जीवन मूल्‍य कितने जरूरी

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आज अगर जीवन के मूल्यों के बारे में बात करें तो लगता है कि जैसे मज़ाक उड़ाया जा रहा है. आम धारणा है कि कलयुग में इन मूल्यों पर चल पाना संभव नहीं. अक्सर जब मूल्यों की बात आती है तो हम कहते हैं कि सच्चाई, वफादारी, ईमानदारी, माता-पिता का आदर आदि ही जीवन के मूल्य हैं. सबसे पहले तो यह जानना ज़रूरी है कि मूल्य है क्या? जीवन मूल्यों पर चलकर ही किसी भी घर, कंपनी, समाज एवं देश के चरित्र का निर्माण होता है. मूल्य यानी जीवन के रास्ते को तय करने के लिए कुछ मूलभूत आधार. अगर देखें तो सच बोलने को मूल्य इसलिए कहा गया, क्योंकि सच बोलकर सदा अच्छा महसूस होता है, एक अंदरूनी ताक़त का एहसास होता है, पवित्रता का अनुभव होता है और सच बोलना सहज लगता है. पीछे मुड़कर अगर आप देखें तो जब पहली बार सच से परे हुए थे यानी झूठ बोला था, बहुत असहज होकर बोला था. मन ही नहीं, शरीर की भी प्रतिक्रिया अलग तरह की थी, क्योंकि आत्मा का मूलभूत मूल्य है सच. उसी तरह व़फादार और ईमानदार रहना भी हमें अच्छा लगता है. ग़ौर कीजिएगा, जब भी कोई धोखा या चोरी करता है तो मन कचोटता है, मुंह सूखता है, शरीर कांपता है, क्योंकि वह सच से परे जा रहा होता है.

कभी सोचा आपने कि इन सबको मूल्य क्यों कहा गया है? मूल्य यानी वह वस्तु, जिसकी कुछ क़ीमत हो. इन सभी व्यवहारों की क़ीमत है, हम जितना अधिक से अधिक इस व्यवहार को इस्तेमाल करते जाते हैं, हर बार का इस्तेमाल किया गया यह व्यवहार अपनी क़ीमत अदा करता और हमारे सत्कर्म के खाते में जमा हो जाता है. जैसे हम कहते हैं कि हर झूठ की, धोखे की, बेईमानी की क़ीमत अदा करनी पड़ती है. उसी तरह सच पर चले हर कर्म की, व़फादारी की, प्रेम की, सहयोग कीयानी इन सारे व्यवहारों की क़ीमत जमा होती है. साथ ही साथ मन की मज़बूती और परमात्मा की कृपा सुनिश्चित हो जाती है.

कई बार सवाल उठता है कि आज के युग में जो सच के रास्ते पर चलता है, वह जल्दी सफल नहीं होता, लेकिन आप ध्यान से देखें, जो व्यक्ति अपने जीवन मूल्यों पर अडिग रहकर चलता है, वह कभी भी भय में नहीं जीता. उसका चेहरा हमेशा आत्मविश्वास से दमकता रहता है. वह निर्भय होकर अपनी बात कहता है और हर पल सुरक्षा का अनुभव करता है.

अगर आप समझें तो यही जीवन मूल्य हमारे लिए एक सुरक्षा कवच बन जाते हैं. इनसे हमें हर परिस्थिति का सामना करने की शक्ति मिलती है. हमें हर कोई सम्मान की दृष्टि से देखता है. अगर जीवन मूल्यों पर चलकर इतना कुछ मिलता है तो हम सुख, शांति और प्रेम के लिए अन्यत्र कहीं क्यों भटकते हैं? इन पर चलना जब हमारे जीवन का स्वभाव है तो हम इन पर चल क्यों नहीं पाते? विषम परिस्थितियां आते ही डगमगा क्यों जाते हैं? क्यों आसान लगता है बेईमान होना, क्यों व़फादार रहना मुश्किल लगने लगता है? वजह, जब भी इन मूल्यों को हम अपनाते हैं, ज़िम्मेदारी का एहसास होता है. अगर हम आध्यात्मिक हो जाएं, ख़ुद को ईश्वर के साथ जोड़ लें और उसके दिखाए रास्ते पर चलते जाएं तो हमारे साथ हमेशा अच्छा ही होगा. सारा भय भी ख़त्म हो जाएगा. जिस चरित्रवान समाज-देश की कल्पना हम करते हैं, जिसकी इच्छा हमारे मन में है और जो हम कुछ हटकर अलग सा करना चाहते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से ही होगी. स्व-परिवर्तन से ही जग परिवर्तन संभव है. आइए इन जीवन मूल्यों को समझें, इन पर चलकर एक सुदृढ़, सभ्य और स्वस्थ समाज की रचना का हिस्सा बनें.

ओम साई राम.

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