चंदेरी साड़ी उद्योगः कब दूर होगी बुनकरों की बदहाली

मध्य प्रदेश के चंदेरी की हथकरघा कला जो देखता है, वही कायल हो जाता है, लेकिन इससे जुड़ा दूसरा सच यह है कि चंदेरी साड़ी उद्योग जैसे-जैसे व्यवसायिक गति पकड़ता जा रहा है, परंपरागत साड़ियां लुप्त होती जा रही हैं. चंदेरी के बुनकर कम समय में कम लागत की अधिक बिकने वाली साड़ियां बनाने में अधिक रुचि ले रहे हैं. चंदेरी के बुनकरों की कला और उससे जुड़ी बारीकियां भी ओझल हो रही हैं. चंदेरी की कई ऐसी परंपरागत साड़ियां हैं, जिन्हें बुनने वाले उंगलियों पर गिनने लायक़ बचे हैं. द्वापर युग से लेकर आज तक चंदेरी अपना अस्तित्व बनाए हुए है. भगवान श्रीकृष्ण के समय में चंदेरी शिशुपाल की नगरी रही है और आज यह साड़ियों के कारोबार से जुड़ी है. जब भी विश्व में कहीं कलात्मक और फैंसी साड़ियों की चर्चा होती है तो वह चंदेरी के बगैर अधूरी रहती है, लेकिन आज चंदेरी से परंपरागत साड़ियां गायब सी हो गई हैं. प्राकृतिक रंगों और लकड़ी के बेल-बूटे वाले छापाखाने ख़त्म हो गए हैं. चंदेरी के बुनकर अपनी परंपरागत कला को दरकिनार करके पेट के लिए संघर्ष करने लगे हैं. नतीजतन, यहां की परंपरागत साड़ी कला लुप्त होने की कगार पर है.

हस्तशिल्प को ज़िंदा रखने के लिए सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन बुनकर अपने ख़ून-पसीने से विकसित अपनी कलाकारी से ख़ुद ही नाता तोड़ने के लिए मजबूर हैं. विकल्प के अभाव में वे अपने ताने-बाने से चिपके बैठे हैं.

बुनकर आशाराम बताते हैं कि तीन प्रकार की साड़ियां परंपरागत रूप से बनाई जाती रही हैं, नाल फरमा, बानेवार एवं मेंहदी भरे हाथ. इन साड़ियों के कारण ही चंदेरी साड़ी उद्योग विश्व के नक्शे पर आया था, लेकिन अब इन साड़ियों का चलन न के बराबर रह गया है. अब इस प्रकार की साड़ियां सिर्फ आर्डर पर ही बनाई जाती हैं. इन्हें बनाने वाले कारीगर भी अब काफी कम हैं. मध्य प्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम के प्रभारी अधिकारी आर के ओझा बताते हैं कि चंदेरी में 3659 लूम रजिस्टर्ड हैं, जिनमें मात्र 25-40 बुनकर ऐसे हैं, जो इन परंपरागत साड़ियों को बुनने का काम जानते हैं और उन्होंने चंदेरी साड़ी कला को सहेज रखा है. चंदेरी साड़ी पहनने से सुंदरता में भले ही निखार आए, लेकिन इन्हें बुनने वाले बुनकरों की ज़िंदगी काफी बदहाल है. तीस हज़ार की आबादी वाले चंदेरी नगर के लगभग चार हज़ार लोग साड़ी बुनने के कार्य में लगे हैं. बुनकर परिवारों की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि लगता ही नहीं, यही लोग अपने हाथों से हज़ारों रुपये में बिकने वाली चांदी की जरी एवं रेशम की मखमली साड़ी बुनते हैं. शोषण, समस्याओं और ग़रीबी की रस्सियां कुछ इस तरह बुनकरों की ज़िंदगी में उलझी हैं कि उन्हें सुलझा पाना इनके बूते के बाहर है.

बुनकर आशाराम बताते हैं कि तीन प्रकार की साड़ियां परंपरागत रूप से बनाई जाती रही हैं, नाल फरमा, बानेवार एवं मेंहदी भरे हाथ. इन साड़ियों के कारण ही चंदेरी साड़ी उद्योग विश्व के नक्शे पर आया था, लेकिन अब इन साड़ियों का चलन न के बराबर रह गया है.

हस्तशिल्प को ज़िंदा रखने के लिए सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन बुनकर अपने ख़ून-पसीने से विकसित अपनी कलाकारी से ख़ुद ही नाता तोड़ने के लिए मजबूर हैं. विकल्प के अभाव में वे अपने ताने-बाने से चिपके बैठे हैं. सूत व्यापारियों एवं साड़ी निर्माताओं के लिए 16-16 घंटे खटने के बाद भी बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी जुटा पाने वाले बुनकर बिचौलियों की हेराफेरी के शिकार हैं. शोषण और तंगहाली ने बुनकरों को इतना निर्मम बना दिया है कि वे अपने छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल भेजने या खेलने-कूदने देने के बजाय काम में लगा देते हैं, ताकि वे भी चार-छह रुपये कमा सकें. प्राचीन परंपरा-कला को जिंदा रखने के नाम पर राष्ट्रीय पुरस्कार देने और योजनाएं बनाकर वाहवाही लूटने से काम नहीं चलता. बुनकर मंजिल कहते हैं, हम सरकार से भीख नहीं मांगते, दु:ख है तो सरकार के रवैये का. एक साड़ी बुनने में चार से सात दिन का समय लगता है, वह भी तब, जब घर के सदस्य भी सहयोग करें. बदले में मज़दूरी मिलती है सौ-डेढ़ सौ रुपये. कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होने वाले सूत और रेशम के साथ डिज़ाइन भी साड़ी निर्माता उपलब्ध कराते हैं. एक बुनकर परिवार के मुखिया अलीमुद्दीन ने बताया कि परिवार में सात सदस्य हैं. इस काम में परिवार के दो सदस्य हनीफ एवं राशिद लगे हैं, जो बड़ी मेहनत के बाद रोजाना तीस से चालीस रुपये ही कमा पाते हैं. इतने में परिवार का गुजारा कठिन हो जाता है. व्यापारियों द्वारा होने वाला शोषण रोकने के लिए चंदेरी साड़ी की ख़रीद के लिए स्थापित निगम भी बंद कर दिया गया है. नई जानकारी उपलब्ध कराने के लिए स्थापित कार्यशाला स्थल पर हमेशा बड़ा सा ताला लटका रहता है. स्थानीय सांसद एवं केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रयास से चंदेरी में यूनिडो द्वारा शुरू किए जा रहे कलस्टर कार्यक्रम के अंतर्गत बिजनेस डेवलपमेंट सेवाओं के साथ संपर्क स्थापित करने, निट की मदद से रंगाई, डिज़ाइन एवं पैकेजिंग जैसे विषयों पर वर्कशॉप की योजनाएं हैं. चंदेरी के बुनकरों को पारंपारिक लूम्स के स्थान पर तारा लूम उपलब्ध कराने का भी निश्चय किया गया है, ताकि उनकी कार्यक्षमता बढ़ने के साथ ही बेहतर परिणाम मिल सकें. ज़िला प्रशासन के इस प्रयास को सुखद बताते हुए युवा बुनकर ज़लील कहते हैं कि हम नई तकनीक सीखने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमें परिवार के गुजर-बसर लायक़ मजदूरी मिले, तभी हम टिके रह सकते हैं. चंदेरी के बुनकरों को देश के बाहर प्रतिष्ठित करने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं. बुनकरों की संस्था सिल्क क्लब को भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा जर्मनी में होने वाले हेम टेक्सटाइल मेले में भेजा जा चुका है.

यूनिडो ने चंदेरी के उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार करने के लिए अपनी एक वेबसाइट भी तैयार की है. ग्रामीण उद्योग विभाग भी चंदेरी के उत्पादों की लोकप्रियता के मद्देनज़र दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यात की संभावना तलाश रहा है. क्षेत्रीय मांगों के अनुरूप चंदेरी के उत्पादों में बदलाव भी किया जा रहा है. यूनिडो ने इस दिशा में प्रयास करते हुए स्वयं सहायता समूहों के जरिए प्रतिवर्ष 15 नेटवर्क तैयार करने का निश्चय किया है. फेब इंडिया ने भी चंदेरी के बुनकरों को मदद करने के लिए हामी भरी है. चंदेरी टास्क फोर्स की बैठक में चंदेरी के उत्पादों की विशिष्ट पहचान कायम रखने के लिए ब्रांड पंजीयन के मुद्दे पर भी गंभीरता से विचार करने के बाद यूनिडो को यह दायित्व सौंपा गया है कि वह वियो ग्राफिकल इंडियन एक्ट के अंतर्गत चंदेरी उत्पादों के पंजीयन की संभावनाएं तलाश करे. सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रम की घोषणाएं होने से चंदेरी साड़ी बुनकरों के पलायन पर भले ही विराम लग गया है, लेकिन जब तक योजनाओं को अमलीजामा नहीं पहनाया जाता, तब तक बिचौलियों की चांदी है. साड़ी बनाने में उपयोग की जाने वाली सामग्री यानी सूत, रेशम, कतान एवं डाटी आदि के लिए बुनकर बड़े व्यापारियों के मोहताज हैं. सहकारी समिति बनाकर कुछ समूहों ने व्यापारियों बिचौलियों से मुक्त होने का प्रयास किया तो डुप्लीकेट चंदेरी साड़ी असली साड़ी के मुक़ाबले बाजार में उतार दी गई. डुप्लीकेट साड़ियों पर रोक लगाने और असमय काल के गाल में समा जाने को विवश चंदेरी साड़ी उद्योग को बचाने के लिए तुरंत प्रभावी क़दम उठाने की ज़रूरत है.

चीन से आने वाले रेशम की दिन दूनी बढ़ती क़ीमत, बिजली-पानी और सरकारी ॠण उपलब्ध न होने के कारण बुनकर समितियां अपने काम को अंजाम नहीं दे पा रही हैं. सरकारी नीति को लचीला बनाए बिना बुनकरों की ज़िंदगी के तार ताने और बाने की पेचीदगी की तरह उलझे ही रहेंगे. राष्ट्रमंडल खेलों में अंगवस्त्रम के रूप में अपने हुनर का प्रदर्शन करने का अवसर मिलने से चंदेरी के बुनकरों को एक नई पहचान मिली है. आज़ादी के बाद देश में बनी औद्योगिक नीति इतनी ढुलमुल और आत्मघाती रही कि पुश्तैनी उद्योग तो समाप्त हुए ही, साथ ही कुटीर उद्योगों को भी करारा झटका लगा. तकनीकी विकास के नाम पर बड़ी मशीनों ने जिस तरह कुटीर उद्योग को तबाह किया, उससे बड़ी संख्या में कारीगर अन्य पेशों में चले गए.

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