किसान आंदोलनः जमीन जाएगी तो नक्‍सली बनेंगे

किसान के लिए ज़मीन स़िर्फ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं होती. ज़मीन किसान की पहचान है, ज़मीन किसान के जीने का सहारा है, शायद इसीलिए बुद्ध सिंह ज़मीन को धरती मां कह रहे हैं. मथुरा के चौकरा गांव के किसान बुद्ध सिंह की उत्तेजना बोलते व़क्त अचानक बढ़ जाती है. कहते हैं, हम मर जाएंगे, लेकिन अपनी धरती मां को बिकने नहीं देंगे. असल में उत्तर प्रदेश सरकार बुद्ध सिंह की 20 बीघा ज़मीन का अधिग्रहण करना चाहती है, हाईटेक सिटी बनाने के लिए. बुद्ध सिंह के साथ आए कई किसान यह भी कह रहे थे कि अगर सरकार ज़बरदस्ती ज़मीन पर क़ब्ज़ा करती है तो किसानों के पास नक्सली बनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा. यह कहानी अकेले बुद्ध सिंह की नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हज़ारों-लाखों किसानों की है. वैसे यमुना एक्सप्रेस-वे के नाम पर पहले ही किसानों की ज़मीन सरकार ले चुकी है. वह भी बहुत ही कम दर पर. इसी का नतीजा था कि जिस दिन देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, उस दिन अलीगढ़ और मथुरा की सड़कों पर पुलिस किसानों पर लाठियां बरसा रही थी. इतना ही नहीं, सुरक्षाबलों की गोली से किसानों की मौत भी हुई.

किसान जागा तो नेताओं की भी नींद टूटी, लेकिन इस बार किसान किसी नेता के भरोसे नहीं हैं. वे जान देने को तैयार हैं, लेकिन ज़मीन नहीं. 114 साल पुराने भू-अधिग्रहण क़ानून को बदलने की मांग है. संसद में बैठे नेताओं को सोचना होगा. जब एक प्रदेश के किसान दिल्ली आते हैं तो वह पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाती है. अगर पूरे देश के किसान एक मंच पर, दिल्ली आ जाएं तो फिर क्या होगा?

यमुना एक्सप्रेस-वे और हाईटेक सिटी बनाने के नाम पर जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में अगस्त के अंतिम सप्ताह में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आए हज़ारों किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर आकर अपनी आवाज़ केंद्र सरकार तक पहुंचाने की कोशिश की. ये किसान केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण क़ानून का विरोध कर रहे थे, साथ ही इस परियोजना के लिए अधिग्रहीत ज़मीन का मुआवज़ा बढ़ाने की मांग कर रहे थे. ज़्यादातर किसानों का कहना था कि वे इस तरह की किसी भी परियोजना के लिए अपनी ज़मीन नहीं देना चाहते. वैसे तो इस रैली का नेतृत्व राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह कर रहे थे, लेकिन रैली को समर्थन देने के लिए लगभग समूचा विपक्ष मंच पर मौजूद था. भाजपा, लोजपा, जद(यू), सीपीआई(एम) एवं सीपीआई के नेता भी एक सुर से केंद्र सरकार को कोस रहे थे. हालांकि जंतर-मंतर पर हुई इस रैली में कांग्रेस का कोई नुमाइंदा नज़र नहीं आया. कुछ दिन पहले राहुल गांधी अलीगढ़ में आंदोलन कर रहे किसानों से मिल चुके थे. राहुल गांधी ने किसान आंदोलन को अपना समर्थन भी दिया था. फिर भी दिल्ली की रैली में कांग्रेस किसानों के समर्थन में नहीं आई. दिलचस्प यह रहा कि रैली के दिन ही सुबह-सुबह राहुल गांधी किसानों के एक दल के साथ प्रधानमंत्री से मिल आए और उन्होंने उनसे भूमि अधिग्रहण क़ानून में बदलाव का वादा ले लिया. दोपहर तक राहुल गांधी उड़ीसा के आदिवासियों के पास पहुंच चुके थे. दरअसल किसान आंदोलन की बढ़ती सरगर्मी देखकर इन नेताओं को यह एहसास हो गया था कि दिल्ली पहुंचने का रास्ता यानी उत्तर प्रदेश में सियासी फायदा उठाने का व़क्त आ गया है. अजित सिंह की राजनीति को मिलने वाला ऑक्सीजन तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हवा से ही आता है, इसलिए उनका इस आंदोलन में कूदना स्वाभाविक था, लेकिन विपक्षी पार्टियों से लेकर राहुल गांधी तक का किसान आंदोलन में दिलचस्पी दिखाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था. अगले दो महीनों के भीतर उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में सभी दल ख़ुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी बताने में जुट गए.

लेकिन किसानों का रुख़ इन नेताओं से अलग था. नेता जहां किसान आंदोलन की आड़ में अपना-अपना राजनीतिक लाभ देख रहे थे, वहीं मथुरा से आए एक किसान करण सिंह एवं उनके साथियों ने चौथी दुनिया से बातचीत में कहा कि अब चाहे जयंत चौधरी, अजित सिंह आवे या न आवे, हम अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ेंगे. यानी किसानों को इस बात का एहसास हो चुका है कि उनके नेता जब कभी आवाज़ उठाते भी हैं तो स़िर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए. किसान यह समझ चुके हैं कि उन्हें अपनी लड़ाई ख़ुद ही लड़नी होगी. चौथी दुनिया ने जब किसानों से यह पूछा कि आप लोग आख़िर किस आधार पर भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं तो उनका कहना था कि सरकार हमसे कम क़ीमत पर ज़मीन लेकर उसे उद्योगपतियों को ऊंचे दामों पर बेचेगी और फिर उद्योगपति उसी ज़मीन को करोड़ों में बेचकर मुना़फा कमाएंगे. इस सबके बीच हमें क्या मिलेगा? अगर उद्योगपतियों को ज़मीन चाहिए तो वे सीधे हमसे आकर बात करें, हम अपनी ज़मीन का रेट ख़ुद तय करेंगे. कुछ किसान ऐसे भी थे, जो हाईटेक सिटी के नाम पर एक इंच ज़मीन भी देने के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे ही एक किसान सुल्तान सिंह कहते हैं कि हमारी ज़मीन (आगरा-मथुरा क्षेत्र) देश की सबसे उपजाऊ ज़मीन है, खाद्यान्न का भंडार है. फिर ऐसी ज़मीन का अधिग्रहण सरकार क्यों करना चाहती है? ऐसी जगह पर हाईटेक सिटी या अन्य उद्योग लगाए जाते, जहां की ज़मीन बंजर है. ज़ाहिर है, सुल्तान सिंह का यह सवाल न स़िर्फ वाजिब है, बल्कि सरकार की नीयत पर भी संदेह पैदा करता है.

अब सरकार की नीयत चाहे जो भी हो, लेकिन किसान इस बार शांत होकर चुपचाप बैठने वाले नहीं हैं. बूढ़े से लेकर जवान तक, हर किसान मोर्चा लेने को तैयार है. वे धमकी भी दे रहे हैं दिल्ली वालों को. युवा किसान सुशील कुमार कहते हैं कि अगर हमारी मांगें न मानी गईं तो हम दिल्ली का भोजन, पानी, दूध, पेट्रोल एवं डीजल बंद कर देंगे. 70 वर्षीय किसान कान्हा कहते हैं कि वह मरने के लिए तैयार हैं, लेकिन ज़मीन देने के लिए नहीं. ज़ाहिर है, कान्हा जैसे बूढ़े किसान का जज़्बा युवा किसानों में जोश भरने का काम कर रहा है. रैली में आए किसानों का एक दल ऐसा भी था, जो ज़मीन न देने की बात तो नहीं कर रहा था, लेकिन उचित मुआवज़े की मांग पर ज़रूर टिका था. गजरौला से आए किसान महिपाल सिंह का कहना था कि उत्तर प्रदेश सरकार हमारी ज़मीन का मुआवज़ा नोएडा में दिए गए मुआवज़े के बराबर दे. दरअसल नोएडा में अधिग्रहीत की गई प्रति वर्ग मीटर ज़मीन के बदले 900 रुपये से ज़्यादा का मुआवज़ा दिया गया था. जबकि अभी जिन ज़मीनों का अधिग्रहण हो रहा है, उनका मुआवज़ा महज़ 500 रुपये प्रति वर्ग मीटर के आसपास है. हालांकि शुरुआती आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मथुरा और अलीगढ़ के किसानों को प्रति वर्ग मीटर 490 रुपये के स्थान पर 570 रुपये मुआवज़ा देने की घोषणा की थी, लेकिन किसानों को यह मंजूर नहीं है. उन्हें नोएडा के बराबर ही मुआवज़ा चाहिए. ज़ाहिर है, नीति निर्माताओं को भविष्य के गर्भ में छुपे संदेश को अभी ही पढ़ लेना होगा. किसानों की समस्याएं अभी ही सुलझा लेनी होंगी, अन्यथा आने वाला व़क्त कितना भयावह हो सकता है, इसकी स़िर्फ कल्पना ही की जा सकती है.

आज़ाद देश का गुलाम क़ानून

आज़ादी के 63 सालों बाद भी देश में कई ऐसे क़ानून हैं, जो बेवजह की समस्याएं पैदा करते रहते हैं. ताजा मामला उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण, मुआवज़े और किसान आंदोलन से जुड़ा है. अलीगढ़, मथुरा और आगरा में किसानों के आंदोलन से अंग्रेजों द्वारा बनाए गए क़ानून की उपयोगिता पर सवाल खड़े हो गए हैं. भारत का भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 में अंग्रेजों ने बनाया था और यही क़ानून आज भी चल रहा है. अंग्रेजों ने यह क़ानून इस उद्देश्य से बनाया था कि रेल लाइनें बिछाई जा सकें. तब सड़क और हवाई अड्डे बनाने के लिए ज़मीन की ज़रूरत थी. अगर कोई किसान अपनी ज़मीन नहीं देना चाहता था तो अंग्रेज सरकार इस क़ानून के ज़रिए जबरन ज़मीन अधिग्रहीत कर लेती थी. यही स्थिति आज भी देश में है. अब सवाल है कि क्या गुलाम और आज़ाद देश की स्थितियों में कोई फर्क़ नहीं आया है? अगर आया है तो फिर इस क़ानून को क्यों नहीं बदला गया, जो देश के सबसे कमज़ोर तबके यानी किसानों के हित और अहित से जुड़ा है?

पिछले कुछ सालों में भूमि अधिग्रहण के जितने विवादास्पद मामले सामने आए हैं, उनमें कहीं न कहीं सरकार द्वारा किसानों से जबरन भूमि लिए जाने की घटना शामिल थी. चाहे वह सेज का मामला हो या नंदीग्राम या सिंगुर का. आख़िर सरकार ऐसी ज़मीन पर उद्योग आदि लगाती ही क्यों है, जिस पर खेती होती है, जो किसान के जीने का सहारा होती है. क्या वास्तव में ऐसी परियोजनाओं की ज़रूरत आम आदमी को है? उदाहरण के लिए अलीगढ़ और मथुरा के किसानों को यमुना एक्सप्रेस-वे से क्या फायदा होगा? क्या ये किसान इस सड़क पर पैसा देकर यात्रा करना पसंद करेंगे? वह भी तब, जब पहले से ही इस क्षेत्र में कई अच्छी सड़कें हैं. नर्मदा पर बांध बनाने के नाम पर जिन लोगों की ज़मीनों का अधिग्रहण किया गया था, आज तक उनका पुनर्वास नहीं हो सका. ऐसे में केंद्र सरकार को संवेदनशील रवैया अपनाते हुए इस सवा सौ साल पुराने क़ानून में परिवर्तन करने चाहिए. ऐसे परिवर्तन, जो आम आदमी, किसानों के हित में हों.

  • सवा सौ साल पुराना है भूमि अधिग्रहण क़ानून
  • अंग्रेजों का बनाया क़ानून किसान विरोधी है
  • ज़मीन के बदले चाहते हैं उचित मुआवज़ा
  • खेती की ज़मीन का न हो अधिग्रहण