चित्तौड़गढ़ के नाम से प्रसिद्ध नक्सल प्रभावित औरंगाबाद ज़िले के छह विधानसभा क्षेत्रों में इस बार विधानसभा चुनाव की जंग कम रोचक नहीं है. प्रत्याशियों के साथ-साथ उनके आकाओं की साख भी दांव पर लगी है. औरंगाबाद के मतदाता भी यह स्वीकार करते हैं. नीतीश कुमार जहां विकास और सुशासन की बात कर अपने गठबंधन के प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर निखिल कुमार देश की रफ़्तार से बिहार को जोड़ने की बात कर कांग्रेस प्रत्याशियों का हौसला बुलंद कर रहे हैं. हालांकि वह राज्यपाल जैसे पद की संवैधानिक बाध्यता के कारण चुनाव प्रचार में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले रहे हैं. कांग्रेस ने सभी छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. औरंगाबाद विधानसभा सीट पर फिलहाल भाजपा के रामाधार सिंह का क़ब्ज़ा है. राजद ने यहां के सांसद सुशील कुमार सिंह के बड़े भाई एवं जदयू के बाग़ी सुनील कुमार सिंह को प्रत्याशी बनाया है. कांग्रेस ने राकेश कुमार सिंह उ़र्फ पप्पू को चुनाव मैदान में उतारा है. मज़ेदार बात यह है कि राजद प्रत्याशी सुनील कुमार सिंह ने जदयू से रफीगंज के लिए टिकट की मांग की थी. जदयू ने उन्हें टिकट नहीं दिया और वह औरंगाबाद से राजद के उम्मीदवार बनकर चुनाव मैदान में उतर गए. कांग्रेस प्रत्याशी राकेश कुमार उ़र्फ पप्पू को निखिल कुमार का क़रीबी माना जाता है. ऐसे में भाजपा के वर्तमान विधायक रामाधार सिंह अपने राजनीतिक समीकरण के बावजूद परेशानी में फंसे दिख रहे हैं.
औरंगाबाद के सभी छह विधानसभा क्षेत्रों में सफलता के लिए नीतीश कुमार खुद के साथ-साथ अपने गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं को चुनाव प्रचार में उतार चुके हैं. वहीं कांग्रेस भी सोनिया-राहुल के साथ-साथ देश एवं प्रदेशस्तरीय नेताओं को मैदान में उतार कर अपना खोया जनाधार वापस पाने के प्रयास में है.
नवीनगर विधानसभा क्षेत्र में लोजपा के विजय कुमार सिंह उ़र्फ डब्लू अपनी सीट बरकरार रखने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. उन्हें चुनौती देने के लिए जदयू के वीरेंद्र कुमार सिंह एवं कांग्रेस के मृत्युंजय कुमार सिंह मज़बूती के साथ मैदान में हैं. रफीगंज विधानसभा क्षेत्र पर पिछले दो चुनावों से निहालुद्दीन का क़ब्ज़ा है, लेकिन इस बार कांग्रेस ने डॉ. विजय कुमार सिंह की पुत्रवधू माधवी सिंह को और जदयू ने अशोक कुमार को उतार कर निहालुद्दीन को घेरने की कोशिश की है. गोह विधानसभा क्षेत्र में जदयू के विधायक रणविजय सिंह इस बार मुश्किल में हैं. हालांकि उनके प्रति लोगों में सहानुभूति है, लेकिन राजद से उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी राम अयोध्या यादव की उम्मीदवारी और राजपूत मतदाताओं की खिला़फत ने रणविजय सिंह की डगर कांटों से भर दी है. उधर कांग्रेस के काकब कादरी के आने से चुनाव दिलचस्प हो गया है. ओबरा विधानसभा क्षेत्र में इस बार कांग्रेस ने निखिल कुमार के क़रीबी और भूमिहार जाति से आने वाले अरविंद शर्मा को प्रत्याशी बनाकर राजद के विधायक सत्य नारायण सिंह की राह में रोड़े अटका दिए हैं. जदयू ने पिछले चुनाव में चौथे स्थान पर रहे प्रमोद चंद्रवंशी को दोबारा अपना प्रत्याशी बनाया है, लेकिन यहां पर भूमिहार-राजपूत मतदाताओं की जुगलबंदी और मुस्लिमों के कांग्रेस के प्रति रुझान ने जदयू एवं राजद प्रत्याशी को मुश्किल में डाल दिया है.
नए सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र कुटुंबा, जो पूर्व में देव विधानसभा क्षेत्र के नाम से जाना जाता था, से राजद ने अपने पूर्व मंत्री एवं देव के विधायक रह चुके सुरेश पासवान को प्रत्याशी बनाया है. उन्हें चुनौती देने के लिए जदयू के ललन भुइयां और कांग्रेस के राजेश राम सामने हैं. औरंगाबाद के सभी छह विधानसभा क्षेत्रों में सफलता के लिए नीतीश कुमार खुद के साथ-साथ अपने गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं को चुनाव प्रचार में उतार चुके हैं. वहीं कांग्रेस भी सोनिया-राहुल के साथ-साथ देश एवं प्रदेशस्तरीय नेताओं को मैदान में उतार कर अपना खोया जनाधार वापस पाने के प्रयास में है. जबकि राजद-लोजपा अपने गठबंधन की तीनों सीटों को बचाने के प्रयास के साथ अन्य सीटों पर भी क़ब्ज़े के लिए लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के अलावा अन्य कई बड़े नेताओं को लगा चुका है. कुल मिलाकर इस बार प्रत्याशियों के साथ-साथ उनके आकाओं ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है. देखना यह है कि 20 नवंबर को इन सभी विधानसभा क्षेत्रों के मतदाता किस ओर करवट लेते हैं.
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