नगर निगम और स़फाई व्यवस्था

आप जिस शहर में रहते हैं, जिस घर में रहते हैं, उसके बदले नगर निगम को टैक्स देते हैं. इसलिए शहर, सड़क और गलियों की सफाई की ज़िम्मेदारी भी नगर निगम की बनती है. फिर भी आप जिस मुहल्ले में रहते हैं, वहां नगर निगम की तऱफ से सफाई का काम नहीं होता है तो इसे निगम की लापरवाही ही कहेंगे. ऐसे में निगम को उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास कराने के लिए आपके पास सूचना का अधिकार नामक एक मज़बूत हथियार है. इस अंक में हम इसी मसले से संबंधित आरटीआई आवेदन प्रकाशित कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल आप अपने मुहल्ले की गलियों और सड़कों की सफाई कराने के लिए कर सकते हैं. आप इस आवेदन के ज़रिए निगम से सफाई व्यवस्था से संबंधित सूचनाएं मांग सकते हैं. मसलन, सफाई कर्मचारियों, जो उक्त क्षेत्र की सफाई के लिए नियुक्त किए गए हैं, के नाम, नंबर और पते के बारे में भी पूछ सकते हैं. इसके अलावा इस अंक में हम अपने पाठकों के कुछ पत्र भी शामिल कर रहे हैं. हमें उम्मीद है कि आप सभी इस आवेदन का इस्तेमाल करेंगे, साथ ही पाठकों के पत्रों से भी आपको लाभ होगा.

पाठकों के पत्र

भुगतान नहीं मिला

मैंने पारिवारिक परिस्थितियों की वजह से जुलाई 2009 में रेलवे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी. मैं स्टेशन मास्टर के पद पर कार्यरत था. बावजूद इसके अब तक मुझे बोनस, सिक्योरिटी मनी और ग्रेच्युटी आदि का अंतर भुगतान नहीं किया गया. 13 महीने बीत चुके हैं. मैंने आरटीआई का इस्तेमाल भी किया था, लेकिन न तो मुझे संतोषजनक सूचना मिली और न ही मेरा काम अब तक हो पाया है. अब मुझे क्या करना चाहिए?

– अशोक कुमार गुप्ता, इटावा, उत्तर प्रदेश.

आप सबसे पहले एक साधारण आवेदन देकर अपने विभाग से अपनी समस्या के निराकरण के संबंध में पूछें और उसकी एक कॉपी प्राप्ति रसीद के साथ अपने पास रख लें. 10 या 15 दिनों बाद आप एक आरटीआई आवेदन देकर यह पूछ सकते हैं कि अब तक आपके आवेदन पर क्या कार्रवाई हुई. अगर नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई और इसके लिए ज़िम्मेदार अधिकारी का नाम और पदनाम पूछें. यह भी पूछें कि इस तरह के मामलों के निपटारे के लिए विभाग ने क्या कोई समय सीमा तय की है और अगर की है तो क्या आपके मामले में उस समय सीमा का पालन हुआ. नहीं हुआ तो इसके लिए किसे दोषी माना जाएगा और उसके खिलाफ विभाग क्या कार्रवाई करेगा. हां, अपने आरटीआई आवेदन के साथ पहले दिए गए पत्र की एक कॉपी और प्राप्ति रसीद ज़रूर लगाएं.

सिंचाई विभाग ने नहीं दिया सरकारी लाभ

मेरे पिता जी उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में थे. अंत में टिहरी परियोजना में रहते हुए रिटायर हुए थे. 1990 में टिहरी जल विकास निगम का गठन होने पर टिहरी परियोजना के अधिकांश कर्मियों ने निगम की सेवा शर्तों को स्वीकारते हुए उसे ज्वाइन कर लिया. मेरे पिता भी निगम में आ गए. वह 1994 में रिटायर हुए. सरकारी लाभ के नाम पर उन्हें मात्र 29 हज़ार रुपये मिले. कोई अन्य लाभ नहीं मिला. सरकार भी इस मामले में संवेदनहीन है.

– विनय कुमार निषाद, बस्ती, उत्तर प्रदेश.

आपकी समस्या वाकई गंभीर है. साथ ही इसमें क़ानूनी पेचीदगियां भी हैं. सूचना क़ानून का इस्तेमाल भी आप चाहें तो कर सकते हैं. सीधे सरकार से इस संबंध में सवाल पूछ सकते हैं. याद रखें, स़िर्फ सवाल पूछें. वैसे सवाल, जिनका सीधा संबंध आपके मामले से है. जहां तक जनहित याचिका के बारे में आपने पूछा है तो यह एक बहुत ही आसान प्रक्रिया है, लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि जो भी मामला आप अदालत में ले जा रहे हैं, वह वास्तव में जनहित से जुड़ा हो. ऐसा न लगे कि यह स़िर्फ आपकी व्यक्तिगत समस्या है. अच्छा होगा कि आप इस मामले में किसी वकील से एक बार सलाह-मशविरा कर लें. आपके पत्र से पता चलता है कि आपका संबंध पीसीआरएफ संस्था से भी है. यह संस्था आरटीआई पर काम करती है. इस संस्था से कुछ वकील भी जुड़े हैं. बेहतर होगा कि आप एक बार इस संस्था में व्यक्तिगत रूप से जाकर मिलें, अपनी समस्या बताएं. हमें उम्मीद है कि आपको मदद मिलेगी.

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