भटगांव उपचुनावः भाजपा जीती या रमन सिंह सरकार?

छत्तीसगढ़ के आदिवासी एवं नक्सल प्रभावित ज़िले सरगुजा के भटगांव विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव के परिणाम ने जहां मुख्यमंत्री रमन सिंह और रणनीति बनाने में माहिर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का क़द बढ़ा दिया है, वहीं अंतर्विरोधों, गंभीर मतभेदों और कलह से जूझती कांग्रेस की बदतर स्थिति भी उजागर कर दी है. भटगांव में भाजपा सरकार और सरगुजा राज परिवार के बीच हुई इस चुनावी जंग के परिणाम ने जहां महल के कथित जनाधार के परखच्चे उड़ा दिए, वहीं प्रदेश की जनता ने यह भी महसूस कर लिया कि सत्ता के संसाधनों का जायज़-नाजायज़ फायदा उठाने में खुद को दूसरी पार्टियों से अलग बताने वाली भाजपा भी उन्हीं की तरह है. भाजपा ने इस चुनाव में धन का भी ज़बरदस्त इस्तेमाल किया. भटगांव उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रजनी त्रिपाठी ने कांग्रेस के यू एस सिंह देव को 34,656 मतों के भारी अंतर से पराजित किया. नवगठित भटगांव विधानसभा सीट पर भाजपा का क़ब्ज़ा था. राज्य के दूसरे विधानसभा चुनाव में भाजपा के रवि शंकर त्रिपाठी पहली बार चुनाव लड़े थे और उन्होंने 35,943 मत हासिल कर अजीत जोगी समर्थक कांग्रेस उम्मीदवार श्यामलाल जायसवाल को 17,435 मतों से पराजित किया था. उस समय 29 प्रत्याशियों ने अपनी किस्मत आज़माई थी, जिसमें कांग्रेस-भाजपा से बाग़ी होकर बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ने वालों की संख्या 11 से अधिक थी. इसके अलावा भाकपा, गोंगपा, सपा, बसपा, सीपीआई, रागोपा, शिवसेना, जनतादल (यू) एवं छत्तीसगढ़ विकास पार्टी के प्रत्याशी भी मैदान में थे. तब कांग्रेस से अलग होकर 6 लोग बतौर निर्दलीय चुनाव लड़े थे और उन्हें 23,738 मत मिले थे. भाजपा के बागियों में शामिल पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं निष्कासित सांसद शिव प्रताप सिंह के पुत्र विजय प्रताप सिंह को अकेले 12,986 मत मिले थे. भाजपा विधायक रवि शंकर त्रिपाठी की जीत में इन बाग़ियों के अलावा वरिष्ठ कांग्रेसी टी एस सिंह देव की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई थी. सिंह देव की रवि शंकर त्रिपाठी से मित्रता जगज़ाहिर है और पार्टी प्रत्याशी जायसवाल को टिकट दिलाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से उनकी दूरी और विरोध भी. बदले में अंबिकापुर में स्वर्गीय त्रिपाठी एवं उनके समर्थकों ने चुनाव के दौरान सिंह देव का साथ दिया था. इसकी शिकायत अंबिकापुर से भाजपा के पराजित प्रत्याशी अनुराग सिंह देव ने पार्टी फोरम में भी की थी. राज्य विधानसभा के दूसरे कार्यकाल के लगभग डेढ़ वर्ष बाद एक सड़क हादसे में रवि शंकर त्रिपाठी का निधन होने के बाद भटगांव सीट रिक्त हो गई थी.

भटगांव विधानसभा क्षेत्र में नक्सल प्रभावित ओड़गी एवं भैय्याथान ब्लॉक के अलावा सूरजपुर ब्लॉक का आधा हिस्सा भी शामिल है और यहां लगभग एक लाख 80 हज़ार मतदाता हैं, जिनमें गोंड आदिवासियों की संख्या 40 हज़ार से भी ज़्यादा है. यही नहीं, कंवर, खैरवाड़, पंडो, रजवार एवं कुशवाहा जाति के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों से आकर बसे सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या भी अच्छी-खासी है. प्रचार के शुरुआती दौर में कांग्रेस की पकड़ मज़बूत थी, जिसे लेकर रमन सिंह एवं अग्रवाल बेचैन थे, लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने कांग्रेस के बिखराव और उसके नेताओं की कमज़ोरी को भांप लिया. भाजपा के शिव प्रताप गोंड मतदाताओं के बल पर चार बार इस क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं और स्वयं इसी वर्ग के हैं.

दुर्ग ज़िले के वैशाली नगर उपचुनाव में भाजपा को मिली अप्रत्याशित हार से मुख्यमंत्री रमन सिंह का़फी आहत थे और पार्टी में उनके विरोधी सक्रिय हो गए थे. यह सीट विधायक सरोज पांडे के सांसद चुने जाने से रिक्त हुई थी. मुख्यमंत्री किसी भी हालत में भटगांव सीट गंवाना नहीं चाहते थे. भटगांव से जैसी खबरें आ रही थीं, उनसे भाजपा सरकार और संगठन दोनों ही चिंतित थे. क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ता नेताओं से नाराज़ थे. यही नहीं, मनरेगा के तहत मज़दूरों का भुगतान भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया था, सड़कें जगह-जगह से उधड़ी पड़ी थीं, स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर हो गई थीं. इसी के चलते जनता शासन से ज़बरदस्त नाराज़ थी. पूर्व विधायक स्वर्गीय त्रिपाठी ने हालांकि क्षेत्र के विकास के लिए अनेक योजनाएं स्वीकृत कराई थीं, लेकिन उनके सुस्त व्यवहार से कार्यकर्ता परेशान और नाराज़ थे. क्षेत्र के अधिकांश भाजपा नेता-कार्यकर्ता अपनी उपेक्षा के चलते सत्ता और संगठन से चिढ़े बैठे थे. इनमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिव प्रताप सिंह, उनके पुत्र विजय प्रताप सिंह, वरिष्ठ नेता अनिल सिंह मेजर आदि प्रमुख रूप से शामिल थे. परिस्थितियों को भांपकर मुख्यमंत्री ने चुनाव संचालन का भार वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सौंपा और उप संचालन का भार ज़िले के प्रभारी मंत्री रामविचार नेताम को.

मुख्यमंत्री को अच्छी तरह पता था कि क्षेत्र के अधिकतर बाग़ी कार्यकर्ताओं एवं शिव प्रताप सिंह के अग्रवाल से बेहद अच्छे संबंध हैं. शिव प्रताप को रमन सरकार की कार्यप्रणाली एवं मंत्रियों के व्यवहार की निंदा करने पर न केवल अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था, बल्कि उन्हें पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया था. क्षेत्र में वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव का भी अच्छा जनाधार है और वह भी अग्रवाल के बेहद क़रीबी हैं. दूसरी रणनीति के रूप में मुख्यमंत्री ने बतौर प्रत्याशी स्वर्गीय रवि शंकर त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी का चयन किया. मतलब सा़फ था कि वह त्रिपाठी के असामयिक निधन से उपजी सहानुभूति को मतों में बदलना चाहते थे. रजनी त्रिपाठी विशुद्ध गृहिणी रही हैं, उनकी न तो कोई समाजसेवा की पृष्ठभूमि रही है और न ही राजनीतिक. तीसरा कदम सरकारी संसाधनों के भरपूर उपयोग के रूप में उठाया गया. रमन सिंह ने एक-दो मंत्रियों को छोड़कर अधिकांश मंत्रियों, सांसदों एवं विधायकों की ड्यूटी भरपूर संसाधनों और धन बल के साथ भटगांव में लगा दी. एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए शिव प्रताप सिंह एवं उनके पुत्र विजय प्रताप सिंह को एक चुनावी सभा के दौरान पुन: पार्टी में शामिल करा लिया गया. बदले में उनके ज़ोरदार राजनीतिक पुनर्वास की गारंटी भी दी गई.

उधर दूसरी तऱफ कांग्रेस हमेशा की तरह गुटों में बंटी मानसिक रूप से चुनाव को लेकर सुस्ती में रही. बताते हैं कि राज परिवार अपने परिवार से किसी व्यक्ति को ऐसी स्थिति में चुनाव नहीं लड़ाना नहीं चाहता था, पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू, नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की रणनीति के दबाव में यू एस सिंह देव को कांग्रेस प्रत्याशी घोषित कर दिया गया. जबकि वह चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे और वरिष्ठ कांग्रेसी एवं रिश्ते में उनके भतीजे टी एस सिंह देव भी ऐसा ही चाहते थे. यू एस सिंह देव मज़बूत प्रत्याशी थे. उनका सा़फ-सुथरा राजनीतिक इतिहास रहा है और भाजपा प्रत्याशी की तुलना में उनका जनाधार भी बढ़िया था. माना यह जा रहा था कि वह भाजपा को शिकस्त देंगे और यह कांग्रेस के आरामपसंद नेताओं का अति आत्मविश्वास भी बन गया था. भटगांव में कांग्रेस ने वैशाली नगर वाली रणनीति अपनाई थी और प्रदेश प्रभारी नारायण सामी ने सांसद चरणदास महंत, सभी विधायकों, प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू एवं नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे की ड्यूटी भी लगा दी थी, पर पार्टी नेता-कार्यकर्ता एकजुट नहीं रह सके, राज परिवार से भी उनका तालमेल नहीं बैठ पाया. चुनावी मुद्दों को लेकर भी कांग्रेस कोई रणनीति नहीं तय कर पाई. पार्टी के नेता-कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी के गुणों-विशेषताओं को लेकर मतदाताओं के बीच ज़ोरदार ढंग से नहीं पहुंच पाए. राज्य सरकार की असफलताओं को लेकर तीखे वार करने से भी उन्होंने परहेज किया. रही-सही कसर क्षेत्र में प्रचार करने पहुंचे जोगी के बयान ने पूरी कर दी कि यदि मैडम की आज्ञा हो तो वह रमन सरकार को गिरा सकते हैं.

भटगांव विधानसभा क्षेत्र में नक्सल प्रभावित ओड़गी एवं भैय्याथान ब्लॉक के अलावा सूरजपुर ब्लॉक का आधा हिस्सा भी शामिल है और यहां लगभग एक लाख 80 हज़ार मतदाता हैं, जिनमें गोंड आदिवासियों की संख्या 40 हज़ार से भी ज़्यादा है. यही नहीं, कंवर, खैरवाड़, पंडो, रजवार एवं कुशवाहा जाति के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों से आकर बसे सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या भी अच्छी-खासी है. प्रचार के शुरुआती दौर में कांग्रेस की पकड़ मज़बूत थी, जिसे लेकर रमन सिंह एवं अग्रवाल बेचैन थे, लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने कांग्रेस के बिखराव और उसके नेताओं की कमज़ोरी को भांप लिया. भाजपा के शिव प्रताप गोंड मतदाताओं के बल पर चार बार इस क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं और स्वयं इसी वर्ग के हैं. कांग्रेस ने इसकी कोई काट नहीं ढूंढी. उसने भ्रष्टाचार का मुद्दा भी बहुत कमज़ोर ढंग से उठाया. जबकि मुख्यमंत्री रमन सिंह एवं उनकी टीम ने त्रिपाठी के निधन से उपजी सहानुभूति को ब़खूबी भुनाया. भाजपा ने नेताओं को क्षेत्रवार ज़िम्मेदारियां सौंपी. रजनी त्रिपाठी ने भी भावुक अंदाज़ में भाषण देकर जनता के दिल में उतरने की कोशिश की. भाजपा ने बूथ प्रबंधन पर खासी मशक्कत की और वहां तैनात कांग्रेसी नेताओं-कार्यकर्ताओं को मैनेज कर लिया. भाजपा के रणनीतिकारों ने प्रभावशाली मंत्रियों-विधायकों को भरपूर संसाधनों के साथ वहां तैनात कर दिया, जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता क्षेत्र से दूर अंबिकापुर के होटलों में आराम फरमाते रहे. चुनाव के दौरान भटगांव में प्रदेश कांग्रेस और राज परिवार के बीच की दूरी भी नहीं मिट सकी. सरगुजा राज परिवार यह समझने में नाकाम रहा कि क्षेत्र में उसकी पकड़ कमज़ोर होती जा रही है. ज़िले का व्यापारी समाज भी पूरी तरह भाजपा के साथ डटा रहा और भाजपा के लिए उसने अपनी थैलियां खोल दीं. अंतिम चार दिनों में यह लगने लगा था कि राज परिवार के वर्चस्व वाली ज़िला कांग्रेस पिछड़ने लगी है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेंद्र साहू की जिद्द ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं को उदासीन कर दिया. नतीजतन, मामला बिगड़ गया.

रही-सही कसर मुख्यमंत्री की जनसभाओं ने कर दी. अंतिम दिनों में भाजपा राज्य शासन में तब्दील हो गई और सरकारी संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया गया. चुनाव पर्यवेक्षक की चेतावनियों के बावजूद भाजपाई मंत्रियों, सांसदों एवं विधायकों की अनेक गाड़ियां क्षेत्र में बे़खौ़फ घूमती रहीं. परिणामस्वरूप भाजपा की ग़ैर राजनीतिक-ग़ैर सामाजिक पृष्ठभूमि वाली प्रत्याशी रजनी त्रिपाठी ने कांग्रेस के यू एस सिंह देव को 34,656 मतों से हरा दिया. इतने भारी अंतर से भाजपा की जीत बृजमोहन अग्रवाल की कूटनीतिक जीत भी है. इस चुनाव में भाजपा को 74 हज़ार से अधिक मत मिले, जबकि कांग्रेस को 39,436 मत हासिल हुए. राज्य के पूर्व वित्तमंत्री रामचंद्र सिंह देव का आरोप है कि भाजपा ने इस चुनाव में 7 करोड़ रुपये से ज़्यादा धनराशि खर्च की और चुनाव पर्यवेक्षक ने शिकायतों पर स़िर्फ औपचारिक कार्यवाही की.