शहर इंसानों के लायक नहीं रहे

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दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं. दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर के रूप में तैयार किया जा रहा था. बारिश ने सरकार और योजना बनाने वाले उच्च अधिकारियों की पोल खोल दी. देश की राजधानी में बारिश के पानी की निकासी का इंतज़ाम नहीं है. रिहायशी इलाक़ों से लेकर सड़कों तक पानी भर गया. ट्रैफिक जाम के चलते लोग घंटों रास्ते में फंसे रहे. यह भी जगज़ाहिर है कि तेज़ी से बढ़ती आबादी की ज़रूरत के मुताबिक़ शहरीकरण के लिए कोई योजना नहीं है. देश के अन्य शहरों की हालत इससे भी बदतर है. एक तो योजना बनने के स्तर पर कमी है और जो योजना बनती भी है, वह भ्रष्टाचार और दिशाहीनता की बलि चढ़ जाती है. दिनोंदिन जनसंख्या बढ़ती जा रही है, ट्रैफिक और पानी की समस्या गहराती जा रही है. शहरों में लोगों के अति संकुचन से भीड़ और संकुचन की समस्या उत्पन्न हो गई है. टाउन प्लानिंग का सबसे पहला सिद्धांत यह है कि शहर की 26 फीसदी ज़मीन सड़कों के लिए छोड़ दी जाए. हमारे शहरों में औसतन स़िर्फ 6 फीसदी ज़मीन पर सड़क है. शहरों में यातायात की बदहाली की मुख्य वजह यही है. ग़ौर करने वाली बात यह है कि हमारे शहरों में लगातार वाहनों की संख्या बढ़ रही है. एक अनुमान के मुताबिक़, वाहनों की संख्या में हर साल 20 फीसदी इज़ा़फा होता है और दूसरी बात यह है कि व्यवसायिक अवसरों की वजह से गांवों से लोगों का शहर में आना निरंतर जारी है. यह दोनों बातें ही आम जानकारी की हैं. क्या अधिकारियों को इन ज़रूरतों को देखते हुए योजना नहीं बनानी चाहिए? योजना के अभाव या ग़लत योजनाओं की वजह से देश के कई शहरों का विकास रुक गया है.

1850 तक लंदन की टेम्स नदी का हाल दिल्ली की यमुना नदी की तरह था, बिल्कुल किसी नाले की तरह. गंदगी की वजह से लंदन में हैजा फैल गया. ख़तरे को देखते हुए 1958 में संसद ने एक मॉडर्न सीवेज सिस्टम की योजना बनाई. इस योजना के चीफ इंजीनियर जोसेफ बेजेलगेट थे. उन्होंने काफी शोध के बाद पूरे लंदन शहर में ज़मीन के अंदर 134 किलोमीटर का एक सीवेज सिस्टम बनाया. साथ ही टेम्स नदी के साथ-साथ सड़क बनाई गई, ट्रीटमेंट प्लांट्स लगाए गए. लंदन के सीवेज सिस्टम को बने हुए 150 साल पूरे हो चुके हैं. शहर की जनसंख्या कई सौ गुना ज़्यादा हो गई है, लेकिन आज भी लंदन का सीवेज सिस्टम दुरुस्त है. योजना का अर्थ यही होता है कि उसे भविष्य को समझते हुए बनाया जाए. भारत में शायद सब कुछ उल्टा है. अंग्रेजों का शासन तंत्र मौजूद है, लेकिन दूरदर्शिता नहीं है.

उदाहरण के तौर पर उड़ीसा की व्यवसायिक राजधानी कटक को लीजिए. 1980 और 90 के दशकों में मिलेनियम सिटी कटक में विकास का पहिया तेज़ी से चला और वह कमर्शियल एवं रेसिडेंशियल प्रॉपर्टी का बाज़ार बन गया. राज्य की कमर्शियल कैपिटल में पिछले एक दशक से विकास का पहिया बहुत धीरे चलने लगा है, जिसकी वजह है अनियोजित शहरी संरचना. यहां प्रति वर्ष बढ़ने वाली जनसंख्या के अनुपात में जगह और संसाधनों की कमी ने कटक के विकास पर ताला लगा दिया. दिल्ली और दूसरे महानगरों को अगर छोड़कर हम छोटे शहरों की ओर देखें तो स्थिति और भी चिंताजनक है. उदाहरण के तौर पर बिहार के भागलपुर को ले लीजिए. यह एक प्रमंडल मुख्यालय है. आज़ादी मिले साठ साल हो गए, लेकिन इस शहर में गंदे पानी के निकास की कोई व्यवस्था ही नहीं है. सड़कों पर नाले का पानी बहने के लिए बारिश की ज़रूरत नहीं है. सालों भर यहां की नालियां सड़क पर बहती हैं. भागलपुर में ड्रेनेज सिस्टम ही नहीं है. अलीगढ़ का भी यही हाल है. भागलपुर और अलीगढ़ में ज़्यादा इंडस्ट्री नहीं हैं, फिर भी यहां की जनसंख्या बढ़ रही है. अफसोस इस बात का है कि इन शहरों में कचरे से निपटने के लिए सरकार अब तक कुछ नहीं कर पाई है. जिन शहरों में सरकार कचरे के  निवारण के लिए पैसे ख़र्च करती है, वहां का भी हाल बुरा है. लुधियाना में वेस्ट मैनेजमेंट के लिए 100 करोड़ का बजट है, फिर भी यहां कचरे का पहाड़ नज़र आता है. हर तऱफ गंदगी फैली है.

दिल्ली, आगरा, पटना, लखनऊ, गोरखपुर या भागलपुर, महानगर हो या फिर मुफस्सिल, कहीं भी आप चले जाएं, एक सच्चाई हमारी आंखों के सामने से गुज़रती है कि हमारे देश के शहर अब इंसानों के रहने के लायक़ नहीं हैं. लोगों की ज़रूरतों और शहरों में उपलब्ध सुविधाओं के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर है. ट्रैफिक जाम की समस्या है, पीने का साफ पानी नहीं है, बिजली की कमी, कचरे का जमाव, प्रदूषण की समस्या का आलम यह है कि सरकार के पास न तो इससे निपटने के लिए कोई योजना है, न ही योजना बनाने की तरकीब. हालात यह हैं कि कई शहरों में अंडरग्राउंड नालियों का मानचित्र भी ग़ायब है. सरकारी काम करने का तरीक़ा यह है कि पहले सड़क बन जाती है, फिर सीवर के लिए नई सड़कों की खुदाई हो जाती है. सड़क फिर से बनती है और फिर टेलीफोन लाइन के लिए खुदाई शुरू हो जाती है. फिर से सड़क बनाई जाती है. कुछ दिनों बाद बिजली विभाग खुदाई करने पहुंच जाता है. सड़कों का बनना और उसे फिर से बर्बाद करने का सरकारी चक्र लगातार चलता रहता है. इससे यह तो ज़ाहिर हो ही जाता है कि सरकार के विभागों में न तो कोई सामंजस्य है और न ही कोई समग्र योजना है. ज़रा सी गहराई में जाने पर पता चलता है कि सरकारी विभाग और अधिकारी जानबूझ कर ऐसा करते हैं, ताकि भ्रष्टाचार और अवैध कमाई का ज़रिया बना रहे.

अच्छे शहर का मतलब स़िर्फ अच्छी सड़कें और नालियां ही नहीं होती हैं. संसाधनों की कमी, मूलभूत सुविधाओं की कमी और लगातार बढ़ रही जनसंख्या हमारे शहरों को तबाही की कगार पर पहुंचा रही है. इन सबके ऊपर हमारा प्रशासन है, जो समस्या के सामने आंख बंद कर निशचिंत है. जो भी योजना बनाई जाती है, वह हर पांच साल के बाद बेकार हो जाती है. यही वजह है कि सरकार की योजनाएं सफल नहीं हो पाती हैं. शहरों में न रहने की व्यवस्था है, न ही पीने के पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की. पानी की स्थिति दिनोंदिन ख़राब होती जा रही है. सरकार लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया कराने में असमर्थ है. हाल यह है कि आए दिन प्रदूषित पानी की आपूर्ति से बीमारियां फैलने की ख़बर मिलती है. देश के शहरों में जलापूर्ति की मात्रा 105 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है, जबकि ज़रूरत कम से कम 150 लीटर है और आदर्श आपूर्ति मात्रा 220 लीटर प्रतिदिन होनी चाहिए. पाइप से आपूर्ति होने वाला पानी केवल 74 प्रतिशत शहरी जनसंख्या तक पहुंच पाता है. पूरे देश में कोई भी शहर ऐसा नहीं है, जहां पानी की आपूर्ति चौबीस घंटे होती हो. चेन्नई, हैदराबाद, राजकोट, अजमेर एवं उदयपुर जैसे शहरों में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन द्वारा प्रतिदिन केवल एक घंटे जलापूर्ति होती है. देश में ऐसे कई शहर हैं, जहां नगरपालिका की आपूर्ति व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है. हमारे देश में बेहतर जलनीति न होने की वजह से यहां हर वर्ष होने वाली बारिश के पानी के संरक्षण और इस्तेमाल की योजना नहीं बन पाती. पीने के लिए लोग ज़मीन के अंदर का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं. इस वजह से वहां का भी पानी ख़त्म होता जा रहा है. जहां इंडस्ट्री हैं, वहां कारगर सीवेज सिस्टम न होने की वजह से फैक्ट्रियों का गंदा पानी ज़मीन में डाल दिया जाता है. इसके चलते ज़मीन के अंदर का पानी भी दूषित हो गया है. ग़ाज़ियाबाद, मेरठ एवं दिल्ली के कई इलाक़ों और पंजाब-हरियाणा के कई शहरों का पानी दूषित हो चुका है. इससे कई तरह की बीमारियां फैल रही हैं. जब पीने का पानी ही नहीं है तो लोग कहां जाएंगे. पैसा कमाने के लिए शहरों में रहना ज़रूरी है, लेकिन हमारे शहर हैं कि इंसानों की तरह जीने नहीं देते. शहरों में लगातार लोगों का प्रवासन जारी है.

एक रिपेार्ट के मुताबिक़, वर्ष 2001 में 1961-91 की तुलना में प्रवासन के मामले काफी ज़्यादा बढ़े हैं. गांवों से शहरों की ओर लोगों का पलायन सबसे ज़्यादा बढ़ा है. इसकी सबसे बड़ी वजह आर्थिक रही है. लोग आर्थिक रूप से पिछड़े हुए राज्यों से पलायन कर विकसित शहरों में जा रहे हैं. वर्ष 2001 के टीसीपीओ आंकड़ों के मुताबिक़, हिंदुस्तान के  शहरों में 61.80 मिलियन लोग झुग्गियों में रह रहे थे. आश्चर्य की बात यह है कि देश के  कुछ बड़े शहरों में गांव की अपेक्षा ज़्यादा ग़रीबी है. यह शहरी ग़रीबी का एक उदाहरण भर है. शहर में ग़रीब जीविका के अलावा घर, भोजन, सैनिटेशन, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा जैसी परेशानियों का सामना करते हैं. भारत में दीर्घकालिक तौर पर शहरीकरण का संदर्भ संरक्षण एवं झुग्गियां, मूलभूत शहरी सेवाओं, शहरों का आर्थिक विकास और शासन एवं नियोजन से है. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के साथ देश की आर्थिक अवस्था में तो सुधार आया है, पर शहरी ग़रीबी की दर में गिरावट नहीं आई है. मुंबई की 54 प्रतिशत जनता झुग्गियों में रहती है, शहर के केवल 6 प्रतिशत इलाक़े में इन झुग्गियों का जमावड़ा है. गुजरात के अहमदाबाद में बेतरतीब तरीक़े से बढ़ते जा रहे उद्योगों और शहरी जीवनशैली ने शहर को तंगी, गंदगी एवं अभाव का शिकार बना दिया है. सूरत में आठ लाख लोग शहर की 406 झुग्गियों में रहते हैं. 2012 में शहर की जनसंख्या 53.58 लाख हो जाएगी. इस जनसंख्या का पांचवा हिस्सा यानी 11 लाख लोग 425 झुग्गियों में रहेंगे. शहरी ग़रीबों के लिए जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत बनाए जा रहे 42,156 घर झुग्गियों में रहने वालों के लिए हैं, जिनमें केवल दो लाख लोग रह पाएंगे. 2012 में सूरत को ज़ीरो स्लम सिटी बनाने की योजना गर्त में चली जाएगी. लगता है, बढ़ती हुई जनसंख्या को ध्यान में रखकर हमारे देश में योजनाएं बनाने की प्रथा ही नहीं है. दूसरे देशों में शहरीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए वहां की सरकारें भूमि, निजी क्षेत्र की भागीदारी और धन का इस्तेमाल बिल्कुल सटीक तरीक़े से करने का प्रयास करती हैं. हमारे देश में ऐसी किसी नीति का सर्वथा अभाव है. इसके अलावा शहरों की शासन प्रणाली भी काफी कमज़ोर है, स्थानीय संस्थाओं के पास अधिकार न के बराबर हैं. केंद्र और राज्य सरकारों के कामकाज का आलम यह है कि सुनियोजित योजना के अभाव में शहर के विकास की नींव कमज़ोर पड़ जाती है. जी-20 देशों में भारत अकेला ऐसा देश है, जिसने महापौर को शहर चलाने का अधिकार देने की प्रणाली नहीं अपनाई है, न ही किसी एक्सपर्ट एजेंसी की सेवाएं ली जाती हैं.

शहर की जर्जर अवस्था का सबसे बड़ा कारण ख़राब नियोजन है. हमारे शहरों की त्रासदी यह है कि शहर पहले बन जाते हैं, उनके लिए योजनाएं बाद में बनाई जाती हैं. लोग घर बनाकर नई बस्तियों में रहने लगते हैं, फिर वहां सड़क, सीवेज, पानी, टेलीफोन और बिजली की व्यवस्था के बारे में सोचा जाता है. समस्या यह है कि हमारे देश की शासन प्रणाली पूरी तरह से केंद्रीयकृत है. अंग्रेजों ने यह व्यवस्था गुलामों पर शासन करने के लिए बनाई थी. आज भी वही प्रणाली चल रही है. यही वजह है कि फैसला करने का अधिकार कुछ लोगों के हाथों में सिमटा है. अंग्रेजों के जमाने की केंद्रीयकृत प्रणाली स़िर्फ मौजूद ही नहीं है, बल्कि इसके साथ नए-नए नियमों का भंवरजाल बना दिया गया है, जिससे पूरी प्रक्रिया ही उलझ कर रह गई है. शहरों की योजना और देखरेख ज़िलाधिकारी करते हैं. वे इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र एवं गणित पढ़कर आईएएस अधिकारी बनते हैं और परीक्षा पास करते ही राष्ट्रनिर्माण के अंतर्गत आने वाले सभी विषयों के महा एक्सपर्ट बन जाते हैं. समय के साथ वे रेलवे, मानव संसाधन, शहरी विकास या अन्य विभागों के मुखिया बन जाते हैं. बिना किसी ट्रेनिंग या अध्ययन के कभी इस विभाग तो कभी उस विभाग में उनका तबादला भी हो जाता है. उन्हें फैसला लेने का एकाधिकार मिल जाता है. ऐसे ही अधिकारी हमारे शहरों की तकदीर लिखते हैं. इसके साथ-साथ शासन प्रणाली में मौजूद भ्रष्टाचार और कमीशन की परंपरा हमारे शहरों के विनाश का कारण बन रही है. हमारे शहरों की दुर्गति इसलिए हो रही है, क्योंकि योजना, नीति और नियम बनाने वालों में स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों की हिस्सेदारी नहीं है. एक समस्या देशवासियों के  मनोविज्ञान की भी है. हम अपने घरों को तो साफ रखते हैं, लेकिन घर के बाहर फैली गंदगी को नज़रअंदाज़ करने में महारत हासिल कर चुके हैं. भारत विश्व में सबसे तेज़ी से शहरीकृत होने वाले देशों में भले शुमार हो, लेकिन हमारे पास शहरीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए जोसेफ बेजेलगेट तो दूर, कोई कार्य योजना तक नहीं है.

रीतिका सोनाली

युवा वर्ग की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे पाने में कुशल रीतिका सोनाली हमेशा कुछ हट कर करने में जुटी रहती हैं।

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