अप्रासंगिक लेखक संगठन

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वर्ष 1935 में लंदन के नानकिंग रेस्तरां में बैठकर सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद, ज्योति घोष, प्रमोद सेन गुप्ता एवं मोहम्मद दीन तासीर जैसे लेखकों ने एक संगठन की बुनियाद रखने की बात पर विचार विमर्श किया था और यही विमर्श बाद में इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का आधार बना और इसी नाम से संगठन की नींव पड़ी. अपनी किताब यादें में सज्जाद ज़हीर ने लिखा है, हमको लंदन और पेरिस में जर्मनी से भागे, निकाले हुए मुसीबत के मारे लोग रोज मिलते थे. फासिज्म के अत्याचार की दर्दभरी कहानियां हर तऱफ सुनाई पड़ती थीं. जर्मनी में स्वाधीनता प्रेमियों और कम्युनिस्टों को पूंजीवादियों के गुंडे तरह-तरह की शारीरिक यातनाएं पहुंचा रहे थे. वे भयानक तस्वीरें, जिनमें जनता के प्रिय नेताओं की पीठ और कूल्हे कोड़ों के निशान से काले पड़े हुए दिखाई देते. वे दहशतनाक घटनाएं, जो समय-समय पर अख़बारों में छपतीं, उन सबने हमारे दिलोदिमाग़ की आतंरिक शांति और संतोष को मिटा दिया था, फलस्वरूप हम धीरे-धीरे समाजवाद की ओर झुकते जा रहे थे. मार्क्स और दूसरे साम्यवादी लेखकों की पुस्तकें हमने बड़े ध्यान से पढ़ना शुरू किया. जैसे-जैसे हम अपने अध्ययन को बढ़ाते, हमारे दिमाग़ रोशन होते और हमारे मन को शांति मिलती. बाद में इन्हीं सज्जाद जहीर ने 1936 में लंदन से भारत लौटकर यहां प्रगतिशील लेखक संगठन की बुनियाद रखी. संगठन बनाने में उन्हें भारत में मुंशी प्रेमचंद, डॉ. अशरफ एवं हीरेन मुखर्जी आदि का सहयोग मिला. प्रेमचंद ने 1936 में हंस के अंक में इस संगठन का घोषणापत्र भी प्रकाशित किया. शुरुआत में इस संगठन से उर्दू के लेखक सक्रियता से जुड़े, लेकिन कालांतर में हिंदी के दिग्गजों ने इस आंदोलन से जुड़कर इसे मज़बूत किया. पहले तो इस संगठन का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर रहा, लेकिन बाद के दिनों में यह वामपंथी पार्टियों का पिछलग्गू बनकर रह गया.

आज जो लोग लेखक संगठन चला रहे हैं, वे उसे एक सिंडिकेट की तरह ऑपरेट करते हैं और अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए बेहद सोची-समझी रणनीति बनाकर उसे अंजाम देते हैं. इस तरह से लेखक संगठन अब बड़े साहित्यिक सरोकारों से विमुख होकर पर्सनल स्कोर सेट करने का औज़ार बन गया है.

पिछले कुछ वर्षों से लेखकों की सामाजिक भूमिका लगभग ख़त्म हो गई है. कहीं से भी यह लगता ही नहीं है कि समाज और उसकी समस्याओं से उनका कोई जुड़ाव भी है. किसी भी बड़े सामाजिक प्रश्न पर उनकी एकजुटता नज़र नहीं आती है. चाहे वह तस्लीमा नसरीन को भारत में स्थायी वीजा न देने का मामला हो, उन्हें पश्चिम बंगाल से बाहर निकालने का वामपंथी सरकार का फैसला हो, नक्सलियों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या का मामला हो, उक्त लेखक संगठन चुप्पी साधे रहते हैं. लेखक संगठन दरअसल कुछ ग़ैर लेखकों के जेबी संगठन बनकर रह गए हैं और वे छोटे-छोटे गुटों में बनाई अपनी ही दुनिया में संतुष्ट नज़र आते हैं, जबकि साहित्य और संस्कृति के सामने संकट गहराता जा रहा है. जब 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी तो दो दशकों तक इसने सभी भारतीय भाषाओं में समान रूप से लेखकों को जोड़कर गंभीरता से काम किया, लेकिन समय बीतने के साथ यह संगठन कमज़ोर होता गया और आज तो हालत यह है कि कुछ शहरों को छोड़ दें तो यह लगभग मृतप्राय: है. सज्जाद ज़हीर के उपरोक्त कथन से यह साफ है कि लेखकों की सामाजिक सक्रियता को लेकर लेखक संगठनों की स्थापना की गई थी, लेकिन अब वह सामाजिक निष्क्रियता में तब्दील हो गई है. कहने के लिए तो आज हिंदी में तीन लेखक संगठन हैं और तीनों अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध हैं. प्रगतिशील लेखक संघ सीपीआई से, जनवादी लेखक संघ सीपीएम से और जन संस्कृति मंच सीपीआई-एमएल से. लेकिन संबद्धता के चोले में उक्त लेखक संगठन इन पार्टियों के पिछलग्गू हैं और हर अहम मसले पर अपने आकाओं का मुंह ताक़ते हैं. हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि यह तक पता नहीं चलता है कि इनके अध्यक्ष और सचिव कौन हैं.

आज तो हालत यह हो गई है कि बड़े सामाजिक और साहित्यिक मुद्दों पर चुप्पी साधने वाले इन लेखक संगठनों के होने का पता तब चलता है, जब किसी लेखक की मृत्यु होती है. इसके बाद लेखक संगठन एक शोकसभा का आयोजन करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं. मुद्दों को लेकर लेखकों ने आपस में मिलना बंद कर दिया है. दूसरी सबसे शर्मनाक बात यह है कि इन लेखक संगठनों को किसी भी लेखक के मरने के बाद ही उसकी महत्ता समझ में आती है. उक्त संगठन किसी भी लेखक के जीवित रहते उसकी रचनाओं के संदर्भ में कुछ भी कहने-करने से कतराते रहते हैं, लेकिन उसके मरते ही ये उसे महान और उसकी रचनाओं को बेहद अहम बताने लग जाते हैं. इससे लगता है कि उक्त लेखक संगठन लेखकों की मरने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं. कई साल पहले हिंदी के एक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक संगठन लेखकों की यूनियन नहीं हैं, जो कॉपीराइट आदि के मुद्दे पर संघर्ष करें. उनका मानना था कि ये वैचारिक संगठन हैं, जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है. अगर मंगलेश की बातों को मान भी लिया जाए तो सवाल यह उठता है कि वैचारिक संवेदना के प्रचार के लिए भी लेखक संगठन क्या कर रहे हैं? जवाब शायद ही मिल पाए. लेकिन इन लेखक संगठनों से जुड़े लेखक की रचनाओं पर अगर किसी आलोचक या समीक्षक ने प्रतिकूल टिप्पणी कर दी तो पूरा का पूरा संगठन उस पर टूट पड़ता है. कुछ दिनों पहले पटना से निकलने वाली एक पत्रिका में जसम से जुड़े एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एक कवि की कविताओं पर संपादक ने टिप्पणी क्या कर दी, मानो भूचाल आ गया. जन संस्कृति मंच से जुड़े लेखकों ने संपादक के ख़िला़फ हल्ला बोल दिया.

आज जो लोग लेखक संगठन चला रहे हैं, वे उसे एक सिंडिकेट की तरह ऑपरेट करते हैं और अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए बेहद सोची-समझी रणनीति बनाकर उसे अंजाम देते हैं. इस तरह से लेखक संगठन अब बड़े साहित्यिक सरोकारों से विमुख होकर पर्सनल स्कोर सेट करने का औज़ार बन गया है. आज ज़रूरत इन लेखक संगठनों की भूमिका पर पुनर्विचार की है. इन संगठनों की निष्क्रियता के पीछे वामपंथी राजनीति की अवसरवादिता की राजनीति है. लेखकों के बीच भी पद और पुरस्कार पाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है. वैचारिकता पर अवसरवादिता हावी हो गई है. तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि किस संगठन से जुड़कर उन्हें लाभ हो सकता है. यह तय करते ही वे उन संगठनों से जुड़कर साहित्यिक मठाधीशों का आशीर्वाद प्राप्त करने की जुगत में लग जाते हैं. सच तो यह है कि इन दिनों कोई भी लेखक इन संगठनों से न तो कोई ऊर्जा प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही कोई वैचारिक दिशा. इन लेखक संगठनों की इतनी ख़राब हालत है कि वे अपने ही साथी लेखकों के हित के लिए भी कोई संघर्ष नहीं कर पा रहे हैं. कॉपीराइट और रॉयल्टी हिंदी में लेखकों के लिए एक बड़ा मुद्दा है और तमाम लेखकों को इस मुद्दे पर शिक़ायत रहती है. प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की बात अक्सर सामने आती रहती है, लेकिन अभी तक लेखक संगठनों ने इस शोषण के ख़िला़फ कोई ठोस आवाज़ नहीं उठाई है, आंदोलन की बात तो दूर की कौड़ी है. इसके अलावा भी कई साहित्यिक मुद्दे हैं, जिन पर लेखक संगठनों की खामोशी चिंतनीय है. दरअसल अब प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच को आपसी भेदभाव भुलाकर एक नया साहित्यिक-सांस्कृतिक साझा मंच बनाना चाहिए और बदलते समय में लेखकों की समस्याओं पर आवाज़ बुलंद करनी चाहिए. इससे साहित्य और समाज के साथ-साथ साहित्यकारों का भी भला होगा. अगर लेखक संगठन समय के साथ नहीं बदल सके तो समय ही उन्हें किनारे लगा देगा.

(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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