दक्षिण बिहार के केंद्र बिंदु गया ज़िले में प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के वोट बहिष्कार के ऐलान के बीच होने वाले विधानसभा चुनाव में लोकतंत्र की परीक्षा होगी. चुनाव आयोग और प्रशासन सुरक्षाबलों के सहारे जहां कड़ी चौकसी के बीच शांतिपूर्ण चुनाव के लिए प्रतिबद्ध हैं, वहीं नक्सली संगठन भी अपने मंसूबों को चुनाव के दौरान अंजाम देने की तैयारी में हैं. गया ज़िला झारखंड की सीमा से लगा हुआ है. 10 विधानसभा क्षेत्रों को अपने दामन में समेटे यह ज़िला कोई भी चुनाव आने पर अति संवेदनशील हो जाता है. कारण सा़फ है, 10 में से 9 विधानसभा क्षेत्र उग्रवादग्रस्त हैं. गया शहर को छोड़कर झारखंड की सीमा से लगे बाराचट्टी एवं इमामगंज के साथ-साथ गुरुआ, शेरघाटी, बोधगया, बेलागंज, वजीरगंज, अतरी एवं टिकारी विधानसभा क्षेत्र नक्सलियों की जद में हैं. इन क्षेत्रों में बिना लेवी लिए नक्सली कोई भी विकास कार्य शुरू नहीं करने देते. आम दिनों में ही माओवादियों की कार्रवाई से लोग डरे-सहमे रहते हैं. चुनाव आने पर इन विधानसभा क्षेत्रों के लोग, विशेषकर ग्रामीण और भी खौ़फजदा हो जाते हैं. चुनाव के दौरान सुरक्षाबलों के बलबूते माओवादियों के फरमान को नज़रअंदाज़ करने वाले लोग बाद में माओवादियों के निशाने पर आ जाते हैं और उन्हें इसका खामियाज़ा मौत के रूप में भुगतना पड़ता है. वहीं दूसरी तरफ माओवादियों के डर से वोट बहिष्कार करने वाले लोगों को पुलिस माओवादी समर्थक समझ कर उनके खिला़फ कार्रवाई कर बैठती है. एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ कुआं, आ़खिर जाएं तो जाएं कहां?
झारखंड से लगे सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में माओवादियों के खिला़फ चुपचाप सुलगती यह चिंगारी कभी भी विकराल आग का रूप ले सकती है. हालांकि इमामगंज विधानसभा क्षेत्र से ही बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी विधायक हैं. माओवादियों ने क्षेत्र में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा है, पर चौधरी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच क्षेत्र में जा चुके हैं.
इस बार विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण तरीक़े से कराना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. वहीं दूसरी तरफ भाकपा (माओवादी) को अपने वोट बहिष्कार के फरमान को सफल कराना भी कम मुश्किल नहीं होगा. ऐसी स्थिति में दोनों के बीच टकराव निश्चित है. नतीजा रक्तरंजित चुनाव के रूप में सामने आएगा. यदि पूर्व के चुनावों को देखा जाए तो गया ज़िले में पिछले दो दशक के दौरान शायद ही कोई चुनाव हिंसा रहित हुआ हो. सांसद ईश्वर चौधरी और पूर्व सांसद डॉ. राजेश कुमार की हत्या चुनाव के दौरान ही कर दी गई थी. भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडू का हेलीकॉप्टर जलाने की घटना भी चुनाव के दौरान हो चुकी है. चुनाव के समय गया ज़िले में होने वाली माओवादी हमलों का यह सबसे बड़ा उदाहरण है. पिछले दो दशकों के दौरान चुनाव में पोलिंग पार्टियों पर हमले, कलक्टर भवन उड़ाने, सुरक्षाकर्मियों की हत्या एवं लूटपाट और मतदान बाधित कराने जैसी कई घटनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं. हाल के दिनों में माओवादियों के कुछ कारनामों से ज़िले के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में उनके खिला़फ रोष बढ़ा है, जिसका एक उदाहरण गत 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर इमामगंज विधानसभा क्षेत्र के मैगरा उच्च विद्यालय में माओवादियों द्वारा काला झंडा फहराने पर स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा किए गए विरोध के रूप में देखने को मिला. कुछ माओवादियों ने जब स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर इस स्कूल में काला झंडा फहराना चाहा तो एक छात्रा के प्रबल विरोध ने सभी छात्र-छात्राओं को एकजुट कर दिया और माओवादियों को बच्चों के विरोध के आगे हार माननी पड़ी.
झारखंड से लगे सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में माओवादियों के खिला़फ चुपचाप सुलगती यह चिंगारी कभी भी विकराल आग का रूप ले सकती है. हालांकि इमामगंज विधानसभा क्षेत्र से ही बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी विधायक हैं. माओवादियों ने क्षेत्र में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा है, पर चौधरी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच क्षेत्र में जा चुके हैं. सांसद सुशील कुमार सिंह को भी माओवादियों ने फरमान जारी कर क्षेत्र में आने से मना कर रखा है. प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले इस क्षेत्र में उदय नारायण चौधरी के अलावा कल्याण मंत्री जीतन राम मांझी (बाराचट्टी), प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. अनिल कुमार (टेकारी), राजद विधायक एवं पूर्व मंत्री डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव (बेलागंज), राजद के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व मंत्री शकील अहमद (गुरुआ) और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं विधायक अवधेश कुमार सिंह (वजीरगंज) से अपने दल के उम्मीदवार हैं. उक्त सभी क्षेत्र उग्रवादग्रस्त हैं और हर चुनाव में इन क्षेत्रों में हिंसक घटनाएं हुई हैं.
इस बार गया ज़िले के 10 विधानसभा क्षेत्रों में दो चरणों में यानी 9 और 20 नवंबर को मतदान होना है. चुनाव आयोग और प्रशासन की ओर से पर्याप्त सुरक्षाबल उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है. फिर भी जो स्थिति उभर कर सामने आ रही है, उससे स्पष्ट है कि सुरक्षाबलों की चौकसी और माओवादियों के वोट बहिष्कार के बीच लोकतंत्र की परीक्षा होगी. इन हालात में जनता का क्या रु़ख होगा, यह मतदान के दिन ही पता चलेगा. फिलहाल संभावित प्रत्याशी और ग्रामीण जनता नक्सलियों के फरमान से दहशतजदा हैं.
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