60 साल की आयु में भी बघेल की सुबह इसी शिल्प निर्माण से शुरू होती है.

गांव की सीमा में प्रवेश करते ही घर-घर में धातु शिल्प के दर्शन होते हैं. मुख्य मार्ग से जैसे ही गांव की धूल भरी सड़क पर आप चंद क़दम चलते हैं तो एक बड़ी, किंतु अलग सी हवेली दिखती है, जिसे देखकर कोई भी सहजता से कह सकता है कि यह किसी कलाकार का ही घर हो सकता है. यह पूछने के लिए कि क्या जयदेव बघेल यहीं रहते हैं, मैं दरवाज़ा खटखटा देता हूं. प्रवेश का संकेत मिलता है. नज़र दौड़ाने पर एक साथ कई लोग काम में मशगूल दिखते हैं. कोने पर बने टिन शेड में गुंथी हुई मिट्टी को कुछ महिला कलाकार हाथों से आकार दे रही हैं. कुछ लोग मिट्टी के ढांचे पर काला धागा सा लपेट रहे हैं. धौंकनी से भट्टी को झोंका जा रहा है और समीप खड़ा एक साठ वर्षीय आदिवासी बुज़ुर्ग निर्देश दे रहा है कि ऐसे नहीं, ऐसे करो. सुप्रसिद्ध बस्तरिया डोकरा कला के शिल्पी के रूप में जयदेव बघेल का नाम छत्तीसगढ़ में आदर के साथ लिया जाता है. इनके पिता चालीस के दशक में अबूझमाड़ से आकर यहां बसे. वह यहां पर खेती करते और जो खाली समय मिलता, उसे पारंपरिक हस्तशिल्प के निर्माण में लगाते. यहीं पैदा हुए बालक जयदेव ने पिता से 16 साल की उम्र तक आते-आते आदिवासी डोकरा कला के सारे गुर सीख लिए. डोकरा कला की सारी बारीकियां समझ में आने लगीं. ज़िंदगी के शुरुआती दिनों में जयदेव ने नौकरी भी की, किंतु वह रास न आई, क्योंकि मन तो कला में बसा था.

घर लौटकर इस कार्य को आगे बढ़ाने का निश्चय किया. पूंजी चाहिए थी, सो ॠण लेने के इरादे से बैंक गए, लेकिन बैंक ने पांच सौ रुपये से अधिक ॠण देने में असमर्थता जता दी. इस पर जयदेव ने घर के गहने बेच डाले और बड़े स्तर पर अपना काम शुरू किया. उत्साह एवं लगन से लबरेज जयदेव बघेल ने इस कला को आजीविका बनाने और इसे दिशा देने के लिए जो भी प्रयोग किए, वे सफल रहे. उनकी कृतियां लोगों का ध्यान खींचने लगीं. इसी बीच मध्य प्रदेश सरकार की नज़र उनके काम पर गई और उन्हें सरकारी मेलों, शिल्प प्रदर्शनियों में बुलाया जाने लगा. 1972 से 2008 के बीच उन्होंने दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरू, भोपाल एवं पुणे आदि में लगभग दो दर्जन से अधिक प्रदर्शनियों में निजी एवं सामूहिक रूप से भाग लिया. शिल्पगुरु बघेल के साथ यह कला पहले प्रांत, फिर देश में पहुंच गई. अब विदेशी मंचों के द्वार भी उनके लिए खुलने लगे. पहले अमेरिका, फिर रूस, फ्रांस एवं ब्रिटेन में हुए भारत महोत्सवों में बघेल को बुलाया गया. बाद में उन्होंने स्विट्‌जरलैंड, आस्ट्रेलिया, इटली, जर्मनी, सिंगापुर, थाईलैंड एवं जापान आदि देशों की अनेक यात्राएं कीं. अमेरिका प्रवास का अनुभव बांटते हुए बघेल कहते हैं कि वह जब शिल्प बनाते थे तो घंटों तक अमेरिकी दर्शक उसे निहारते रहते थे और जब कृति तैयार हो जाती तो मुंहमांगी क़ीमत पर ख़रीद लेते.

आदिवासी क्षेत्रों में गढ़वा या ढोकरा शिल्प सदियों पुराना है, किंतु बस्तर के इस शिल्प की अपनी पहचान है. इसके लिए कच्चा माल यानी मिट्टी, मोम, पीतल एवं तांबा आदि सब जगह मिल जाता है. ढोकरा कला 4000 साल पुरानी है. यहां बनने वाली कलाकृतियां बहुत कुछ सिंधु घाटी एवं हड़प्पा से मिली वस्तुओं से मेल खाती हैं. 60 साल की आयु में भी बघेल की सुबह इसी शिल्प निर्माण से शुरू होती है. वह नए-नए डिज़ाइनों, कच्चे माल में दूसरी धातुओं के सम्मिश्रण, विभिन्न रंगों के प्रयोग और अपनी कल्पनाशीलता की वजह से परंपरागत शिल्प में प्रयोगार्थी के रूप में जाने जाते हैं. उनके यही प्रयोग इस कला को स्थापित करने में महत्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं. इससे इसमें निखार आया और सामग्री बाज़ार में प्रतिस्पर्धा करने लायक़ बनी. जयदेव द्वारा निर्मित सामग्री देश के कई संग्रहालयों एवं कला वीथिकाओं की शोभा बढ़ा रही हैं. सैकड़ों शिल्पियों को उन्होंने इस कला के गुर सिखाए, जो इसे अपनी आजीविका बना चुके हैं. बघेल देश-प्रदेश के कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं. वह मध्य प्रदेश सरकार के अलावा मास्टर क्राफ्ट्‌समैन, गोल्ड लैक पुरस्कार, बाबा साहेब अंबेडकर राष्ट्रीय सम्मान, कमला देवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय शिल्प पुरस्कार एवं शिल्पगुरु आदि सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं. 2003 में रविशंकर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि प्रदान की. बघेल पर कई किताबें भी लिखी जा चुकी हैं. क्या कभी राजनीति में जाने की सोची? पूछने पर वह बताते हैं, नहीं, कला का राजनीति से क्या नाता? इससे कलाकार की एकाग्रता टूट जाती है. हां, इंदिरा जी मुझे राज्यसभा में नामित सदस्य बनाने की इच्छुक थीं, किंतु यह कला हमेशा जिंदा रहे, इसलिए हमने उस प्रस्ताव में रुचि नहीं ली.

भेवलवांपदरपारा आज धातु शिल्प एक गढ़ है तो कोंडागांव तहसील मेंलौह, प्रस्तर एवं टेराकोटा का काम भी हो रहा है, जिससे 3-4 हज़ार लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार मिला है. अंत में वह अपना संग्रह दिखाते हैं. वह प्रत्येक कृति की थीम के बारे में थोड़ा-थोड़ा बताते हैं. भेवलवांपदरपारा में अब सांझ होने को है. झोपड़ियों एवं शेडों से अब भी धुआं उठ रहा है. कई जगह मोम लगे मिट्टी के सांचे पक चुके हैं. कुछ जगह कलाकार क्रूसीबेल में पिघली धातु को पक चुके सांचों में डाल रहे हैं. बड़ी सतर्कता से काम हो रहा है. यह एक ऐसा क्षण होता है, जब थोड़ी भी चूक इन कलाकारों की मेहनत को बर्बाद कर सकती है. बस्तर के इन कलाकारों के हुनर की बात आज कहां हो रही है भला!

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