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नीतीश के नहले पर लालू का दहला

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मैदान चाहे राजनीति का हो या युद्ध का, एक नियम दोनों ही लड़ाई में लागू होता है कि अगर सवाल जीवन-मरण का हो तो राजा को खुद आगे बढ़कर सेना की कमान संभालनी चाहिए. यह ऐसी चाल है, जो थकी-हारी सेना में जीत का जोश भरने के अलावा राजा को यह एहसास दिलाती है कि अगर इस बार चूके तो किस्सा खत्म. इसी नियम को समझते हुए राजनीति के धुरंधर योद्धा लालू प्रसाद एवं रामविलास पासवान ने बिहार में साथ चुनाव लड़ने की कसम खाकर ऐसा पासा फेंक दिया, जिसका जवाब नीतीश कुमार को फिलहाल नहीं सूझ रहा है.

चुनावी आंकड़े बताते हैं कि पिछला विधानसभा चुनाव अगर लालू एवं पासवान मिलकर लड़ते तो नीतीश कुमार कभी सत्ता में नहीं आते. राजद और लोजपा के बीच चुनावी डील की बुनियाद यही चुनावी आंकड़े हैं. आर-पार के इस महासंग्राम में दोनों नेता कोई चूक नहीं चाहते, क्योंकि इस बार छोटी सी चूक का मतलब लालू अच्छी तरह समझते हैं और पासवान भी.

इसके अलावा लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री तो रामविलास के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को उपमुख्यमंत्री के तौर पर पेश करके राजद-लोजपा ने अपने परंपरागत वोट बैंक को बिखरने से बचाने का पुख्ता इंतजाम भी कर लिया. राजद एवं लोजपा के बीच चुनावी डील होगी या नहीं, इसे लेकर पटना से दिल्ली तक लगभग डेढ़ महीने तक सस्पेंस बना रहा. इस दौरान दोनों ही दल के नेता एक दूसरे को अपनी अहमियत बताने में लगे रहे. दोनों दल एक दूसरे को यह एहसास दिला देना चाहते थे कि मेरे बिना तुम्हारा काम इस बार चलने वाला नहीं है. पटना में बात होते-होते दिल्ली पहुंच गई, पर पेंच पर पेंच फंसता गया और समय निकलता चला गया. दोनों पार्टियों के प्रदेश अध्यक्ष डील के लिए ऐसी ज़मीन तैयार कर लेना चाहते थे, जिस पर उनके राष्ट्रीय अध्यक्षों को बात आगे बढ़ाने में ज़्यादा परेशानी न हो, पर यह काम इतना आसान भी नहीं था. उम्मीदवारों की भीड़ के आगे बना बनाया फॉर्मूला अटपटा लगने लगता था.

नीतीश कुमार सत्ता में हैं और भाजपा के साथ उनका गठबंधन है. इसलिए अगर लड़ाई जीतनी है तो अलग रहना आत्मघाती क़दम होगा. यही वजह रही कि लालू प्रसाद ने तमाम दबाव के बावजूद लोजपा को 75 सीटें दे दीं. लालू जानते हैं कि इन 75 सीटों पर गंभीर प्रत्याशी देने में लोजपा को परेशानी होगी, मगर तालमेल बना रहे, इस कारण इस तरह का फैसला भी लिया. कुछ वर्तमान विधायकों की सीट भी क़ुर्बान कर दी.

ऐसा क्षण भी आया, जब लगा कि अब कहानी खत्म हो गई, पर नीतीश के नहले से सहमे राजद एवं लोजपा के नेता आगे बात करने का मोह खत्म नहीं कर पाए. तय हुआ कि अब लालू प्रसाद एवं रामविलास पासवान जो तय करेंगे, उसे दोनों दल स्वीकार कर लेंगे. कई दफा दोनों नेताओं पर परिसीमन और प्रत्याशियों का दबाव ऐसा था कि कौन सी सीट छोड़ी जाए और कौन सी रखी जाए, इस पर दिमाग ही नहीं काम कर रहा था. एक बार तो गरमागरमी इतनी हो गई कि रामविलास कांग्रेस की तरफ भी झांकने लगे, लेकिन लालू प्रसाद यह बात अच्छी तरह समझ रहे थे कि अगर पासवान के साथ गठबंधन न हुआ तो सारा खेल बिगड़ जाएगा और नीतीश को पटखनी देने का उनका संकल्प पूरा नहीं होगा. दरअसल बिहार के पिछले दो चुनाव परिणामों के आंकड़ों को लालू इस बार किसी भी क़ीमत पर नज़रअंदाज करने के मूड में नहीं हैं. अगर बात फरवरी 2005 के चुनाव की करें तो आंकड़े बताते हैं कि लालू एवं पासवान दोनों मिलकर चुनाव लड़ते तो 135 सीटें जीतकर वे सरकार बना सकते थे. इसी तरह अगर नवंबर 2005 में दोनों नेता मिले होते तो उनके 114 प्रत्याशी जीतकर आते और थोड़ी सी राजनीतिक कसरत के बाद वे सरकार बना सकते थे, मगर अलग-अलग कारणों से दोनों ही चुनाव में दोनों नेता अलग थे और इसका पूरा फायदा नीतीश कुमार को मिला और वह बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहे. अपने गर्दिश के दिनों में लालू एवं पासवान ने इन चुनाव नतीजों को काफी बारीकी से परखा और इस फैसले पर पहुंचे कि अपने गिले-शिकवे भूलकर हम दोनों एक हो जाएं और एक साथ चुनावी महाभारत में उतरा जाए. इसकी शुरुआत पिछले लोकसभा चुनाव में हुई, पर इसका पूरा फायदा राजद एवं लोजपा को नहीं मिला.

इसकी वजह भी सा़फ थी कि दोनों दलों के कैडर चुनावी डील के संदेश को समझ नहीं पाए. समय कम था, इसलिए नेता भी जमीन पर बैठे कार्यकर्ताओं को अपनी रणनीति नहीं समझा पाए. नतीजा यह हुआ कि लोकसभा चुनाव में एक बार फिर नीतीश कुमार बाजी मार ले गए. इसके बाद शुरू हुआ मंथन का दौर और यह तय हुआ कि पूरे प्रदेश में जाकर कार्यकर्ताओं को अपनी रणनीति समझाई जाए. जल्द ही इसके नतीजे सामने आ गए. अट्ठारह सीटों के लिए हुए उपचुनाव में नीतीश को पराजय का मुंह देखना पड़ा. विधानसभा चुनाव के लिए इस बार राजद एवं लोजपा में जो डील हुई, उसकी बुनियाद यहीं पड़ गई थी. दोनों नेता और दोनों दलों के कार्यकर्ता यह समझ गए थे कि अगर साथ-साथ नहीं चलेंगे तो खत्म हो जाएंगे. जदयू-भाजपा गठबंधन को अगर सत्ता से बाहर रखना है तो एक दूसरे दलों के प्रत्याशियों को दिल से मदद करनी ही होगी. दोनों दलों के कार्यकर्ता यह भी समझ गए कि अगर राघोपुर का इतिहास दोहराया गया तो नीतीश कुमार जदयू एवं लोजपा को इस बार इतिहास के पन्नों में समेट देंगे. ग़ौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में राबड़ी देवी के चुनाव क्षेत्र राघोपुर में रामविलास पासवान लगभग नौ हज़ार वोट से पिछड़ गए थे. मतलब यादवों का पूरा वोट लालू प्रसाद रामविलास पासवान को नहीं दिला पाए. नतीजा यह हुआ कि रामविलास चुनाव हार गए.

इस कमज़ोरी का एहसास लालू प्रसाद को भी हुआ और उपचुनाव में इस ग़लती को दुरुस्त कर लिया गया. दोनों नेता यह समझ गए कि साथ का मतलब जीत और अलग का मतलब हार है. नीतीश कुमार सत्ता में हैं और भाजपा के साथ उनका गठबंधन है. इसलिए अगर लड़ाई जीतनी है तो अलग रहना आत्मघाती क़दम होगा. यही वजह रही कि लालू प्रसाद ने तमाम दबाव के बावजूद लोजपा को 75 सीटें दे दीं. लालू जानते हैं कि इन 75 सीटों पर गंभीर प्रत्याशी देने में लोजपा को परेशानी होगी, मगर तालमेल बना रहे, इस कारण इस तरह का फैसला भी लिया. कुछ वर्तमान विधायकों की सीट भी कुर्बान कर दी. ऐसा इसलिए कि रामविलास पासवान का साथ मिलता रहे. दूसरी तरफ लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री एवं पशुपति कुमार पारस को उप मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करके राजद एवं लोजपा ने बड़ा दांव खेल दिया है. पिछले विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में यादवों की नाराजगी लालू प्रसाद को झेलनी पड़ी थी. राबड़ी देवी की नेतृत्व क्षमता पर भी कई सवाल उठे थे. बतौर मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के पेश होते ही यादवों की गोलबंदी अचानक तेज़ हो गई है. पासवान वोटों का बिखराव थमने लगा है. दोनों ही दल अपने आधार वोटों में रत्ती भर भी बिखराव नहीं चाहते थे, यही वजह रही कि लालू प्रसाद एवं पारस को प्रोजेक्ट किया गया. इसके बाद की योजना मुसलमानों एवं राजपूतों को ज़्यादा से ज़्यादा टिकट देकर उन्हें पूरी तरह अपने पक्ष में करने की है.

कांग्रेस की तरफ मुसलमानों का झुकाव देखकर लालू प्रसाद एक फुलफ्रूफ योजना पर काम कर रहे हैं. आरएसएस पर प्रतिबंध और रंगनाथ कमीशन की सिफारिशों को लागू करने में कांग्रेस की आनाकानी को राजद अपने चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा बनाएगा. लालू मुसलमानों को बताएंगे कि कांग्रेस केवल उन्हें ठग रही है और सही मायने में राजद ही उनकी सच्ची हितैषी है. चुनाव प्रचार के आगे ब़ढने के साथ एक मुस्लिम उप मुख्यमंत्री का पासा भी फेंका जा सकता है. फिलहाल इस पासे को बचाकर रखा गया है. चुनाव के बीच कभी भी इस पासे को फेंका जा सकता है. इसके अलावा राजद एवं लोजपा की ओर से अगड़ी जातियों के ग़रीबों को आरक्षण देने का वादा भी होने वाला है, ताकि नीतीश से पूरी तरह खफा अगड़ी जातियों का थोक समर्थन हासिल किया जा सके. मतलब तैयारी ऐसी हो रही है कि कहीं कोई चूक न रह जाए, क्योंकि इस चुनाव में चूक का मतलब लालू अच्छी तरह समझते हैं और पासवान भी.

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