सूचना अधिकार क़ानून: भ्रांतियां और निवारण

भारत में सूचना अधिकार क़ानून (आरटीआई एक्ट) को लागू हुए पांच साल पूरा हो चुका है, लेकिन आम जनता और सरकारी अधिकारी अभी भी इस क़ानून के कई पहलुओं से अनभिज्ञ हैं. यह अनभिज्ञता दायर की गई अपीलों और लोकसेवकों द्वारा उनके जवाबों को देखकर स्पष्ट हो जाती है. कई बार ऐसी अपीलें दायर की जाती हैं, जिनके पीछे दायर करने वालों के निजी स्वार्थ छुपे होते हैं. राजनीतिक पार्टियां कई बार अधिकारियों से अपनी खुन्नस निकालने के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं. इलाक़े में कोई सड़क बन रही हो और स्थानीय प्रशासन उनकी बात सुनने से इंकार करता है तो आरटीआई की अर्जियां दाख़िल कर दी जाती हैं. आरटीआई क़ानून के मुताबिक़, ऐसी सभी सूचनाएं सार्वजनिक की जा सकती हैं, जो सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई हैं. लेकिन अक्सर ऐसी सूचनाओं की मांग की जाती है, जो इस क़ानून के दायरे से ही बाहर हैं. कई बार ऐसी अपीलें दायर की जाती हैं, जिनका कोई मतलब नहीं होता, कोई उद्देश्य नहीं होता. इस तरह की अपीलों से संबद्ध अधिकारी भी उलझ कर रह जाते हैं, क्योंकि वे पहले ही इस क़ानून के बारे में तमाम तरह की भ्रांतियों के शिकार हैं.

सूचना अधिकार क़ानून के कई पहलू अभी भी संदेह के घेरे में हैं. उदाहरण के लिए, कौन सी सूचना सार्वजनिक की जानी है और कौन सी नहीं, कई लोगों को अब तक यही स्पष्ट नहीं हो पाया है. 30 दिनों की समय सीमा के अंदर सूचना उपलब्ध कराने संबंधी प्रावधान पर भी संदेह बना हुआ है. आम जनता इसकी व्याख्या अपने हिसाब से करती है तो सरकारी अधिकारी अपने हिसाब से. ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों को सूचना हासिल करने के लिए किसी भी तरह के शुल्क का भुगतान नहीं करना पड़ता है.

आरटीआई क़ानून के अंतर्गत सार्वजनिक हित से जुड़ी हर सूचना की मांग कोई भी कर सकता है, लेकिन ऐसी सूचनाएं जो आसानी से उपलब्ध नहीं हैं और जिन्हें हासिल करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों का इस्तेमाल करना आवश्यक हो, तो इस क़ानून की धारा 7 की उपधारा 9 के मुताबिक़ उसे उपलब्ध कराना ज़रूरी नहीं है. हालांकि ऐसे अपीलकर्ता आवश्यक शुल्क का भुगतान करके रिकॉड्‌र्स की समीक्षा की मांग कर सकते हैं. ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं, जिनमें लोक सूचना अधिकारी अज्ञानतावश ग़रीबी रेखा से ऊपर के लोगों को भी मुफ्त में सूचनाएं उपलब्ध करा देते हैं. यह सही नहीं है, क्योंकि इससे बेतुकी अपीलों और स्वार्थी तत्वों को बढ़ावा मिलता है. राज्य लोक सूचना अधिकारी और अन्य संबद्ध अधिकारियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आरटीआई क़ानून के तहत अपीलें ज़रूरी शुल्क के साथ ही दायर की जाएं. इतना ही नहीं, अपीलकर्ताओं को रिकॉड्‌र्स की समीक्षा, फोटोस्टेट और सीडी आदि के लिए भी अलग से भुगतान करने का निर्देश दिया जाना चाहिए. ऐसा करने से संभव है कि बिना वजह अपील दायर करने वाले लोग ख़ुद ही पीछे हट जाएं. सच तो यह है कि यदि अधिकारी इस क़ानून की धारा 4 में दिए गए अनुदेशों का पालन करें तो अपने क़ीमती समय और ऊर्जा की काफी बचत कर सकते हैं. कंप्यूटर शिक्षा प्राप्त अपीलकर्ताओं को ज़रूरी सूचना हासिल करने के लिए संबद्ध वेबसाइट का पता दिया जा सकता है. यदि अपीलकर्ता कंप्यूटर में दक्ष न हो तो ज़रूरी सूचनाओं की प्रतिलिपि स्थानीय पुस्तकालयों में उपलब्ध कराई जा सकती है.

कई बार ऐसा भी देखने को मिला है कि अपीलकर्ताओं को सूचना उपलब्ध कराने से पहले सूचना अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति का इंतज़ार करते रहते हैं. यह अनावश्यक है और इससे अपीलों के शीघ्र निस्तारण में बाधा पहुंचती है. यदि अपील किसी गंभीर मसले से जुड़ी न हो या नीतिगत फैसले से संबंधित न हो तो सूचना अधिकारियों को अपने वरिष्ठों की अनुमति का इंतज़ार करने की कोई ज़रूरत नहीं है. वैसे भी किन मसलों पर वरिष्ठों की अनुमति आवश्यक है, इसका फैसला पहले ही होना चाहिए, न कि अपील दायर होने के बाद. इतना ही नहीं, मानवीय कार्यों से जुड़ी अपीलों के मामले में अपीलकर्ता को आवश्यक शुल्क का भुगतान कर स्वयं ही रिकाड्‌र्स की समीक्षा के लिए आमंत्रित करना एक बेहतर विकल्प हो सकता है. इन उपायों का नतीजा यह होगा कि बिना वजह अपील करने वाले लोग हतोत्साहित होंगे, जबकि ज़रूरतमंद लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा. चूंकि तय समय सीमा के अंतर्गत सूचनाएं उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी सूचना अधिकारियों की है, इसलिए उन्हें सूचनाएं उपलब्ध कराने में अपनी तत्परता दिखानी चाहिए. सूचना अधिकार क़ानून के कई पहलू अभी भी संदेह के घेरे में हैं. उदाहरण के लिए, कौन सी सूचना सार्वजनिक की जानी है और कौन सी नहीं, कई लोगों को अब तक यही स्पष्ट नहीं हो पाया है. 30 दिनों की समय सीमा के अंदर सूचना उपलब्ध कराने संबंधी प्रावधान पर भी संदेह बना हुआ है. आम जनता इसकी व्याख्या अपने हिसाब से करती है तो सरकारी अधिकारी अपने हिसाब से. ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों को सूचना हासिल करने के लिए किसी भी तरह के शुल्क का भुगतान नहीं करना पड़ता है. इसका फायदा उठाकर लोग शुल्क के भुगतान से बचने के लिए अक्सर ग़रीब लोगों से अपीलें दायर कराते हैं.

ऐसी अपीलों, जिनकी विषयवस्तु को लेकर संदेह होता है, को अक्सर लंबे समय तक ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. इसके चलते संबद्ध विभाग को अंतिम अपीलीय न्यायाधिकरण के सामने आर्थिक दंड का भुगतान भी करना पड़ता है. ऐसे हालात से बचने के लिए इन अपीलों के जल्दी निपटारे की कोशिश की जानी चाहिए. इसके लिए मामले की जल्द सुनवाई की व्यवस्था होनी चाहिए या ज़रूरी हो तो अपीलकर्ता से लिखित स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए. ऐसी सूचनाओं, जिनके लिए शुल्क का भुगतान अनिवार्य है, के मामलों में ज़्यादा सतर्कता बरतने की ज़रूरत है और बेहतर यही है कि सूचना उपलब्ध कराए जाने से पहले अपीलकर्ता से व्यक्तिगत रूप से मिला जाए. सूचना अधिकार क़ानून की आलोचना की एक बड़ी वजह यह है कि न्यायपालिका और इसकी गतिविधियों से जुड़ी सूचनाएं अभी भी इसके दायरे से बाहर हैं. एक ओर जब हम लोकतंत्र, जनता के अधिकार और क़ानून के समक्ष समानता की बातें करते हैं तो इसकी कोई वजह नहीं दिखती कि न्यायपालिका को सूचना अधिकार क़ानून के दायरे से बाहर रखा जाए. उम्मीद यही की जानी चाहिए कि सूचना अधिकार क़ानून के इस विरोधाभास को जल्द ही दूर कर लिया जाएगा, ताकि इसका ज़्यादा प्रभावी ढंग से इस्तेमाल संभव हो सके.

एक और संदेह विदेशियों और ग़ैर भारतीय नागरिकों को सूचना उपलब्ध कराए जाने को लेकर मौजूद है. सूचना अधिकार क़ानून के तहत उन्हें भी वे सभी सूचनाएं उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है, जो सार्वजनिक हित से जुड़ी हैं. क़ानून की धारा 8 के तहत व्यक्तिगत या न्यायिक मामलों से जुड़ी सूचनाओं को छोड़कर लोकसेवकों की संपत्ति या आयकर से संबंधित ब्यौरे की मांग की जा सकती है. सूचना अधिकार क़ानून के लिए विभिन्न स्तरों पर ज़रूरी संसाधनों के गठन के साथ आम जनता और लोकसेवकों के बीच इसके सभी पहलुओं के प्रति जागरूकता में वृद्धि भी अपेक्षित है. राज्य के कल्याणकारी कार्यों में हुई अभूतपूर्व वृद्धि के मद्देनज़र इस क़ानून के लिए ज़रूरी संरचना का गठन समय की ज़रूरत बन चुका है. यह आवश्यक है कि आम लोगों द्वारा दायर की गई अपीलों के शीघ्र निष्पादन के लिए अलग से अधिकारियों को नियुक्त किया जाए.

प्रशासकीय संरचना के विकास से यह क़ानून ज़्यादा प्रभावशाली सिद्ध हो सकता है. ऐसे अधिकारी, जो जानबूझ कर अपने दायित्वों से मुंह मोड़ते हैं या मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने से आनाकानी करते हैं, उनके ख़िला़फ दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए. साथ ही बेतुके या स्वार्थी अपीलकर्ताओं के लिए भी सज़ा का प्रावधान किया जाना चाहिए. लेकिन दंड और जुर्माने के इन प्रावधानों को सावधानीपूर्वक लागू किया जाना चाहिए और अधिकारियों के मनमाने व्यवहार पर रोक लगनी चाहिए. संबद्ध अधिकारियों की ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को भी ज़्यादा स्पष्ट किए जाने की ज़रूरत है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि लोक सूचना अधिकारियों और अपीलीय निकायों के अधिकारों में वृद्धि की जानी चाहिए.

(लेखक पश्चिम बंगाल में आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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