सेना दुश्मन नहीं है

खुद को बचाने की कोशिश में अक्सर लोग अनजाने में अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मार लेते हैं. उमर अब्दुल्ला अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. आज कश्मीर जिस आग में जल रहा है, उसके लिए वह ख़ुद को दोषी नहीं क़रार दे सकते. ऐसा करना उनके राजनीतिक करियर, जिसकी शुरुआत वंशवाद की नींव पर हुई और जिसके दम पर वह सिलेब्रिटी के दर्जे में शामिल हो गए, को पूरी तरह ख़त्म नहीं तो बुरी तरह प्रभावित ज़रूर कर सकता है. मुश्किल की घड़ियों में क्षेत्रीय पार्टियां अक्सर केंद्र सरकार पर दोष थोपने की तरकीब का सहारा लेती हैं, लेकिन उमर ऐसा भी नहीं कर सकते, क्योंकि दिल्ली की मदद से ही वह सत्ता पर क़ाबिज़ हैं. उनकी सत्ता का मुख्य स्रोत राजधानी के सियासी गलियारों, कांग्रेस पार्टी और सबसे ज़्यादा राहुल गांधी का आशीर्वाद ही है. उन्होंने राज्य की विपक्षी पार्टियों, खासकर अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी महबूबा मुफ्ती को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश भी नाकाम रही. इससे उमर की मुश्किलों का अंत होता नहीं दिखता, क्योंकि महबूबा के नियंत्रण में न तो राज्य की सत्ता है और न ही विरोध की आग में जलती घाटी की तंग गलियां. पाकिस्तान को दोषी ठहराने का फॉर्मूला इतना पुराना और घिसा-पिटा हो चुका है कि इस पर अब कोई ध्यान भी नहीं देता. बचाव का कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध न होने के चलते ही उमर भारतीय सेना को दोषी ठहराने के लिए मजबूर हैं. पिछले 90 दिनों में लगभग 90 मौतों के बाद आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) में बदलाव उनके राजनीतिक भविष्य का केंद्र बिंदु बनकर रह गया है. उन्होंने इस्ती़फे की पेशकश इसलिए नहीं की क्योंकि राज्य में क़ानून व्यवस्था का कोई निशान नहीं रह गया और इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए उनके पास कोई कार्ययोजना नहीं थी. उमर ने केंद्र सरकार द्वारा सेना की शक्तियों में कमी न करने की सूरत में अपना पद छोड़ने की धमकी दी थी.

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार के दौरान ख़ुद ओबामा और उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन यह कह चुके हैं कि कश्मीर और फिलीस्तीन की समस्याओं का समाधान ढूंढना ज़रूरी है. अ़फग़ानिस्तान में अमेरिका को अपनी मदद के बदले पाकिस्तान यह चाहता है कि ओबामा अपने आगामी दौरे में कश्मीर की चर्चा ज़रूर करें. और वह यह जानता है कि विरोध से दबाव बनाया जा सकता है. हमारे ख़ु़फिया अधिकारियों को इस बात का अंदाज़ा हो जाना चाहिए था, क्योंकि जमायते इस्लामी और पाकिस्तान की इस रणनीति के बारे में कश्मीर का हर पत्रकार जान चुका था.

लेकिन केंद्र सरकार सेना के ख़िला़फ क़दम उठाए तो किस लिए? अशांति के मौजूदा दौर में एक भी मौत सेना की गोलियों से नहीं हुई. आम लोगों पर चलने वाली ये गोलियां जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ की बंदूकों से निकली थीं. लेकिन आश्चर्य की बात है कि हर कोई इस सत्य की अनदेखी कर रहा है और बेवजह सेना को निशाना बनाया जा रहा है. सेना पर आरोप थोपने की इस आदत के घातक परिणाम हो सकते हैं. किसी ने यह सोचा है कि अलगाववादी ताक़तें और आतंकी संगठन इन मौतों के लिए राज्य पुलिस को भंग करने और सीआरपीएफ को वापस भेजने की मांग राज्य सरकार से क्यों नहीं कर रहे? मुख्यधारा की राजनीतिक ताक़तें हों या पृथकतावादी शक्तियां, हर कोई सेना को ही निशाना बनाने की कोशिश क्यों कर रहा है? मौतों के लगातार चलते इस सिलसिले के बीच भारतीय सेना का प्रवेश 15 सितंबर की शाम को ही हुआ था. वह भी तब, जबकि आगे की रणनीति बनाने के लिए पांचवी बटालियन के साथ विचार-विमर्श का व़क्त आया. इस रणनीति का मक़सद यह था कि सेना अपने मुख्य कार्य पर ध्यान केंद्रित करे और घाटी में उसकी मौजूदगी को कम किया जा सके. सेना को विरोध प्रदर्शनों पर नियंत्रण के काम में नहीं लगाया गया है, वह केवल आतंकी ताक़तों से मुक़ाबला करने के काम में ही लगी है.

सवाल यह है कि देश को तोड़ने की मंशा रखने वाली ताक़तों का एकमात्र निशाना भारतीय सेना ही क्यों है? इसका सीधा जवाब यही है कि पुलिस बल चाहे राज्यों का हो या केंद्र का, देश की सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकता. केवल सेना ही ऐसा कर सकती है. यही वजह है कि अलगाववादी ताक़तें एवं इस्लामाबाद में बैठे उनके आका सरकार और सेना के बीच मतभेद पैदा करना चाहते हैं. उनकी नीयत ही यही है, क्योंकि तभी उनकी इच्छा पूरी होने की कोई संभावना बन सकती है. लेकिन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री यह बेसुरा राग क्यों अलाप रहे हैं, विध्वंसकारी ताक़तों के साथ अपनी आवाज़ क्यों बुलंद कर रहे हैं? निराश और हताश उमर अब्दुल्ला आख़िर किसे ख़ुश करने की कोशिश में लगे हैं?

कश्मीर में समस्या की शुरुआत 90 दिन पहले या सौ दिन पहले नहीं हुई. इसकी शुरुआत तो उन लोगों के दिमाग़ में हुई, जिनका अपना एक अलग एजेंडा है और जिनकी बनाई रणनीतियों को जमायते इस्लामी और उसके नेता सैयद अली शाह गिलानी कश्मीर की गलियों में अमलीजामा पहना रहे हैं. कश्मीर में जमायते इस्लामी अपने उद्देश्यों को लेकर हमेशा स्पष्ट रही है, उसका एकमात्र मक़सद कश्मीर का पाकिस्तान के साथ विलय है और उसने इसे कभी छुपाया नहीं है. विचारधारा और वित्तीय मदद के स्तर पर जमात पाकिस्तान से जुड़ी हुई है. इसी वजह से इसने ख़ुद को बाक़ी देश में जमायते इस्लामी से अलग कर लिया है. आम लोगों द्वारा सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने की रणनीति बनाई गई, ताकि एक ऐसी तस्वीर पेश की जा सके, जिसमें मुक़ाबला दो असमान प्रतिद्वंद्वियों के बीच है और सारी दुनिया की सहानुभूति हासिल हो सके.

इसके लिए समय का चुनाव भी काफी सोच-समझ कर किया गया. इस साल नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत के दौरे पर आने वाले हैं. राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार के दौरान ख़ुद ओबामा और उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन यह कह चुके हैं कि कश्मीर और फिलीस्तीन की समस्याओं का समाधान ढूंढना ज़रूरी है. अ़फग़ानिस्तान में अमेरिका को अपनी मदद के बदले पाकिस्तान यह चाहता है कि ओबामा अपने आगामी दौरे में कश्मीर की चर्चा ज़रूर करें. और वह यह जानता है कि विरोध से दबाव बनाया जा सकता है. हमारे ख़ु़फिया अधिकारियों को इस बात का अंदाज़ा हो जाना चाहिए था, क्योंकि जमायते इस्लामी और पाकिस्तान की इस रणनीति के बारे में कश्मीर का हर पत्रकार जान चुका था. प्रशासन का सूत्रवाक्य यही है कि समस्या का पूर्वानुमान लगाकर उसे रोकना आसान है. लेकिन यहां तो ख़ु़फिया तंत्र की चूक के साथ-साथ प्रशासकीय तंत्र भी पूरी तरह विफल रहा. विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत होने के बाद भी वह मूकदर्शक बना बैठा रहा. दिल्ली की सरकार तो इतनी निष्क्रिय बनी रही कि मानों वह पूरी तरह बेख़बर हो. सभी पक्षों के साथ मिल-बैठकर समस्या पर विचार करने के लिए एक सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित करने में उसे 90 दिन लग गए. इस सम्मेलन ने निरर्थकता की जड़ता को तोड़ा, लेकिन केंद्र सरकार इससे पहले चुप क्यों बैठी रही? उसने ज्वालामुखी फटने और इसका असर घाटी से बाहर तक फैल जाने का इंतज़ार क्यों किया? दो-तीन सप्ताह पहले मनमोहन सिंह ने कहा था कि सरकार किसी से भी बातचीत को तैयार है, बशर्ते वह हिंसा का रास्ता छोड़ दे. आज हर कश्मीरी को उनसे यह पूछने का अधिकार है कि बातचीत की यह पेशकश उन्होंने तब क्यों नहीं की, जब राज्य में शांति थी. मौजूदा सरकार को विरासत में ऐसी कश्मीर मिली थी, जहां हालात सुधर रहे थे, लेकिन वह इसका फायदा उठाने में नाकाम रही और उसने एक सुनहरा मौक़ा गंवा दिया.

राहुल गांधी जब चाहें, तब देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, लेकिन उन्हें यह कहते ज़रा भी हिचक नहीं होती कि वह आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट की बारीकियों से वाक़ि़फ नहीं हैं. लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह जानते हैं कि कश्मीर में भारतीय सेना को कमज़ोर करने का मतलब देश को कमज़ोर करना है.

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