निराश होने की ज़रूरत नहीं है

हम इतने पराजयवादी क्यों हो गए हैं? माना कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने कॉमनवेल्थ के नाम पर पैसों की लूट के इस हैरतअंगेज और उपहास योग्य घोटाले की परतें खोलकर रख दीं, लेकिन इससे क्या होता है. दुनिया भर के मीडिया ने भारत की छवि की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वी एस नायपॉल के उस सपने को हक़ीक़त में तब्दील कर दिया, जिसे उन्होंने पहली बार एन एरिया ऑफ डार्कनेस में काग़ज़ पर उतारा था, लेकिन इसमें इतना निराश होने की क्या ज़रूरत है? सच्चाई तो यह है कि हमें ख़ुश और आशावादी होना चाहिए एवं उन उपलब्धियों पर ध्यान देना चाहिए, जो राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हमारे हिस्से में आ सकती हैं. भारत इन खेलों में 200 पदक जीतेगा. ऑस्ट्रेलिया जैसे डरपोक देशों के धमनीविहीन एथलीट डेंगू के एक मच्छर से डरकर जिस गति से राष्ट्रमंडल खेलों से अपना नाम वापस ले रहे हैं और यह जिस तरह एक घरेलू प्रतियोगिता में तब्दील होता जा रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत एक के बाद एक स्वर्ण पदक अपने नाम करता जाएगा और हम ख़ुशी से चिल्लाते-चिल्लाते पागल हो जाएंगे. इसका एक पहलू यह भी है कि हमारे मंत्रियों को विजेताओं को 20-20 लाख रुपये देने को मजबूर होना पड़ेगा, लेकिन अच्छी बात यह है कि यह पैसा खिलाड़ियों के हाथों में जाएगा, न कि खेल प्रशासक का चोंगा पहने नेताओं की उस टोली के हाथों में, जो पैसों को निगलने के मामले में व्हेल से कम नहीं हैं.

यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि खेलों के आयोजन के लिए ज़िम्मेदार लोगों से यह ज़िम्मेदारी अब छीन ली गई है. शानदार तैयारियों के भारत के दावे की पोल खोलने के लिए किसी विदेशी खेल अधिकारी की प्रेस कांफ्रेंस और इसमें कुछ चुनिंदा शब्दों के इस्तेमाल की ज़रूरत ज़रूर पड़ी, लेकिन इसने सत्ता के मठाधीशों को नींद से जगाने का काम भी कर दिया. स्टेडियमों की दीवारों पर पड़ी धूल झाड़ने और खिलाड़ियों के रहने की जगहों पर बने बाथरूमों की सफाई के लिए सीधे प्रधानमंत्री स्तर से हस्तक्षेप हुआ, लेकिन अच्छी बात यह हुई कि इसका असर भी हुआ. अभी यह तो नहीं कहा जा सकता कि खिलाड़ियों के मैदान पर उतरने के बाद क्या हुआ और स्वीमिंग पूल से पानी का रिसाव बंद हुआ या नहीं, लेकिन मैं आपको पहले ही यह बता दे रहा हूं कि राष्ट्रमंडल खेलों का आनंद लेने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि आयोजन स्थलों से दूर ही रहें.

बड़े अफसोस की बात है कि हम भारतीय अपनी वास्तविक शक्ति को भूल गए हैं. क्या हमें यह याद है कि यूरोपीय उपनिवेशवाद को परास्त करने वाले हम पहले राष्ट्र हैं? ब्रिटिश साम्राज्य भारत की स्वतंत्रता के झटके से कभी उबर नहीं पाया, 15 अगस्त 1947 के बाद यह लगातार पतन के रास्ते पर ही आगे बढ़ता गया. दुनिया के सबसे मज़बूत साम्राज्य को नेस्तनाबूद करने वाले देश के लिए भी राष्ट्रमंडल को बर्बाद करना इतना आसान नहीं है. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की ज़िम्मेदारी संभालने वाले सुरेश कलमाडी और मंत्रियों के समूह को अक्षम या लोभी या दोनों ही मानने वाले लोग उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि ये लोग उस अधूरे काम को पूरा कर रहे हैं, जिसे गांधी और नेहरू नहीं कर पाए थे. हमारे पूर्वजों ने साम्राज्य के ताबूत में आख़िरी कील ठोंक दी और उनके उत्तराधिकारी अब यही काम साम्राज्यवाद की संतान अर्थात कॉमनवेल्थ के साथ कर रहे हैं. हमारी पीढ़ी ने भी यह काम अहिंसा के रास्ते पर ही चलकर किया है. हमने इसके लिए कुछ खास नहीं किया, कॉमनवेल्थ को बस सफाई और स्वास्थ्य के भारतीय नज़रिए से रूबरू करा दिया. केवल इतना करने से ही कॉमनवेल्थ अर्थहीन मलबे में तब्दील होकर रह गया. बाक़ी दुनिया इस पर अचंभित है, क्योंकि उसने भारत की विध्वंसक क्षमता को अक्सर कम करके आंका है. दुनिया यह नहीं जानती कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में तो हमारा कोई सानी ही नहीं है, दूसरों को नेस्तनाबूद करने के मामले में भी हमारा कोई जवाब नहीं.

3 से 14 अक्टूबर के बीच, जबकि राष्ट्रमंडल खेल हो रहे होंगे, दिल्ली में रहने का एक अनोखा अनुभव होगा. इस दौरान एक भी विदेशी सैलानी यहां नहीं आएंगे और दिल्ली का हर ऐसा वाशिंदा, जिसके पास साधन होंगे, वह मणिशंकर अय्यर की सलाह मानते हुए राजधानी से बाहर चला जाएगा. सारे स्कूल बंद होंगे, अधिकांश कार्यालयों में भी छुट्टी का ही माहौल होगा. दिल्ली सरकार ने रेडियो पर उद्‌घोषणाओं के ज़रिए पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि इस दौरान होटल-रेस्तराओं में जाकर खाना खाने की कोशिश करने वाले लोग राष्ट्रविरोधी होंगे. इसका मतलब यह है कि सड़कों पर ट्रैफिक नहीं होगा. सड़कों में बने गड्‌ढे भरे जा चुके होंगे. अब यह बात और है कि 14 अक्टूबर की समय सीमा ख़त्म होते ही ये अपने पुराने रूप में हमारे सामने होंगे. बादल भी बरस कर थक चुके होंगे और ठंड के सुहाने एहसास के साथ मौसम रूमानी हो चुका होगा. पंद्रह दिनों के नैसर्गिक आनंद की अनुभूति के लिए आप क्या इससे आदर्श जगह की कल्पना भी कर सकते हैं? हालांकि कोई भी चीज अपने आप में संपूर्ण नहीं होती और दिल्ली के मामले में भी आपको केवल यह ध्यान रखना होगा कि खेलों के लिए बने स्टेडियमों के आसपास भी न फटकें. इन स्टेडियमों का निर्माण क़रीब तीन दशक पहले एशियाड के लिए राजीव गांधी की देखरेख में काफी कम लागत से हुआ था. उस समय भ्रष्टाचार की कोई चर्चा भी नहीं हुई थी और इसलिए ये अभी भी बेहतरीन हालत में हैं. समस्या तो काम के नए अंदाज़ और इन्हें सजाने-धजाने के लिए किए गए आसमानी ख़र्च से है. यदि आप आम भारतीय हैं तो मेरी सलाह मानिए और किसी नए बने कनेक्टर ब्रिज के इस्तेमाल से बचिए. यदि कोई पुल टूटता है तो सरकार तभी शोक की मुद्रा में होगी, जबकि कोई विदेशी एथलीट या अधिकारी घायल होगा.

यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि खेलों के आयोजन के लिए ज़िम्मेदार लोगों से यह ज़िम्मेदारी अब छीन ली गई है. शानदार तैयारियों के भारत के दावे की पोल खोलने के लिए किसी विदेशी खेल अधिकारी की प्रेस कांफ्रेंस और इसमें कुछ चुनिंदा शब्दों के इस्तेमाल की ज़रूरत ज़रूर पड़ी, लेकिन इसने सत्ता के मठाधीशों को नींद से जगाने का काम भी कर दिया. स्टेडियमों की दीवारों पर पड़ी धूल झाड़ने और खिलाड़ियों के रहने की जगहों पर बने बाथरूमों की सफाई के लिए सीधे प्रधानमंत्री स्तर से हस्तक्षेप हुआ, लेकिन अच्छी बात यह हुई कि इसका असर भी हुआ. अभी यह तो नहीं कहा जा सकता कि खिलाड़ियों के मैदान पर उतरने के बाद क्या हुआ और स्वीमिंग पूल से पानी का रिसाव बंद हुआ या नहीं, लेकिन मैं आपको पहले ही यह बता दे रहा हूं कि राष्ट्रमंडल खेलों का आनंद लेने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि आयोजन स्थलों से दूर ही रहें. कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने बताया कि हमें इसका एहसास भले देर से हो रहा हो, लेकिन सच्चाई यही है कि सीआईए काफी पहले ही भारत को अपनी आगोश में ले चुका है. देश के मौजूदा शासनतंत्र की धमनियों में बहने वाला ख़ून यह सीआईए ही उपलब्ध कराता है. सीआईए का मतलब है, करप्ट, इन्कॉम्पिटेंट और एरोगेंट अर्थात भ्रष्ट, अयोग्य और अहंकारी. आज चीन भारत से आगे है तो इसकी एकमात्र वजह यही है कि उसका शासक वर्ग भ्रष्ट और जिद्दी तो है, लेकिन योग्य भी है.

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