भारत-बांग्‍लादेश सीमाः मवेशियों की तस्‍करी और जाली नोटों का धंधा

तस्करों के लिए बांग्लादेश जाकर मवेशियों को बेचना फायदे का सौदा बन गया है. वहां मवेशियों की ऊंची क़ीमत मिलती है. असम की बराक घाटी के रास्ते बांग्लादेश के भीतर बड़े पैमाने पर मवेशियों की तस्करी जारी है. सीमा सुरक्षाबल के सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश में भारत के मवेशियों की काफी मांग है. कालीगंज, काबूगंज, चिरागी और सीलटेक के बाज़ारों में नियमित रूप से मवेशियों की बिक्री की जाती है. हाल में करीमगंज ज़िले के नीलम बाज़ार इलाक़े में मवेशियों की तस्करी करने के आरोप में सफीकुल इस्लाम, नीलू दास एवं रियाजुद्दीन नामक व्यक्तियों को गिरफ़्तार कर उनसे पूछताछ की गई. पता चला है कि मवेशी तस्करों ने बांग्लादेश में टका के बदले रुपये लेने के झमेले से बचने का नायाब तरीक़ा ढूंढ निकाला है. वे मवेशियों के बदले नकली भारतीय नोट लेना पसंद करते हैं. बांग्लादेशी एजेंट भारत में मौजूद अपने साथियों की मदद से दोहरे फायदे वाला यह धंधा कर रहे हैं. सीमा पर निगरानी का इंतज़ाम न होने से यह ग़ैर क़ानूनी कार्य आसान हो गया है.

बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकार है, जिसका रवैया भारत के प्रति मैत्रीपूर्ण है. इसके बावजूद पाकिस्तान अपने विभिन्न शहरों में भारतीय मुद्रा छाप कर बांग्लादेश के रास्ते भारत पहुंचाने की साज़िश को अंजाम दे रहा है और इस संबंध में भारतीय ख़ुफिया एजेंसियों के पास ठोस सबूत भी उपलब्ध हैं. बांग्लादेश में अमेरिकी डॉलर की मांग ज़्यादा है और भारतीय रुपये की सहायता से डॉलर का विनिमय आसान समझा जाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय रुपये की अपनी एक साख है.

मवेशी तस्करी का जाल फैलता ही जा रहा है. इसके साथ आईएसआई और भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों के तार भी जुड़ते जा रहे हैं. भारतीय एजेंट पहले बांग्लादेश में निर्धारित स्थान पर मवेशियों को पहुंचाते हैं. एक गाय की क़ीमत चार हज़ार रुपये है, मगर तस्कर को चार हज़ार असली रुपये की जगह दस हज़ार रुपये के जाली नोट दिए जाते हैं. चालीस रुपये के बदले सौ रुपये का जाली नोट देने का नियम चल रहा है. सीमा पर रहने वाले नागरिक मूकदर्शक बने रहते हैं, क्योंकि मवेशियों की तस्करी और जाली नोटों का कारोबार करने वाले हथियारों से लैस होते हैं. तस्कर अंधेरा हो जाने पर मवेशियों को साथ लेकर बांग्लादेश की सीमा में दाख़िल होते हैं. भारतीय सीमा में जहां मवेशियों के सीमित बाज़ार लगते हैं, वहीं बांग्लादेश में मवेशी बिक्री केंद्रों की तादाद बढ़ती जा रही है. इससे साफ पता चलता है कि जाली नोटों के लालच में किस तरह तस्कर बड़ी संख्या में मवेशियों को बेच रहे हैं.

बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकार है, जिसका रवैया भारत के प्रति मैत्रीपूर्ण है. इसके बावजूद पाकिस्तान अपने विभिन्न शहरों में भारतीय मुद्रा छाप कर बांग्लादेश के रास्ते भारत पहुंचाने की साजिश को अंजाम दे रहा है और इस संबंध में भारतीय ख़ु़फिया एजेंसियों के पास ठोस सबूत भी उपलब्ध हैं. बांग्लादेश में अमेरिकी डॉलर की मांग ज़्यादा है और भारतीय रुपये की सहायता से डॉलर का विनिमय आसान समझा जाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय रुपये की अपनी एक साख है. केंद्रीय गृह मंत्रालय इस बात पर चिंता व्यक्त कर चुका है कि जाली नोटों की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंच रहा है. सुरक्षा एजेंसियों ने जांच के ज़रिए पाया है कि 500 और 1000 रुपये के जाली नोट आधुनिक तकनीक की सहायता से छापे जाते हैं और देखने में बिल्कुल असली जैसे लगते हैं.

पिछले दिनों मिजोरम सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षाबल की ख़ु़फिया शाखा ने करीमगंज ज़िले में हिलालुद्दीन नामक व्यक्ति को 40 हज़ार रुपये के जाली नोटों के साथ गिरफ़्तार किया. पूछताछ के दौरान उसने बताया कि यह रकम वह किसी को देने जा रहा था, जो इन्हें नगालैंड के दिमापुर में किसी को देने वाला था. पूछताछ में पता चला कि जाली नोटों का इस्तेमाल मवेशी तस्करी के लिए किया जाता है और भारतीय बाज़ारों में भी जाली नोट खपाए जाते हैं. पिछले दिनों सीमा सुरक्षाबल ने करीमगंज में तीन ट्रकों पर लदे 11 मवेशियों को पकड़ा, जिन्हें बांग्लादेश ले जाने की कोशिश की जा रही थी. ट्रक चालक सूरमा अली ने बताया कि वह इन मवेशियों को त्रिपुरा सीमा तक पहुंचाने जा रहा था, जहां सीमा पार कर इन्हें बांग्लादेश में बेचने की योजना थी. इस तरह स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश सीमा पर किस तरह मवेशियों की तस्करी और जाली नोटों का धंधा फल-फूल रहा है.

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