यदि 15 अगस्त के दिन राष्ट्रीय अवकाश नहीं होता तो हम में से कितने लोग इस दिन को याद रखते? हम खुले तौर पर इसे माने या न माने, लेकिन इस साल स्वतंत्रता दिवस रविवार के दिन पड़ने से अधिकांश लोग निराश थे. उन्हें लगा, जैसे उनके साथ धोखा हुआ है. वैसे भी स्वतंत्रता दिवस को होने वाले आयोजन अब दोहरेपन का एहसास दिलाते हैं, बोरियत का अनुभव होता है. अब एक ज़्यादा रोचक सवाल, क्या हम वास्तव में 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुए थे? हालांकि यह तथ्य भावनाओं के ज्वार और खंभे पर लहराते तिरंगे के नीचे दबकर रह गया है, लेकिन सच्चाई यही है कि हमें इस दिन वास्तविक स्वतंत्रता नहीं मिली थी. 1947 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के अंतर्गत डोमिनियन स्टेटस का दर्जा मिला था. देश का बंटवारा कर दो उपनिवेशों के गठन का रास्ता तैयार करने के लिए इंग्लैंड की संसद ने इस क़ानून में आवश्यक संशोधन किया था. इस क़ानून में यह व्यवस्था की गई थी कि भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग गवर्नर जनरल होंगे, जो दोनों देशों की सहमति से इंग्लैंड की राजशाही द्वारा नियुक्त किए जाएंगे. जवाहरलाल नेहरू ने प्रशंसनीय दूरदर्शिता दिखाते हुए अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन से अपने पद पर बने रहने का अनुरोध किया और उन्हें कैबिनेट की रक्षा समिति का सभापति बना दिया. नेहरू का यह फैसला भावनाओं पर आधारित नहीं था, बल्कि तर्कसंगत था, क्योंकि तत्कालीन भारतीय सेना के अधिकांश अधिकारी अंग्रेज थे और उन्हें अचानक ही किसी भारतीय के मातहत काम करना नागवार गुजर सकता था. नेहरू का यह फैसला भविष्य में जम्मू कश्मीर के लिहाज़ से काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ. माउंटबेटन पाकिस्तान के भी गवर्नर जनरल बनना चाहते थे, लेकिन जिन्ना ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बनने के बजाय वह ब्रिटेन सरकार द्वारा नियुक्त पहले राष्ट्राध्यक्ष बनने को राजी हो गए.
लेकिन इतिहास में पुरानी पड़ चुकी इन घटनाओं की अब कोई अहमियत है? इनकी यही अहमियत है कि जम्मू और कश्मीर में अब तक ख़ून बह रहा है. 1947 के विभाजन ने भारत और पाकिस्तान के दो फाड़ ज़रूर कर दिए, लेकिन यह दो सबसे बड़ी रियासतों यानी कश्मीर और हैदराबाद के मसले का हल नहीं निकाल पाया. मुस्लिम बहुल कश्मीर के हिंदू राजा और हिंदू बहुल हैदराबाद के मुस्लिम निजाम को जाने क्यों ऐसा लगा कि वे दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं.
26 जनवरी, 1950 को नया संविधान अपनाए जाने के बाद भारत एक संप्रभु राष्ट्र बना. इसके बाद देश में वयस्क मताधिकार के आधार पर आम चुनाव हुए और पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के हाथों में सत्ता आई. पाकिस्तान के राजनीतिक हालात इससे बिल्कुल जुदा थे. सरकारों को मनमाने ढंग से बर्खास्त किया जा रहा था. यही वजह है कि पाकिस्तान में 1956 में नया संविधान लागू हो पाया, लेकिन इसके ठीक बाद सैन्य तख्तापलट ने नए संविधान के चिथड़े उड़ाकर रख दिए. संयुक्त बंगाल के आख़िरी प्रधानमंत्री एवं पाक संसद से नए संविधान को मंजूरी दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले क़ानून मंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी ने अपनी आत्मकथा में एक बड़ी ही रोचक घटना का उल्लेख किया है. मई, 1953 में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने पाकिस्तान के पहले बंगाली प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को संसद में बहुमत हासिल करने के ठीक बाद बर्खास्त कर दिया. इसकी वजह यह थी कि नजीमुद्दीन सैनिकों की संख्या में क़रीब 30 हज़ार की कमी करने का फैसला ले चुके थे. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि गुलाम मोहम्मद ने इस बात का ख़ास ध्यान रखा कि नजीमुद्दीन अपनी बर्खास्तगी को निरस्त कराने के लिए इंग्लैंड की महारानी से संपर्क करने की कोशिश न करें और इसीलिए उनके घर के टेलीफोन की लाइन काट दी गई. यह हास्यास्पद भले लगे, लेकिन सच्चाई यही है कि महारानी एलिजाबेथ के पास ऐसा करने की शक्ति थी.
लेकिन इतिहास में पुरानी पड़ चुकी इन घटनाओं की अब कोई अहमियत है? इनकी यही अहमियत है कि जम्मू और कश्मीर में अब तक ख़ून बह रहा है. 1947 के विभाजन ने भारत और पाकिस्तान के दो फाड़ ज़रूर कर दिए, लेकिन यह दो सबसे बड़ी रियासतों यानी कश्मीर और हैदराबाद के मसले का हल नहीं निकाल पाया. मुस्लिम बहुल कश्मीर के हिंदू राजा और हिंदू बहुल हैदराबाद के मुस्लिम निजाम को जाने क्यों ऐसा लगा कि वे दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं. बंटवारे के ठीक बाद नेहरू ने माउंटबेटन से कहा था कि कश्मीर के भविष्य पर चर्चा करने के लिए सबसे उपयुक्त समय 1948 के जाड़े में होगा, क्योंकि इससे पहले तक उनकी सरकार राहत और पुनर्वास के कार्यों में ही व्यस्त रहेगी. अक्टूबर, 1946 में विद्रोह के नाम पर भारत के ख़िला़फ सैन्य कार्रवाई कर पाकिस्तान ने कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की संभावनाओं को समाप्त कर दिया. पाकिस्तान ने कश्मीर पर बलपूर्वक क़ब्ज़े के लिए युद्ध की नीति न अपनाई होती तो 1948 में ही इस समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकल चुका होता. भारत और पाकिस्तान को डोमिनियन स्टेटस का दर्जा देने वाले क़ानून में रियासतों की स्वतंत्रता से संबंधित कोई प्रावधान नहीं था. इस क़ानून के तहत भारतीय उपमहाद्वीप में इंग्लैंड की राजशाही सर्वशक्तिमान थी. गवर्नर जनरल माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान को कश्मीर पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा करने से रोक दिया. पाक सेना की कार्रवाइयों का प्रतिरोध करने के लिए उन्होंने पहले कश्मीर का भारत में विलय कराया, जिससे कश्मीर में भारतीय सेना के प्रवेश की पृष्ठभूमि तैयार हुई और आक्रमणकारियों को राज्य से बाहर खदेड़ना संभव हो पाया. भारतीय सेना के खुले तौर पर युद्ध में शरीक होने के बाद जिन्ना ने अपने देश की सेना को जवाबी कार्रवाई करने का आदेश दिया. तभी उन्हें डोमिनियन स्टेटस में अपनी हैसियत का अंदाज़ा हुआ, क्योंकि पाक सेना के कार्यवाहक कमांडर जनरल सर डगलस ग्रेसी ने जिन्ना के आदेश को मानने से इंकार कर दिया. लंदन की मूक सहमति के बाद पाक सेना 1948 के जाड़े में ही इस युद्ध में शामिल हुई. वह माउंटबेटन ही थे, जिन्होंने नेहरू को कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में भेजने के लिए तैयार किया. कितनी हैरानी की बात है कि आज सीमा के दोनों ओर माउंटबेटन को दुश्मनी की निगाहों से देखा जाता है. पाकिस्तान में उन्हें ऐसे वायसराय के रूप में देखा जाता है, जिसने खुले तौर पर भारत और नेहरू का पक्ष लिया. वहीं भारत में उन्हें ऐसे खलनायक के रूप में देखा जाता है, जिसने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के पास भेजने में अहम भूमिका निभाई. अच्छी सोच रखने वाले लोगों का यह हश्र हैरान करता है, लेकिन यह भी सच है कि इनकी सोच वास्तविकताओं से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी. कश्मीर का मसला आज संयुक्त राष्ट्र, जनमत संग्रह और यहां तक कि भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध के दायरे से भी आगे निकल चुका है. 1947 की लड़ाई से दोनों देशों को सिवाय अव्यवस्था के और कुछ हासिल नहीं हुआ. युद्ध दोबारा भी हुआ तो इससे मामले के समाधान की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती. हम यदि इतिहास से कोई सबक ले सकते हैं तो बस यही कि पाकिस्तान ने जिस युद्ध की शुरुआत की थी, वह तबाही को खुला आमंत्रण था. नेहरू और माउंटबेटन जिस शांतिपूर्ण रास्ते की वकालत कर रहे थे, बातचीत के उस तरीक़े से ही कश्मीर समस्या का कोई हल संभव है.
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