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तस्‍करी की शिकार महिलाओं का पुनर्वास कैसे हो?

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यह कविता (बांग्ला से अनुवाद) है यौवन की दहलीज पर खड़ी चांदनी की, जो कोलकाता के एक होम में अपनी नई ज़िंदगी के सपने के साथ खुले आकाश में उड़ना चाहती है. चांदनी जैसी लाखों लड़कियां देश भर के सैकड़ों सरकारी और ग़ैर सरकारी होम या सुधारगृहों में बैठकर सपने बुनती हैं, पर कितनों को उज्ज्वल भविष्य की सौगात मिलती है, इस पर बहुतों का ध्यान नहीं जाता. सरकार के बाल एवं महिला कल्याण विभाग और स्वयंसेवी संगठनों की फौज इनकी ह़िफाज़त एवं पुनर्वास में लगी है, पर कुछ गिनी-चुनी लड़कियां ही एक आम औरत की ज़िंदगी जी पाती हैं. अगर इन्हें वापस घर भेजा जाता है तो परिवार-समाज से दुत्कार ही मिलती है और ज़्यादातर को इसी नर्क में लौटना पड़ता है. विदेशी, सरकारी एवं ग़ैर सरकारी अनुदानों के करोड़ों रुपये भी इनकी तकदीर नहीं बदल पाते.

चांद देखने से लगता है जैसे मन के भीतर तस्वीर देख रही हूं/चांद की बोली मीठी लगती है/अगर आप चांद को छूते हो तो वह बर्फ जैसा ठंडा लगता है/जब तुम चांद को सूंघते हो तो लगता है कि यह सुगंध मन भीतर बैठे उस आदमी की है, जो तुमसे प्रेम करता है.

इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन ऑफ माइग्रेंट्‌स के मुताबिक़,पूरी दुनिया में मानव तस्करी के ज़रिए हर साल 80 लाख अमेरिकी डॉलर का कारोबार होता है. भारत में तस्करी की जाने वाली 15 प्रतिशत लड़कियां एवं बच्चे 15 वर्ष से कम उम्र के होते हैं, जबकि 18 साल से कम के लड़के-लड़कियों की संख्या 25 प्रतिशत है. चौथी दुनिया ने जानना चाहा कि होम और उसके बाद लड़कियों की ज़िंदगी की तस्वीर कैसी है. इस दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य मिले. पुनर्वास पर भले ही करोड़ों-अरबों रुपये ख़र्च किए जाते हों, पर इसका लाभ बहुत कम लड़कियों को मिल पाता है. बांग्लादेश की सालगढ़िया गांव की एक 17 वर्षीया किशोरी को कोलकाता में काम दिलाने के लिए लाया गया. पहले उसे मिदनापुर में रखा गया, जहां से उसे यौनकर्म में लगाया जाना था. बाद में एक दिन पुलिस छापे में पकड़ कर उसे हावड़ा के पास सुंदरभाई मूलचंद मेहता होम, लिलुआ में रखा गया. किशोरी की काउंसिलिंग की गई और बांग्लादेश के एक स्वयंसेवी संगठन से संपर्क किया गया. बांग्लादेशी उच्चायोग के एक प्रतिनिधि ने भी लड़की से पूछताछ की और उसकी नागरिकता की पुष्टि होने पर उसे कोंटाई की एक अदालत के आदेश पर वापस बांग्लादेश भेजा गया. बांग्लादेश के ही खुलना ज़िले के बाघेरहाट गांव की 15 साल की किशोरी नजमा को उसका चाचा कोलकाता लाया और सियालदह स्टेशन पर बैठाते हुए आधे घंटे बाद वापस आने की बात कही. इस बीच वह किसी दलाल से मोलभाव करने लगा. कोलकाता के स्वयंसेवी संगठन सैमेरिटंस के स्वयंसेवकों ने बच्ची को देखा और उसे सिनी आशा होम भेजा. किशोरी का विवरण ढाका आशियाना मिशन को भेजा गया. फिर बांग्लादेशी उच्चायोग के प्रतिनिधि की पूछताछ और अदालत के आदेश के बाद उसे वापस ढाका भेजा गया.

ऐसी कई लड़कियों को उनके मूल घरों में वापस भेजा गया. स्वयंसेवी संस्था संलाप तस्करी की शिकार बांग्लादेशी लड़कियों को वापस भेजने में सबसे आगे है. 1999 से 2003 तक संस्था ने कुल 49 लड़कियों (1999 में 17, 2000 में 11, 2001 में 7, 2002 में 3, 2003 में 11) का प्रत्यावर्तन किया है. 2009 में संस्था के होम में कुल 104 लड़कियां आईं, जिनमें से 36 का पुनर्वास किया गया. कई बार इन लड़कियों के मूल घर का पता लगाना बहुत मुश्किल होता है. लिलुआ होम में रखी गई लड़कियों से संलाप के स्वयंसेवक पूछताछ करते हैं. कई बार नए माहौल और कष्टकारी अनुभव से लड़कियां डरी होती हैं और वे अपना पता नहीं बता पातीं. कुछ बदनामी के डर से लौटना नहीं चाहतीं. पते की पुष्टि होने पर संलाप बांग्लादेशी गृह मंत्रालय से संपर्क करती है. इस प्रक्रिया में पुलिस एवं अन्य सरकारी अङ्गसरों का सहयोग होता है. बंगाल में सरकारी होम सामाजिक कल्याण निदेशालय के तहत आते हैं. बांग्लादेशी लड़की के होम में आने पर निदेशालय गृह मंत्रालय को सूचित करता है.

संलाप की कार्यक्रम समन्वयक ताप्ती भौमिक ने बताया कि अदालती आदेश और स्वयंसेवी संगठनों के प्रयास से ज़्यादातर लड़कियों-बच्चों को उनके घर वापस भेजा जाता है. पश्चिम बंगाल के लक्ष्मीकांतपुर के पास रघुनाथपुर की हसीना को पुणे के एक कोठे पर बेचा गया. उसे 2006 में संलाप के पुनर्वास केंद्र में लाया गया और फिर उसके घर भेज दिया गया. चार माह बाद संलाप की टीम उसकी ख़बर लेने उसके घर गई तो उसकी सौतेली मां मिली. उसने बताया कि हसीना की शादी हो गई है. उसका पति लक्ष्मीकांतपुर में चमड़े का बैग बनाता है, पर वे लोग पूरा विवरण नहीं दे पाए कि हसीना उससे कब और कैसे मिली? शादी कब हुई? क्या कोई फोटो है? एक पड़ोसी ने बताया कि हसीना गर्भवती हो गई थी. उसे पिता का थोड़ा-बहुत प्यार तो मिलता था, पर सौतेली मां का अत्याचार जारी रहा. फिर अचानक उस बैग बनाने वाले आदमी से रहस्यमय शादी हो गई? संलाप से जुड़ी मीता घोष ने बताया कि वापस घर भेजी गईं 10 लड़कियों की खोज-ख़बर ली गई, पर उनमें से एक का भी पता नहीं चला. लक्ष्मीकांतपुर की एक लापता लड़की के बारे में उसकी बहन ने बताया कि वह वापस मुंबई के उसी कोठे पर चली गई है, जहां से पुलिस ने उसे छुड़ाया था. उत्तर 24 परगना की एक लड़की एचआईवी के साथ आई. उसे भी घर वापस भेजा गया. पता चला कि अपने रोग के बारे में बताए बिना उसने लखनऊ के एक आदमी से शादी कर ली. उत्तर 24 परगना के हसनाबाद की सबीना को भी होम से उसके घर वापस भेजा गया. वह पुणे के एक कोठे से छुड़ाई गई थी. पता करने पर उसकी बहनों ने बताया कि अब सबीना यहां नहीं रहती, उसने शादी कर ली है. कहां और किससे का जवाब स़िर्फ मां जानती है, गांव के लोग भी नहीं.

जिन लड़कियों को ख़ुद उनके मां-बाप शादी के बहाने बेच देते हैं, उन्हें होम या वापस उनके घर भेजने का कोई मतलब नहीं होता. बंगाल के मालदा ज़िले के निजगांव की मेमी खातून को दो साल पहले 26 हज़ार में ख़रीद कर तस्करों ने दिल्ली के परमेश्वर लाल बैरवा नामक एक आदमी की पत्नी बना दिया. शराबी परमेश्वर उसे मारता-पीटता था. आख़िर में इलाज कराने के बहाने वह घर से भाग निकली. उसने गांव में उस जैसी चार-पांच लड़कियों का पता लगाया, जो बंगाल से गई थीं. उसे कुछ समय तक राजस्थान विश्वविद्यालय महिला संघ के होम शक्ति स्तंभ में रखा गया. मेमी घर लौटना नहीं चाहती थी, क्योंकि मां-बाप उसे बेच चुके थे और तस्कर आकर फिर वहां से उठा ले जाते. वह होम की एक अलग-थलग ज़िंदगी जीने पर मजबूर है.

कोठे से बाहर निकल कर खुली हवा में सांस लेने की तमन्ना आसानी से पूरी नहीं होती. लड़की कोठा संचालक और तस्कर के ख़िला़फ गवाह बनती है तो उसके संघर्ष का लंबा सिलसिला शुरू हो जाता है. 10 साल पहले सोनागाछी के अपने घर से आज़ाद कराई गईं 9, 10, और 11 साल की जाधव बहनों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. भोपाल निवासी उसका परिवार परंपरागत रूप से कोठा चलाने का पेशा करता है. बेहतर माहौल में इनका पालन-पोषण हो सके, इसलिए पुलिस ने इन्हें लिलुआ होम में रखा. डॉक्टर ने प्रमाणित किया कि ये सेक्स वर्कर बन चुकी थीं. सरकार की ओर से संचालित लिलुआ होम में इनकी ज़िंदगी नरक से भी बदतर हो गई. काफी गुहार के बाद इन्हें जुविनाइल जस्टिस एक्ट के तहत बने संलाप के नरेंद्रपुर होम में रखा गया. दो छोटी बहनें आज सियालदह के लोरेटो स्कूल में पढ़ती हैं. बड़ी बहन पत्राचार शिक्षा के ज़रिए अध्ययन कर रही है. इन बहनों ने मां-बाप को यह पेशा छोड़ने के लिए अदालत के कठघरे में खड़ा किया. पर तारीख़ पर तारीख़ वाली न्याय व्यवस्था ने इन जवान हो चुकी लड़कियों को हताश कर दिया है. सुनवाई कर रहे मजिस्ट्रेट का तबादला हो गया है. घरवालों ने बताया कि इनका आरोप झूठा है और मामला दूसरी अदालत में स्थानांतरित हो गया. सबसे छोटी बहन कक्षा 8 में पढ़ती है. उसका कहना था, अदालत में लोग घूरते हैं और तारीख़ के चक्कर में हमें अक्सर स्कूल में अनुपस्थित होना पड़ता है. मामले लंबे खिंचते हैं और आरोपी बरी हो जाते हैं. पश्चिम बंगाल महिला आयोग की 2007 में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि केवल 7.1 प्रतिशत मामलों में ही दोषियों को सज़ा मिल पाती है. वैसे फास्ट ट्रैक अदालतों में भी इन मामलों की सुनवाई होती है, पर कई लड़कियां घबरा कर बयान बदल देती हैं और कई लापता हो जाती हैं.

जाधव बहनों जैसा हाल रोशनी का भी है. मध्य प्रदेश मूल के उसके परिवार का धंधा सोनागाछी में देह व्यापार कराना है. उसके साथ बहन रेवा और शबनम भी हैं. बेरिया जाति के परिवारों के लोग अपनी संतानों को इस पेशे में झोंक देते हैं. पर रोशनी ने अपनी दुनिया अलग बसाने की ठानी. 9 साल की उम्र से वह संलाप के स्नेह होम में है और दर्जीगिरी का प्रशिक्षण लेकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है. काठमांडू की गीता थापा काम दिलाने के बहाने नागपुर के कोठे पर बेच दी गई. वहां से सोनागाछी आई तो एचआईवी लेकर आई. उसका सपना अपने देश नेपाल लौटने का है. इस महारोग की वजह से वह हाल में एक स्वयंसेवी संगठन की मदद से नेपाल वापस भेजी गईं 16 लड़कियों में शामिल नहीं हो पाई. पंजाब निवासी पूजा सिंह को कोलकाता के आमतला में रहने वाली उसकी दीदी ने काम देने के बहाने बुलाया और देह व्यवसाय में लगा दिया. पुलिस ने उसे निकाल कर होम में रखा. 17 साल की मोहसिना मल्लिक को बारुईपुर से ले जाकर दिल्ली में देह व्यवसाय में झोंका गया और बंगाल पुलिस उसे छुड़ाकर यहां ले आई. वह महिला पुलिस बनना चाहती थी, पर अब जरी का काम सीख रही है. 22 साल की आसमा मोल्ला बांग्लादेश के खुलना में पति और बच्चे को छोड़कर बंगाल के सीमावर्ती बनगांव आई. वहां उसे एक बदनाम बस्ती में नियमित रूप से नशीले पदार्थ खिलाकर देह व्यापार के लिए अभ्यस्त किया गया. पुलिस उसे छुड़ाकर होम ले आई. वह वापस बांग्लादेश लौटना चाहती है. मुर्शिदाबाद की पलासी से आई सोनाली शेख पांच माह से इस होम में है. सोनाली को काम दिलाने के बहाने एक तस्कर ने उसके मां-बाप को मना लिया. वह कथित अच्छा काम एक यौन बस्ती में मिला. कुछ महीनों बाद वह संलाप की मदद से बाहर निकली. अब होम में जरी का काम और टेलरिंग सीख रही है.

एक दूसरे स्वयंसेवी संगठन से जुड़ी महिला ने बताया कि एक लड़की को यह साबित कर पाना बड़ा कठिन होता है कि अमुक आदमी ने ही उसे इस यह पेशा अपनाने पर मजबूर किया. सरकारी वकील को भी यह पता नहीं होता कि वह किसका केस लड़ रहा है. संलाप की निदेशक इंद्राणी सिन्हा ने बताया कि हम लड़कियों को एक बेहतर ज़िंदगी के लिए प्रशिक्षित करते हैं. कार्यक्रम समन्वयक ताप्ती भौमिक ने बताया कि 1996 में मुंबई के कमाठीपुर में मारे गए छापे के बाद पता चला कि 60 प्रतिशत लड़कियां आंध्र की थीं, पर अब 90 प्रतिशत पश्चिम बंगाल की होती हैं. बंगाल में सबसे ज़्यादा 18 सरकारी होम हैं, जिनमें सबसे बड़ा होम लिलुआ का है. इसमें 400 पीड़ितों को रखने की क्षमता है, अभी इसमें 600 लड़कियां एवं महिलाएं हैं. विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों की ओर से चलाए जाने वाले होम्स की संख्या 26 है. कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज की प्रोफेसर अनन्या चटर्जी ने 2009 में अपनी डाक्यूमेंट्री-अंडरस्टैंडिंग ट्रैफिकिंग में लड़कियों की तस्करी और उनके पुनर्वास की समस्या की छानबीन की है. अनन्या को नेपाल सरकार से तो सहयोग मिला, पर खालिदा जिया सरकार ने टीम को वहां जाने की अनुमति नहीं दी. नेपाल और बांग्लादेश से हर माह अनुमानतः 500 लड़कियां भारत लाई जाती हैं, पर उन्हें वापस भेजने की दर काफी कम है.

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