संघ परिवार आजकल केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम के बयान से खपा है. आतंकवाद पर अपने ताजा बयान से वह संघ परिवार के निशाने पर आ गए हैं. संघ परिवार उन्हें पानी पी-पीकर कोस रहा है. चिदंबरम का कसूर महज़ इतना है कि उन्होंने एक सम्मेलन में दहशतगर्दी के भगवा चेहरे को मुल्क का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था. मालेगांव, मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ दरगाह में हुए हालिया आतंकी हमलों के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि मुल्क में भगवा आतंक का नया आयाम सामने निकल कर आया है. बम विस्फोट की कई घटनाओं में हिंदू चरमपंथियों के नाम सामने आने के बाद, ज़ाहिर है यह उनकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी और उनकी इस चिंता पर हम सभी को गंभीरता से विचार करना चाहिए था, लेकिन हुआ इसका उलटा. आतंकवाद पर आए चिदंबरम के इस साहसिक बयान पर संघ परिवार तो संघ परिवार, कांग्रेस पार्टी के अंदर भी उनकी आलोचना होने लगी. मानो चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद का नाम लेकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो.
दरअसल गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद शब्द का जिन अर्थों में इस्तेमाल किया है, उसके मायने सा़फ हैं. भगवा आतंकवाद शब्दावली से उनका सीधा-सीधा मतलब कट्टर हिंदूवादी संगठनों से था, जिनके नाम अभी हाल की कई घटनाओं में निकल कर सामने आए हैं. मालेगांव, मोडासा, मक्का मस्जिद, अजमेर शरी़फ दरगाह और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोटों के मास्टरमाइंड स्वामी असीमानंद, सुनील जोशी, राम जी कलासांगरा, संदीप डांगे, कर्नल श्रीकांत पुरोहित एवं अन्य आरोपियों का ताल्लुक किन संगठनों-विचारधारा से है, सब जानते हैं.
ग़ौरतलब है कि चिदंबरम ने अभी हाल में सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के वार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में अफसरों को और ज़्यादा होशियार रहने की ज़रूरत पर बल देते हुए कहा था कि मुल्क में नौजवानों में कट्टर विचार भरने के मामले में कोई कमी नहीं आई है. नया दौर भगवा आतंकवाद का है, जो इन दिनों निकल कर सामने आ रहा है. कई हिंदू संगठनों के नाम हालिया बम विस्फोटों में उजागर हुए हैं. ज़ाहिर है, चिदंबरम ने जब कोई ऐसा बयान दिया है तो बहुत सोच-समझ कर दिया है. वह देश के गृहमंत्री हैं और उनकी ज़िम्मेदारी बनती हैं कि वह देश को आने वाले ख़तरों से आगाह करें. चिदंबरम के बयान से पहले तमाम जांच एजेंसियां भी अपनी तहक़ीक़ात में यह बात साबित कर चुकी हैं कि मुल्क में बीते कुछ सालों में जो बम विस्फोट हुए, उनमें संघ परिवार से जुड़े कट्टरपंथी संगठनों का हाथ है. मालेगांव बम विस्फोट की महज़ एक तहक़ीक़ात ने कई बम विस्फोटों का पर्दाफाश कर दिया. कल तक जो बम विस्फोट जेहादी आतंकवाद के खाते में दर्ज थे, वे सब आज संघ परिवार के खाते में हैं. बावजूद इसके संघ परिवार को अपने किए का कोई पछतावा नहीं. बल्कि जब भी इन बम विस्फोटों, अन्य बम विस्फोटों की साजिशों और सांप्रदायिक दंगों में उसके सहयोगी संगठनों का नाम सामने आता है, वह बड़ी बेशर्मी से उन्हें बचाने में लग जाता है. और उसमें संघ का पूरा साथ देते हैं उसके सियासी हाथ भाजपा और शिवसेना. भाजपा और शिवसेना ग़लतबयानी करके देश की जनता को गुमराह करते हैं. चिदंबरम के हालिया बयान पर लोकसभा- राज्यसभा के अंदर और बाहर जिस तरह इन दोनों पार्टियों ने अपना रुख़ दिखाया है, वह इसी बात की तस्दीक करता है.
भगवा आतंकवाद पर सदन के अंदर सबसे ज़्यादा मुखर थी शिवसेना. वह शिवसेना, जिसके नेता बाल ठाकरे, मनोहर जोशी और सैकड़ों कार्यकर्ता महाराष्ट्र में हुए कई सांप्रदायिक दंगों में दागी ठहराए गए. दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में मुंबई में हुए भयानक दंगों के अहम शिल्पकारों में से एक मनोहर जोशी, बाबरी विध्वंस के नायक मुरली मनोहर जोशी और योगी आदित्यनाथ खास तौर पर संसद में भगवा आतंकवाद की पैरवी करते नज़र आए. संघ के लाडले मुरली मनोहर जोशी तो गुस्से में इतने बेकाबू हो गए कि उन्होंने गृहमंत्री चिदंबरम को भगवा आतंकवाद शब्द के इस्तेमाल पर चेतावनी तक दे डाली कि देश में इसकी भारी प्रतिक्रिया होगी. साल 2002 में नरेंद्र मोदी के गुजरात में क्रिया-प्रतिक्रिया का नंगानाच देख चुके देशवासी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि प्रोफेसर जोशी का इशारा किस ओर था. चिदंबरम का यह बयान जैसे निशाने पर तीर की तरह लगा. चोर की दाढ़ी में तिनका. जैसा कि अंदेशा था, इस बयान से सबसे ज़्यादा खपा संघ परिवार है. जब आंच ख़ुद तक आई, तब संघ परिवार और भाजपा दोनों को ही इस बात का ख्याल आया कि आतंकवाद तो स़िर्फ आतंकवाद होता है और उसकी कोई जाति या मजहब नहीं होता. कुल मिलाकर जो लोग आज भगवा आतंकवाद के नाम से हिंदू चरमपंथियों को मुख़ातिब करने में परहेज कर रहे हैं, यह वही लोग हैं, जो अभी तक मुल्क में होने वाली हर आतंकी घटना को मुस्लिम, इस्लाम या जेहादी आतंकवाद का नाम देकर उसे हिंदुस्तानी मुसलमानों से जोड़ देते थे. फिर संघ परिवार के उस शातिर जुमले को भला कौन भूल सकता है, जिसके ज़रिए वह बेहद शातिराना अंदाज़ में सारे देश के सामने यह जमकर प्रचारित करता था कि यह माना, देश के सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, लेकिन आतंकी घटनाओं में अभी तक जो पकड़े गए हैं, वे मुसलमान हैं. दरअसल गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद शब्द का जिन अर्थों में इस्तेमाल किया है, उसके मायने साफ हैं. भगवा आतंकवाद शब्दावली से उनका सीधा-सीधा मतलब कट्टर हिंदूवादी संगठनों से था, जिनके नाम अभी हाल की कई घटनाओं में निकल कर सामने आए हैं. मालेगांव, मोडासा, मक्का मस्जिद, अजमेर शरीफ दरगाह और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम विस्फोटों के मास्टरमाइंड स्वामी असीमानंद, सुनील जोशी, राम जी कलासांगरा, संदीप डांगे, कर्नल श्रीकांत पुरोहित एवं अन्य आरोपियों का ताल्लुक किन संगठनों-विचारधारा से है, सब जानते हैं. धर्म और भगवा झंडे की आड़ में इन दहशतगर्दों ने पूरे देश में ख़ूब गुल खिलाए. भगवा चोला पहन कर ये दहशतगर्द गुपचुप अपनी देश विरोधी गतिविधियों में लगे रहे और जांच एजेंसियां अंधेरे में तीर मारती रहीं. वह तो मालेगांव बम विस्फोट की तहक़ीक़ात के बाद जब इन जांच एजेंसियों ने अपना दायरा हिंदू चरमपंथी संगठनों की ओर बढ़ाया, तब जाकर नए राजफाश हुए, वरना देश में दहशतगर्दी की यह वारदातें और भी आगे चलतीं.
भगवा आतंकवाद बयान पर जो लोग अपना एतराज जता रहे हैं, उनकी नीयत और मंशा साफ है. एक बार फिर वे जज़्बाती शब्दों का सहारा लेकर असली मुद्दे को कहीं और मोड़ना चाहते हैं, जिससे पूरे देश का ध्यान दक्षिणपंथी आतंकवाद से हटकर एक ग़ैर ज़रूरी बहस में बंट जाए. संघ परिवार शुरू से लेकर आज तक यह काम बख़ूबी करता आया है. आज फिर संघ ख़ुद को चारों ओर से घिरता देख, ख़ुद को बचाने के लिए पूरी ताक़त से इस मुहिम में लग गया है. कभी वह भगवा शब्द को धर्म से जोड़ता है तो कभी सारे हिंदुओं से. केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने पुलिस अफसरों के सम्मेलन में यदि भगवा आतंकवाद की बात की है तो पूरी तरह जानते-बूझते. हां एक बात और, देश के अंदर नौजवानों में उग्र विचारों का पोषण कौन कर रहा है? यह भी सब अच्छी तरह से जानते हैं. विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, सनातन संस्था, श्रीराम सेना, हिंदू मुन्नानी और अभिनव भारत जैसे संगठन किस वृक्ष की शाखाएं हैं और इनके क्या धार्मिक एवं रचनात्मक क्रियाकलाप हैं, बीते दो दशकों के दौरान सारे देश के सामने आ चुके हैं. कुल मिलाकर चिदंबरम का संदेश साफ है, आतंकवाद की सख्त मु़फाल़फत और उससे कड़ा मुक़ाबला, क्योंकि किसी भी तरह के आतंकवाद की तऱफ से लगातार आंखें मूंदे रहना आख़िरकार देश की सुरक्षा से खेलना है. आतंकवाद स़िर्फ आतंकवाद होता है और उसमें भेद करना, कोताही बरतना हमारे देश की ह़िफाज़त के एतबार से कहीं न कहीं ख़तरनाक होगा.
(लेखक अल्पसंख्यक मामलों के जानकार हैं)
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