मुद्दे गुम, धर्म और जाति की राजनीति हावीः अजीत सिंह

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पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के पुत्र, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह देश के किसानों की समस्याओं को लेकर खासे चिंतित हैं. वह केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा किसानों के प्रति बरती जा रही उपेक्षा से काफी दु:खी हैं. वह चाहते हैं कि पूरे देश के किसानों को एकजुट किया जाए, जिससे उनकी समस्याओं का समाधान खोजा जा सके. चौथी दुनिया के संवाददाता शशि शेखर ने पिछले दिनों अजीत सिंह से एक लंबी बातचीत की. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

1992 में अयोध्या कांड के बाद से राजनीति में मुद्दे ख़त्म हो गए. धर्म और जाति की राजनीति हो गई. अब पिछले 2-3 सालों में फिर परिवर्तन हुआ है. जैसे अभी गन्ना और ज़मीन अधिग्रहण के मसले पर किसान इकट्ठे हो गए, तब सरकार को बात समझ में आई. यह प्रजातंत्र के लिए ग़लत संकेत है कि जब आप आग लगाने की घोषणा करते हैं, तभी सरकार जागती है.

क्या किसानों के लिए विकास की कोई परिभाषा हो सकती है?

यह तो बहुत बड़ा सवाल है. आख़िर विकास की ही क्या परिभाषा है? अभी तो समस्या यह है कि पिछले 20 सालों में सभी चीज़ें लिबरलाइज़्ड कर दी गईं. पहले सब कंट्रोल में था यानी क्या पैदा हुआ है, किस दाम पर बिकेगा, क्या टेक्नोलॉजी लगेगी और कहां फैक्ट्री लगेगी. अब हर आदमी को अधिकार है कि वह कुछ भी ख़रीदे, बेचे, कहीं से लाए, कहीं फैक्ट्री लगाए, कुछ पैदा करे, कोई मशीनरी लाए. लेकिन किसान जो ज़मीन का मालिक है, उसकी ज़मीन सरकार जब चाहे ले लेती है, जिस दाम पर चाहे ले लेती है, जिसे चाहे बेच देती है. बेसिक सवाल यह है कि क्या सरकार को यह अधिकार होना चाहिए? ठीक है देश की सुरक्षा के लिए ज़मीन चाहिए, कोई मना नहीं करेगा. मैं तो यह कहूंगा कि अगर रेल लाइन बिछाने के लिए चाहिए, एक्सप्रेस-वे के लिए चाहिए, वह भी आप बाज़ार दाम दो और ले लो, लेकिन आप बिल्डर को देने के लिए, किसी उद्योगपति को देने के लिए किसानों की ज़मीन औने-पौने दाम पर ले रहे हो तो सवाल यह उठता है कि क्या सरकार को रियल एस्टेट एजेंट का काम करना चाहिए? क्या सरकार ज़मीन की दलाली के लिए है? और वह 1894 के उस क़ानून का सहारा लेती है, जिसमें कहा गया है कि आप सार्वजनिक हितों के लिए ज़मीन ले सकते हैं. लेकिन इतने बेईमान नेता, अधिकारी आ गए हैं कि अब तो सार्वजनिक हित में गोल्फ कोर्स बनाना, हाईटेक सिटी बनाना भी शामिल हो गया है. तो इसलिए उस कारण को बदलने की ज़रूरत है. इसलिए हमने यही मुहिम चला रखी है. पांच हाईटेक सिटी की ज़मीन दी जा रही है जेपी ग्रुप को. कहा जा रहा है कि वे लीज़ पर हैं. 90 साल बाद सरकार को एक विकसित एरिया मिल जाएगा. मैं कहता हूं कि जहां तीन फसलें उग रही हैं, क्या वह विकसित ज़मीन नहीं है? सबसे बड़ी जरूरत है 1894 के क़ानून को बदलने की.

अभी संसद में जो भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन आ रहा है, क्या वह किसानों के हित में होगा?

देखिए, सवाल तो यह उठता है कि डेढ़ साल हो गया इस सरकार को बने हुए, क्यों नहीं अभी तक वह बिल पार्लियामेंट में लाया गया? सही बात तो यह है कि सारे देश में जितनी भी सरकारें हैं और अधिकारी हैं, वे इसी क़ानून का सहारा लेकर किसानों को लूट रहे हैं. कहीं न कहीं इच्छाशक्ति का अभाव है और धनशक्ति का प्रभाव है. दूसरी बात यह है कि इन्हें सभी पार्टियों को बुलाकर बात करनी चाहिए, क्योंकि काफी कमियां हैं इस क़ानून में. इसमें सार्वजनिक अदर यूसेज भी लिखा है. हमारा कहना है कि इससे क़ानून का दुरुपयोग होगा. यह परिभाषित करना चाहिए कि सरकार किस चीज के लिए ज़मीन ले सकती है और किसके लिए नहीं. हमने लिखा है इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए, आदमी के लिए और जहां सरकार का 51 प्रतिशत पैसा लगा, वहां ज़मीन ली जा सकती है. वरना 10 प्रतिशत पैसा लगाकर एग्रीमेंट कर लेंगे, फिर वह सारी ज़मीन उन्हें दे देंगे. उसी तरह जिस चीज के लिए ज़मीन ले रहे हो, अगर आपने पांच साल में काम नहीं किया तो वह ज़मीन किसानों को वापस दे दी जाएगी. तीसरे, बाज़ार भाव तय करते समय आप जिस चीज के लिए ज़मीन ले रहे हो, वह भी दाम सोचिए. आज वह कृषि के लिए ज़मीन है, उसका आज 100 रुपये दाम है और अगर कल आप कमर्शियल कर दो तो वह 5000 रुपये की हो जाएगी. क्यों सरकार 100 रुपये दाम पर ज़मीन लेकर 5000 रुपये पर दे रही है? आपने सेक्शन 4 कर दिया और 20 साल तक कुछ नहीं किया. कहीं न कहीं टाइम लिमिट होनी चाहिए. तो हम जो ये सारे संशोधन सुझा रहे हैं, उसे प्रेसिडेंट के एसेंट के लिए किया है. लेकिन हम चाहते हैं कि प्रधानमंत्री सभी पार्टियों की मीटिंग बुलाएं और सबसे सलाह लें, तब कुछ तय करें.

भूमि अधिग्रहण के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की और भी बहुत सारी समस्याएं हैं, जैसे उन्हें खाद, पानी एवं बीज सस्ते दामों पर मिले, इसके लिए संघर्ष क्यों नहीं हो रहा है?

संघर्ष होता है. पिछले साल मथुरा में किसानों को खाद नहीं मिल रही थी, लोगों ने संघर्ष किया. लेकिन मुश्किल यह आ रही है कि हर जगह अलग-अलग स्थानीय स्थितियां हैं. फिर किसान को संगठित करना मुश्किल है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि पिछले 20 सालों में, 92 में जो अयोध्या कांड हुआ, उससे राजनीति में मुद्दे ख़त्म हो गए. धर्म और जाति की राजनीति हो गई. तो राजनीतिज्ञ भी क्यों मुद्दे उठाएं, जब चुनाव जीतना है धर्म और जाति के आधार पर. अब पिछले 2-3 सालों में फिर परिवर्तन हुआ है. जैसे अभी गन्ने का क़ानून आया, किसान इकट्ठे हो गए थे. इसी तरह जब ज़मीन अधिग्रहण पर किसान इकट्ठे हो गए, तभी उन्हें समझ में आया. यह प्रजातंत्र के लिए ग़लत संकेत है कि आप आग लगाने की घोषणा करते हैं, तभी सरकार जागती है.

आज किसानों की आत्महत्या न राजनैतिक दलों और न ही संसद के लिए चिंता पैदा करती है. क्या आने वाले समय में किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं और बढ़ेंगी?

देखिए, आज भी पूरे देश में क़रीब-क़रीब आधा क़र्ज़ा सरकारी बैंकों द्वारा डिस्ट्रीब्यूट नहीं होता है. किसान जो क़र्ज़ा लेता है, वह आढ़तियों से लेता है, मनीलैंडर्स से लेता है. 50 प्रतिशत ही बैंकों द्वारा पूरा होता है. दूसरी एक और समस्या है. जो किसान ज़्यादा ग़रीब है, दो बीघे-चार बीघे ज़मीन पर खेती करता है, सब्जी आदि उगाता है, उसे अगर लोन चाहिए तो सरकारी बैंक में आवेदन करने में ही 6 महीने लग जाएंगे. वहां तक यह सुविधा नहीं पहुंच पा रही है. जो आप क़र्ज़ा माफ करते हो, उसका फायदा ऐसे किसानों को नहीं मिलता. अगर आप यह आशा करते हो कि फ्री मार्केट इकोनॉमी में किसानों का भला होगा, वह नहीं हो पाएगा. किसान के पास वह ताक़त नहीं है. इसलिएजब हम कांट्रैक्ट फार्मिंग की भी बात करते हैं तो उसमें भी सरकार का दख़ल होना ज़रूरी है. आप कितना भी एग्रीमेंट कर लो, क्या किसान 10 साल मुक़दमा लड़ पाएगा. चाहे जब भी ग़रीब का सवाल आएगा, उसमें सरकार की भागीदारी ज़रूरी है, वरना ग़रीब किसान का काम चलने वाला नहीं है.

किसानों का कोई मज़बूत संगठन न होना या किसानों के बीच राजनीतिक जागरूकता का अभाव क्या उनके संघर्ष को हार में बदल देता है?

देखिए, 70 और 80 के दशक में हर प्रदेश में किसानों के संगठन थे. नायडू थे तमिलनाडु एवं कर्नाटक में, महाराष्ट्र में जोशी थे. हरियाणा में भी संगठन थे, लेकिन 1992 के बाद राजनीति ही बदल गई. मुद्दे ही ख़त्म हो गए किसानों के, भ्रष्टाचार के, पानी के. पहले चुनाव जीतने के लिए आदमी को जनता के बीच जाकर उनके मुद्दों के लिए लड़ाई लड़नी होती थी, तब जाकर जनता उसे चुनती थी. अब वह चीज ही ख़त्म हो गई. अब जैसा मैंने कहा, परिस्थितियां बदल रही हैं. कितने दिनों बाद किसान दिल्ली में आया, गन्ने और ज़मीन अधिग्रहण के मसले पर. दिल्ली का उदाहरण देखकर कानपुर, कुशीनगर एवं इलाहाबाद के छोटे से छोटे गांवों के किसानों में भी थोड़ी हिम्मत आई और वे भी अब आवाज़ उठाना चाहते हैं. कहीं भी आप किसान की ज़मीन ले लीजिए और उसे मुआवज़ा दे दीजिए! जो पुश्तैनी खेती करता चला आ रहा है, क्या वह कल कंप्यूटर की दुकान खोल लेगा? पैसा लेकर क्या करेगा?  किसान की अपनी एक पहचान है, वह ज़मीन का मालिक है. थोड़े दिनों बाद वह भी भीख मांगता फिरेगा, मज़दूरी करेगा. तो कहीं न कहीं पुनर्वास की नीति होनी चाहिए. जो आप कह रहे हैं कि विकास के लिए ज़मीन ले रहे हैं तो कहीं न कहीं उस ज़मीन पर किसान की भी हिस्सेदारी ज़रूर होनी चाहिए.

बिना नेतृत्व के किसानों ने कई जगह सफल संघर्ष किए हैं. क्या ऐसे संघर्ष भविष्य में और बढ़ेंगे?

कहीं न कहीं तो नेतृत्व उभरता ही है, जो जनता की समस्याएं उठाकर उनके लिए लड़ता है. कहीं न कहीं स्थानीय नेतृत्व तो होगा ही. लोग या संगठन तो होंगे ही. देखिए, हमारे देश में डेमोक्रेसी तो अभी आई है, लेकिन पहले हमारा देश पंचायतों द्वारा ही चलता रहा है. पंचायत से ही नेतृत्व उभरता है. आप एक ऐसा नेतृत्व क्यों चाहते हैं कि एक आदमी ही नेतृत्व संभाले.

आपने पंचायत की बात की. इसी से जुड़ा एक सवाल है, ग्रामसभा कांस्टीट्यूशनल बॉडी है. क्या भूमि अधिग्रहण का मसला सीधे पंचायत और ग्रामसभा को नहीं दे देना चाहिए?

आप यह तो कह सकते हैं कि उनकी सहमति ले लो, लेकिन सीधा मामला ज़मीन मालिक और ख़रीदने वाले के बीच होना चाहिए न. ग्रामसभा इसमें मदद कर सकती है. साथ ही पुनर्वास नीति जो निजी कंपनी ज़मीन ले रही है, उसमें भी लागू करनी पड़ेगी. लेकिन देश में बहुत जगह ऐसी स्थिति है कि जिस तरह की सरकारें हैं, वहां ग्रामसभा को निष्क्रिय बना दिया गया है. क्या आप मानेंगे कि उत्तर प्रदेश में ग्रामसभा की सुनी जाएगी? हर तरह की धमकियां भी दी जाती हैं, लेकिन अल्टीमेटली तो किसान ही तय करेगा.

अभी भूमि अधिग्रहण क़ानून में जो संशोधन आ रहा है, क्या उसमें आप ग्रामसभा की बात रखेंगे?

मैं इसमें देखता हूं. मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्री एक मीटिंग बुलाएं, जिसमें सभी राजनीतिक दलों और उन लोगों को भी बुलाया जाए, जो स्थानीय स्तर पर अपना आंदोलन चलाते हैं.

दिल्ली में किसान रैली के दौरान सारा विपक्ष आपके साथ मंच पर मौजूद था, लेकिन उसके बाद विपक्ष की ओर से कहीं कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी. संशोधन का जो मुद्दा था, उसे राहुल गांधी ने हथिया लिया…

आप सोचते हैं कि जनता समझती नहीं है. मैंने पहले ही कह दिया था कि सरकार दो साल से यह बिल क्यों नहीं लाई. देखिए, सब इकट्ठे हुए, मक़सद यह था कि बिल जल्दी से जल्दी बदला जाए. वह आश्वासन प्रधानमंत्री ने दिया और उसका श्रेय लेने की कोशिश कोई करे, वह अलग बात है, लेकिन ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि किसान इकट्ठे हो गए थे. पहले तो हम भी मिले थे प्रधानमंत्री और सीपी जोशी से, तब भी समझ में नहीं आया उन्हें. तो श्रेय लेने का सवाल नहीं है, वह सब जानते हैं कि किस लिए हुआ. और ऐसा भी नहीं है कि उसके बाद सब बंद है. हम सभी संगठनों से बात भी कर रहे हैं.

क्या किसानों का सवाल कभी बड़ा राजनैतिक सवाल बन पाएगा और देश में एक सशक्त किसान आंदोलन खड़ा हो पाएगा?

आप देख रहे हैं कि गन्ना और भूमि अधिग्रहण मामलों में आंदोलन खड़ा हुआ या नहीं! ज़मीन अधिग्रहण का असर हर जगह है. ऐसी बात नहीं है. जैसा मैंने कहा, धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है. लोग अब फिर मुद्दे समझने लगे हैं, लड़ने लगे हैं. हमारे देश में कई संगठन यह काम कर रहे हैं, लेकिन कई बार उनकी आवाज़ सुनी जाती है, कई बार नहीं.

लेकिन एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन क्यों नहीं खड़ा हो पाया?

कई बार चुनाव में मुद्दे दूसरे आ जाते हैं. कई बार स्थानीय मुद्दे आ जाते हैं. जैसे मेरा मानना है कि इस बार उत्तर प्रदेश का चुनाव मायावती को हराने के लिए होगा. मायावती भी अपने दम पर नहीं जीती थीं, उस समय चुनाव हुआ था मुलायम सिंह को हराने के लिए. कई बार मुद्दे गौण हो जाते हैं.

एग्रीकल्चर सेक्टर को लेकर जो विदेशी समझौते हो रहे हैं, उनका किसानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कहीं यह सब किसानों को गुलाम बनाने की साजिश तो नहीं है?

प्रभाव तो पड़ता ही है. अभी कुछ पड़ोसी देशों से मसालों के मुफ्त आयात के जो समझौते हुए हैं, उनसे केरल के किसानों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है. समझौते होते हैं तो कहीं न कहीं फर्क़ पड़ना ही है. डब्लूटीओ की लड़ाई भी इसीलिए चल रही है. गुलाम बनाने की बात तो नहीं कहेंगे, लेकिन जब ग़रीब आदमी की आवाज़ उठाने वाले कमज़ोर पड़ जाते हैं तो जिन लोगों के अपने हित हैं और सत्ता में हैं, वे हावी हो जाते हैं.

अब किसानों को क्या करना चाहिए?

पिछले एक साल में दो बार किसान दिल्ली आए और जो आंदोलन हुआ, उससे एक चीज साबित हो गई है कि जब भी किसान अपनी जाति और धर्म को भूलकर अपने आर्थिक हितों के लिए लड़ेंगे तो कोई भी सरकार उनके आगे झुकेगी.

आने वाले दिनों में किसानों के सवाल पर आपकी राजनैतिक लड़ाई कैसी होगी?

यही सारे मुद्दे हैं. देखिए, अभी सरकार कह रही है कि गन्ने का क्षेत्रफल क़रीब 20 फीसदी बढ़ गया है और इस बार गन्ने की बंपर फसल होनी है. फिर भी बाहर से ज़ीरो पर्सेंट ड्यूटी पर शुगर इंपोर्ट अलाउड है. क्या होगा नतीजा? तो हमें फिर से आंदोलन करना पड़ेगा. हम लोगों ने मीटिंग बुलाना शुरू किया है. अभी मैं लखनऊ गया था. मैंने गन्ना समिति के सभी चेयरमैनों को बुलाया था. अब पश्चिम और पूरब में भी किसानों को बुलाएंगे. पार्टी के लोगों को भी बुलाएंगे. तय करेंगे कि किस तरह आंदोलन चलाया जाना है, क्या करना है, चक्का जाम करना है, दिल्ली को घेरना है.

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