ठीक चालीस साल पहले की बात है. 12 नवंबर, 1970 की रात पाकिस्तान में एक जलजला आया था. इसका नाम था भोला. भोला नाम के इस समुद्री तूफान ने पाकिस्तान को इस कदर अपनी आगोश में ले लिया कि 50 लाख से ज़्यादा लोगों की जान चली गई. साढ़े तीन करोड़ से ज़्यादा लोग इससे प्रभावित हुए, गांव के गांव तबाह हो गए. घर, खेत, फसल, सब कुछ चौपट हो गया. इसके कहर का यह आलम था कि तीन महीने के बाद भी देश की पचहत्तर प्रतिशत से ज़्यादा आबादी भोजन के लिए राहतकर्मियों पर आश्रित थी. नई पीढ़ी के अधिकांश लोगों को इसके बारे में ज़्यादा नहीं पता, लेकिन उम्रदराज लोगों की आंखों में इसकी चर्चा होते ही अभी भी आंसू आ जाते हैं. वे यह भी बताते हैं कि एक साल बाद 1971 में पाकिस्तान के बंटवारे और बांग्लादेश के उदय में इस जलजले की बड़ी अहम भूमिका थी. तूफान के बाद चारों ओर फैली अव्यवस्था के बीच सरकार अपने कर्तव्यों के निर्वहन में असफल रही. पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के बीच ऐसा संदेश गया कि सरकार उनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है. सरकार की अकर्मण्यता से पैदा हुई इस भावना ने ऐसा जोर पकड़ा कि आम चुनावों में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को पूर्ण बहुमत मिल गया, जो अंतत: पाकिस्तान के विभाजन के रूप में सामने आया. आज पाकिस्तान एक बार फिर ऐसी ही हालत में है. देश के अधिकांश हिस्सों में आई बाढ़ से लोग त्रस्त हैं और सरकार है कि उसे मानो कोई फिक्र ही नहीं है. वह अपनी ही चिंताओं में व्यस्त है. आम लोगों का जीना दूभर है, लेकिन राजनीतिक नेता फर्ज़ी डिग्री घोटाले के बाद अपनी कुर्सियां बचाने के लिए तिकड़मबाज़ी में व्यस्त हैं.
मुल्क की सरकार भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के चलते पहले ही आम लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. आम जनता नाउम्मीद हो चुकी है. फर्जी डिग्री घोटाले के प्रकाश में आने के बाद उसे यह एहसास होने लगा है कि भ्रष्टाचार के मामले में सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं.
अगस्त के तीसरे सप्ताह में आई इस बाढ़ ने खैबर पख्तूनख्वा, फाटा फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया, बलूचिस्तान और सिंध में सबसे ज़्यादा कहर बरपाया है. आंकड़ों के मुताबिक़, 90 प्रतिशत से ज़्यादा मौतें ग़ैर पंजाबी अल्पसंख्यकों के इलाक़ों में हुई हैं, जबकि सिंध और पंजाब में फसलें पूरी तरह तबाह हो चुकी हैं. सड़कें बह गई हैं, पुल टूट चुके हैं, टेलीफोन लाइनें ध्वस्त हैं. नस्लीय आधार पर देखा जाए तो बाढ़ के चलते होने वाली मौतों में सबसे ज़्यादा संख्या पश्तूनों की है, लेकिन सरकार का रवैया हैरान करता है. पूरा देश बाढ़ की इस विभीषिका से त्रस्त है और राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी अपनी पूर्व निर्धारित विदेश यात्रा पर चले जाते हैं. प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के नेतृत्व वाली संघीय सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रहती है. उसकी आंख तब खुलती है, जब संयुक्त राष्ट्र इसे हाल के सालों की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदा घोषित कर देता है. मतलब यह कि सरकार से पहले अंतरराष्ट्रीय जगत का ध्यान इस ओर जाता है. इसके बाद भी सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह सिंध और पंजाब प्रांतों में राहत कार्यों पर ज़्यादा ध्यान दे रही है, जबकि खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के लोगों को उनकी क़िस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया है. सरकार का यह भेदभावपूर्ण व्यवहार 1970 में याहया खान के सैन्य शासन की याद दिलाता है. तत्कालीन सैन्य शासन ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के साथ भी यही व्यवहार किया था. इसका नतीजा यह हुआ कि बंगाली मुस्लिम आबादी में सरकार के ख़िला़फ असंतोष की भावना भर गई और यही असंतोष बाद में बांग्लादेश के उदय का सबसे बड़ा कारण बना. गिलानी प्रशासन का यह रवैया इसलिए ज़्यादा हैरान करता है, क्योंकि गिलानी एक चुनी हुई सरकार के मुखिया हैं. बलूचिस्तान में आज़ादी के नाम पर चल रहे आंदोलन के चलते स्थितियां पहले ही असामान्य हैं, ऊपर से सरकार की इस दोरंगी नीति के चलते अलगाव की भावना और मज़बूत होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.
सरकार का यह रवैया इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि इसका एक पक्ष देश की सेना से संबंधित है. बाढ़ का सबसे ज़्यादा असर खैबर, पंजाब और फाटा प्रांतों में हुआ है. पाकिस्तानी सेना में शामिल जवानों का अधिकांश हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों से ताल्लुक रखता है. यदि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो सेना में भी सरकार के ख़िला़फ असंतोष की आग फैल सकती है. अलक़ायदा और लश्करे तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के ख़िला़फ अमेरिका के साथ वॉर अगेंस्ट टेरर में व्यस्त सेना के मनोबल पर इसका क्या असर पड़ेगा, इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इसके अलावा प्राकृतिक आपदा के बाद पैदा हुई अव्यवस्था पर नियंत्रण के लिए उचित क़दम नहीं उठाए गए तो आतंकी संगठनों को अपनी स्वार्थ सिद्धि का मौक़ा मिल सकता है.
मुल्क की सरकार भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के चलते पहले ही आम लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. आम जनता नाउम्मीद हो चुकी है. फर्जी डिग्री घोटाले के प्रकाश में आने के बाद उसे यह एहसास होने लगा है कि भ्रष्टाचार के मामले में सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं. देश की आर्थिक हालत इतनी ख़राब है कि सरकार के पास राहत कार्यों के लिए पैसे नहीं हैं और वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगा रही है. क़ानून व्यवस्था का आलम यह है कि देश के कई हिस्सों में सरकार का नामोनिशान तक नज़र नहीं आता. यहां आतंकी और कट्टरवादी संगठनों का राज चलता है. सरकारी संस्थानों पर आम लोगों का भरोसा इतना कमज़ोर हो चुका है कि वे क़ानून को अपने हाथों में लेने को मजबूर हैं. पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आशंका की ख़बरें पहले ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां पाती रही हैं. मौजूदा हालात में लोग सेना की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं. इस विभीषिका के बाद सरकार के निराशाजनक रवैये से अवाम के बीच एक अनजाने डर का माहौल पैदा हो रहा है. उन्हें यह आशंका होने लगी है कि कहीं 1971 के इतिहास की पुनरावृत्ति तो नहीं हो जाएगी.
प्रकृति बड़ी ताक़तवर होती है. 1970 में आए भोला तूफान और उसके चलते पैदा हुई परिस्थितियों ने एक साथ ही पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल बदल कर रख दिया था. आज पाकिस्तान एक बार फिर उसी दोराहे पर खड़ा है. बाढ़ की इस विभीषिका ने देश की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है, लेकिन यह लोगों द्वारा ख़ारिज किए जा चुके राजनीतिक दलों के लिए एक बेहतरीन मौक़ा है. यदि वे अपने रवैये में सुधार करके आम लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए कमर कस लेते हैं तो उन्हें फिर से जनता का विश्वास हासिल हो सकता है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो 1971 के इतिहास की पुनरावृत्ति की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता.
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