रेलवे भर्ती में छत्तीसगढि़यों की उपेक्षा

रेलवे में कर्मचारियों की भर्ती और विवादों के बीच चोली-दामन जैसा रिश्ता है, इसलिए कोई भी भर्ती बिना विवाद पूरी नहीं हो पा रही है. दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे में चार साल पहले गैंगमैन के 3016 पदों पर भर्तियां की गई थीं, जिसमें 4500 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था. तब चयन सूची जारी होने के बाद जमकर विवाद हुआ था. कारण, सूची में बिहार के 2563, झारखंड के 700 और छत्तीसगढ़ के मात्र 327 लोगों का शामिल होना. प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान कई बाहरी उम्मीदवारों के आठवीं कक्षा के अंकपत्र फर्ज़ी पाए गए थे. उक्त मुद्दे को लेकर आंदोलन हुआ था और साथ ही पूरे दस्तावेजों के साथ प्रधानमंत्री तक शिक़ायत भी की गई थी. इसे ध्यान में रखते हुए ज़ोन के तत्कालीन महाप्रबंधक पी सुधाकर ने गैंगमैन पद की भर्ती पर रोक लगा दी थी. मामला शांत होने पर छह माह बाद उसी सूची के आधार पर गैंगमैनों की भर्ती कर दी गई. इसी प्रकार आरपीएफ, चालक ग्रेड-3 की भर्ती भी विवादों में फंस गई थी. चालक ग्रेड-3 में अनुसूचित जनजाति वर्ग में भर्ती को लेकर विवाद हुआ था. इसमें दस्तावेजों के परीक्षण के लिए चौबीस उम्मीदवारों को बुलाया गया, जिसमें 21 मीणा जाति के थे और राजस्थान के रहने वाले थे. उक्त वर्ग में मात्र 3 नाम छत्तीसगढ़ के थे. यह भी सुनने में आया कि उक्त रिक्त पदों पर भर्ती के लिए प्रति अभ्यर्थी 2 से 3 लाख रुपये तक वसूले गए थे.

छत्तीसगढ़ की उपेक्षा का आलम यह है कि 24 फरवरी, 2010 के रोज़गार और नियोजन नामक अ़खबार में रेल मंत्रालय द्वारा विभिन्न जोनों में भर्ती हेतु प्रकाशित विज्ञापन में स्थानीय भाषा वाले खंड में जहां मराठी एवं उड़िया भाषा को शामिल किया गया है, वहीं छत्तीसगढ़ी लापता है. अधिकारियों का तर्क है कि आठवीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को शामिल नहीं किया गया है. इसके बावजूद कोई आवाज़ उठाता नहीं दिख रहा है. यहां रेल जाल न फैले होने से भी समस्याएं पैदा हो रही हैं. आज दल्लीराजहरा लाइन को रावघाट तक ही नहीं, बल्कि जगदलपुर और कांकेर को भी किसी नज़दीकी सुविधाजनक जंक्शन से जोड़ने की ज़रूरत है.

दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे मज़दूर संघ ने सूचना का अधिकार क़ानून का सहारा लेकर खुलासा किया कि पिछले दरवाजे से चालीस से अधिक लोगों की भर्ती कर ली गई. इस खुलासे के बाद महकमे में हड़कंप मच गया. रेलवे मजदूर संघ ने इस भर्ती के लिए रेल महाप्रबंधक को ज़िम्मेदार ठहराते हुए आंदोलन की घोषणा की और कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन किया, जिसमें तीन मंडलों के तक़रीबन 5000 से अधिक कर्मचारियों-बेरोज़गार युवकों ने भाग लिया. जांच में पाया गया कि इन नियुक्तियों के लिए साक्षात्कार ही नहीं लिया गया. सारी नियुक्तियां पिछले दरवाजे से कर ली गईं. आरटीआई के माध्यम से जो सूचना प्राप्त हुई, उसके मुताबिक़, रेलवे बोर्ड के नियमों को दरकिनार करते हुए एक दिसंबर, 2008 से 30 फरवरी, 2009 के बीच 40 से ज़्यादा लोगों की पिछले दरवाजे से भर्ती की गई थी. जबकि सर्कुलर क्रमांक पीएचक्यू/रूलिंग/ रिक्रूटमेंट/182/2559 दिनांक 09 जुलाई 2009 के अनुसार, जीएम कोटे के तहत किसी एमएलए, एमपी या किसी संगठन की अनुशंसा पर भर्ती की जाए, ऐसा कहीं नहीं लिखा है. मगर महाप्रबंधक द्वारा 40 से ज़्यादा लोगों की नियुक्ति एमएलए, एमपी एवं विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों की अनुशंसा का हवाला देते हुए कर दी गई. इसी प्रकार 2009 में पर्सनल डिपार्टमेंट द्वारा भी भर्तियां की गईं. मज़दूर संघ ने मांग की कि जब जीएम ने उक्त नियुक्तियां एमएलए, एमपी एवं विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों की अनुशंसा पर की है तो अनुशंसा करने वालों के नाम बताए जाएं, लेकिन जीएम ने अपने जवाब में किसी के नाम का खुलासा नहीं किया. संघ ने आरोप लगाया कि नियुक्तियों में बाहरी लोगों को प्राथमिकता मिल रही है और छत्तीसगढ़ के बेरोज़गारों के साथ धोखा किया जा रहा है. इन नियुक्तियों के साथ-साथ यह भी जांच का विषय है कि रेलवे की विभिन्न यूनियनों के उच्च पदाधिकारियों द्वारा अपने रिश्तेदारों एवं अन्य लोगों की नियुक्तियां कराई जाती हैं.

छत्तीसगढ़ की उपेक्षा का आलम यह है कि 24 फरवरी, 2010 के रोज़गार और नियोजन नामक अ़खबार में रेल मंत्रालय द्वारा विभिन्न जोनों में भर्ती हेतु प्रकाशित विज्ञापन में स्थानीय भाषा वाले खंड में जहां मराठी एवं उड़िया भाषा को शामिल किया गया है, वहीं छत्तीसगढ़ी लापता है. अधिकारियों का तर्क है कि आठवीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को शामिल नहीं किया गया है. इसके बावजूद कोई आवाज़ उठाता नहीं दिख रहा है. यहां रेल जाल न फैले होने से भी समस्याएं पैदा हो रही हैं. आज दल्लीराजहरा लाइन को रावघाट तक ही नहीं, बल्कि जगदलपुर और कांकेर को भी किसी नज़दीकी सुविधाजनक जंक्शन से जोड़ने की ज़रूरत है. इसी तरह बीजापुर ज़िले को भी दिल्ली-चेन्नई मुख्य लाइन से जोड़ा जा सकता है. धमतरी-रायपुर लाइन को ब्रॉडगेज में बदला जाना भी बस्तर कमिश्नरी के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि वर्तमान में निकटतम रेलवे स्टेशन धमतरी है. रेल आने से रोज़गार बढ़ेगा, आवागमन आसान होगा और मालभाड़ा ट्रकों के मुक़ाबले कम हो जाएगा, लेकिन कोई भी नेता आवाज़ नहीं उठा रहा. विगत दिनों जैपोर-उड़ीसा के विधायक रविनारायण नंद ने जगदलपुर के कुछ लोगों के सहयोग से ज़ोरदार आंदोलन छेड़ा तो मजबूर होकर रेल मंत्रालय हीराखंड एक्सप्रेस को कोरापुट से जैपोर होकर जगदलपुर तक बढ़ाने के लिए विवश हो गया. ऐसा कुछ हमारे जनप्रतिनिधि क्यों नहीं करते? यदि इन लोगों ने बजट से पहले कुछ सक्रियता दिखाई होती तो बस्तर अंचल को एक नई लाइन या ट्रेन ज़रूर मिल जाती, लेकिन न तो रोज़गार दिया जा रहा है, न ट्रेन और न ही भाषा को तवज्जो.

रेलवे ज़ोन बनने के बाद से यहां हो रही भर्तियों में भ्रष्टाचार व्याप्त है. छत्तीसग़िढयों को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है.

– रवींद्र सिंह

रेल ज़ोन होने के बाद भी बिलासपुर के लोगों को भर्तियों में प्राथमिकता नहीं दी जा रही है और उन्हें छला जा रहा है.

– बसंत शर्मा

बिलासपुर को रेलवे ज़ोन बनाने के लिए स्थानीय लोगों ने अहम भूमिका निभाई, ताकि उन्हें रोज़गार मिले. मगर ऐसा हुआ नहीं. ग्रुप डी की भर्तियों में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

-व्ही. रामाराव

रेलवे की भर्तियों में स्थानीय बेरोज़गारों को 60 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए और छत्तीसगढ़ियों के लिए स्थायी तौर पर कोटा होना चाहिए.

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