वक्त बदला, माहौल बदला और बदल गया है बाहुबलियों के प्रति जनता का मिजाज भी. नीतीश कुमार की सरकार में बाहुबलियों की जो फजीहत हुई, उसके बाद तो दबंगों को अपने नाम के आगे बाहुबली जोड़ने में डर लगने लगा है. स़िर्फ क़ानून से ही नहीं, बल्कि जनता से भी. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार के तथाकथित बाहुबलियों का जो हाल हुआ है, उससे उनकी चूलें हिल गई हैं. यही वजह है कि आसन्न बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर बाहुबली पहले से ज़्यादा सतर्कता बरत रहे हैं. दिल बदला, दल बदल रहे हैं और जनता के डर से कई तो जगह भी बदल रहे हैं. आज हर बाहुबली अपने नए ठौर की तलाश में है.
पिछले लोकसभा चुनाव को छोड़ दें तो बिहार के चुनावों में इन बाहुबली उम्मीदवारों की अपनी अलग ही पहचान होती थी, लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान नीतीश सरकार में स्पीडी ट्रायल के बाद बाहुबलियों की उड़ान पर एक तरह से कहें तो ब्रेक लग गया. इन पांच सालों के दौरान स्पीडी ट्रायल में तेज़ी आने का आलम यह रहा कि कई बाहुबलियों के बायोडाटा में सजायाफ्ता जुड़ गया.
पिछले लोकसभा चुनाव को छोड़ दें तो बिहार के चुनावों में इन बाहुबली उम्मीदवारों की अपनी अलग ही पहचान होती थी, लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान नीतीश सरकार में स्पीडी ट्रायल के बाद बाहुबलियों की उड़ान पर एक तरह से कहें तो ब्रेक लग गया. इन पांच सालों के दौरान स्पीडी ट्रायल में तेज़ी आने का आलम यह रहा कि कई बाहुबलियों के बायोडाटा में सजायाफ्ता जुड़ गया. 2005 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 2009 के लोकसभा चुनाव में बाहुबली उम्मीदवारों को जनता ने भी नकार दिया. 2009 का लोकसभा चुनाव बाहुबली उम्मीदवारों के लिए ज़्यादा कड़वा रहा. कई जगह बाहुबलियों ने खुद सजायाफ्ता होने के बाद अपनी पत्नी को मैदान में उतारा, लेकिन ये मैडम बाहुबली भी चुनाव मैदान में औंधे मुंह गिरीं. जनता ने वोट की ताक़त से इनकी गन की ताक़त को दबा दिया. सरकार अपना काम कर रही है और न्यायपालिका अपना काम. पिछले साढ़े चार सालों के दौरान बिहार में विभिन्न न्यायालयों द्वारा 49 हज़ार से ज़्यादा अपराधियों को सजा सुनाई गई है. जाहिर है, इसमें कई बाहुबली भी हैं. लेकिन बाहुबलियों को कम करके आंकना भी ग़लत होगा, क्योंकि बिहार की राजनीति में बाहुबलियों के रसूख में कमी आई है, खात्मा नहीं हुआ. अब पूर्व सांसद आनंद मोहन को लें. गोपालगंज के ज़िलाधिकारी कृष्णैया हत्याकांड में निचली अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई है, वह जेल में हैं, लेकिन उनका राजनीतिक रसूख कम नहीं हुआ है. इसे हम क्या कहेंगे कि पिछले लोकसभा चुनाव में अगल-थलग पड़ा आनंद मोहन का परिवार आज सभी प्रमुख दलों के लिए हॉट केक हो गया है. पिछले लोकसभा चुनाव में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद जदयू से नाता तोड़कर कांग्रेस में चली गईं. आनंद मोहन भी नाराज थे. आरोप लगा रहे थे कि सरकार के इशारे पर उन्हें और उनके परिवार को परेशान किया जा रहा है, लेकिन पिछले दिनों एक शादी समारोह में शिरकत करने खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके घर गए. उनकी मां से आशीर्वाद लिया.
इसके कुछ दिनों बाद ही राजद प्रमुख लालू प्रसाद के निर्देश पर उनके सिपहसालार रामकृपाल यादव ने सहरसा जेल जाकर आनंद मोहन से घंटों बातचीत की. कुछ यही हाल है सीवान के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन का. पिछले पंद्रह सालों तक लालू प्रसाद के शासनकाल में सत्ता के दुलारे रहे शहाबुद्दीन को नीतीश सरकार में जेल की सलाखों में डाल दिया गया. जिसके नाम से सीवान का बच्चा-बच्चा डरता था, आज वह एक मुजरिम हो गया. पिछले लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद के कहने पर शहाबुद्दीन की बेगम हिना सहाब मैदान में उतरीं. राजद ने टिकट दिया था, लेकिन चुनाव में हार मिली. जो अपने थे, उन लोगों ने भी साथ छोड़ दिया. अब चर्चा है कि जेल में बंद शहाबुद्दीन से जदयू के कई वरीय नेताओं ने संपर्क किया है और उनकी पत्नी को टिकट देने का वादा भी. पिछले दिनों मुख्यमंत्री के सीवान दौरे के क्रम में उनके शहाबुद्दीन के घर जाने की भी चर्चा थी, लेकिन ऐन मौके पर कार्यक्रम में तब्दीली हो गई. बताया जाता है कि नीतीश कुमार के कार्यक्रम के कारण हिना सहाब उसी दिन दिल्ली से सीवान आई थीं. इस खबर के बाद पूर्व विधायक अखलाक अहमद सहित राजद के कई नेताओं ने सीवान जेल जाकर शहाबुद्दीन से मुलाकात की थी.
अब बिहार शरीफ से राजद के पूर्व विधायक पप्पू खान को लें. निचली अदालत ने पप्पू खान को एक आपराधिक मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई है तो अब उनकी पत्नी आफरीना सुल्तान सक्रिय हो गई हैं. नवादा के आतंक कहे जाने वाले अशोक महतो और उनके विरोधी अखिलेश सिंह भी इस बार जोर आजमाने के मूड में हैं. हालांकि अखिलेश की पत्नी अरुणा देवी पिछले चुनाव में हार गई थीं. बदले माहौल में अखिलेश सिंह भी अपना पाला बदलने की तैयारी में हैं. हालांकि नवादा में इस बार विधानसभा चुनाव के दौरान काफी उलटफेर होने की संभावना है, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह यहां मतदाताओं ने बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी को हराया, उससे कई बाहुबली भी हिल गए. यहां से भाजपा के भोला प्रसाद सिंह जीते थे. हालांकि इस जिले में बाहुबलियों की कोई कमी नहीं है. कौशल यादव और उनकी पत्नी पूर्णिमा देवी अभी काबिज हैं. पूर्व मंत्री आदित्य सिंह का परिवार भी अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने का कोई मा़ैका गंवाना नहीं चाहेगा, भले ही उन्हें कांग्रेस का सहारा मिले या नहीं. इसके अलावा पूर्व मंत्री राजवल्लभ यादव के पास भी अपना राजनीतिक सफर बचाने का अहम मौक़ा है. सीमांचल की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के लिए भी यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है. पिछले लोकसभा चुनाव में पप्पू ने कांग्रेस का दामन थामा था. खुद सजायाफ्ता होने के बाद उन्होंने पत्नी रंजीता रंजन और मां को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन जनता ने नकार दिया. पत्नी रंजीता कांग्रेस में अपनी जगह बनाने के लिए काफी मशक्कत कर रही हैं, लेकिन पार्टी उन्हें टिकट देगी या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा. अंडरवर्ल्ड से विधानसभा तक का सफर तय करने वाले राजन तिवारी का राजनीतिक सफर भी खत्म होने की कगार पर है. खुद चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन भाइयों में भी इतना दम नहीं कि वे अकेले चुनावी वैतरणी पार कर सकें. जदयू से विधायक सुनील पांडे जरूर आश्वस्त हैं. खुद दो बार चुनाव जीते हैं, हिस्ट्रीशीटर भाई भी एमएलसी बन गया है. पार्टी से निलंबित थे, वापसी भी हो गई है और अपहरण के एक मामले में निचली अदालत के उम्रकैद के फैसले को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. ऐसे में वह निश्चिंत हैं. वैसे उनके क़रीबियों की मानें तो पार्टी टिकट दे या नहीं, वह मैदान में उतरेंगे जरूर.
मगध की धरती पर एक बार फिर बाहुबली उतरेंगे. हालांकि काफी कुछ बदल गया है. पूर्व विधायक राजेंद्र यादव का आतंक खत्म हो चुका है. वह जमाना लद गया, जब जेल में रहते हुए उन्होंने पत्नी को विधानसभा में पहुंचा दिया था. सुरेंद्र यादव का असर भी जाता रहा है. एक समय राजद के बाहुबलियों में शुमार सुरेंद्र बेलागंज से विधायक हैं. इसी तरह जहानाबाद में इस बार चर्चित पांडव सेना के पूर्व सरगना चितरंजन सिंह भी टिकट लेने की जुगत में हैं. पिछले चुनाव में चितरंजन सिंह मखदूमपुर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गए थे. इस बार उन्हें भाजपा से टिकट मिलने की आशा है. जबकि देखना दिलचस्प होगा कि घोसी सीट से जदयू किसे टिकट देता है. यहां जदयू सांसद जगदीश शर्मा की पत्नी निर्दलीय विधायक हैं. हालांकि इसी कारण उन्हें पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया था, लेकिन कुछ दिनों पूर्व उनकी वापसी हो गई है. बहरहाल पिछले लोकसभा चुनाव में जनता का रुख और अपना हश्र देखकर बाहुबली सहमे हुए हैं.
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