गयाः डगर आसान नहीं है

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दक्षिण बिहार के केंद्र बिंदु गया ज़िले के दस विधानसभा क्षेत्रों में मगध और बिहार की राजनीति में खुद को दिग्गज मानने वाले प्रत्याशियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. बिहार विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी इमामगंज से, पथ निर्माण मंत्री प्रेम कुमार एवं भाकपा के राज्य सचिव रहे पूर्व सांसद ज़लालुद्दीन अंसारी गया नगर से, प्रौद्योगिकी मंत्री अनिल कुमार टिकारी से, पूर्व मंत्री सुरेंद्र यादव बेलागंज से, लोजपा के राष्ट्रीय महासचिव सर्वजीत बोधगया से और अवधेश कुमार सिंह वजीरगंज से चुनाव मैदान में हैं. दो चरणों में हो रहे चुनाव का दिन जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, दिग्गजों का मतदाताओं से मिलना-जुलना भी तेज़ होता जा रहा है. इन दिग्गजों में सबसे ज़्यादा मुश्किल में फंसे हैं बिहार विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, जिनके खिला़फ प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने क्षेत्र से बाहर रहने का फरमान जारी कर लोगों से चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया है. चौधरी पर माओवादियों ने क्षेत्र की उपेक्षा और राजनीतिक मतलब साधने का आरोप लगाया है. नए परिसीमन में गुरुआ का भूगोल बदलने और नवसृजित शेरघाटी विधानसभा क्षेत्र के मुस्लिम बहुल हो जाने से शकील अहमद खान निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि वह कहां से चुनाव लड़ें. यही कारण है कि अभी तक राजद ने दोनों क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है. पिछले एक दशक से विधायक एवं मंत्री पद का आनंद उठा चुके शकील अहमद इस बार कोई खतरा नहीं उठाना चाहते.

रवींद्र प्रताप निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में किस्मत आज़मा रहे हैं. भाकपा के प्रदेश सचिव रहे पूर्व सांसद जलालुद्दीन अंसारी भी मतदाताओं के चक्रव्यूह में फंसे हैं. लोजपा ने गया शहर से अपने ज़िला अध्यक्ष अताउल्लाह खान को प्रत्याशी बनाया है, जो जलालुद्दीन अंसारी के रास्ते में रोड़े बिछा सकते हैं. मंत्री एवं सांसद रहे बेलागंज के विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव की मुश्किलें भी परिसीमन से बढ़ी हैं.

लोजपा के राष्ट्रीय महासचिव सर्वजीत फतेहपुर को परिसीमन के तहत बोधगया विधानसभा क्षेत्र से जोड़ दिए जाने से मुश्किल में पड़ गए हैं. बदले परिसीमन ने प्रेम कुमार के लिए भी परेशानी पैदा कर दी है. इसकी वजह यह है कि भाजपा प्रभावित पटवा टोली, लक्खीबाग एवं जनकपुर आदि क्षेत्र कटकर वजीरगंज का हिस्सा बन गया है. वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र से कांगे्रस प्रत्याशी एवं वर्तमान विधायक अवधेश कुमार सिंह की डगर भी आसान नहीं है. उनकी परेशानी विभिन्न दलों से चुनाव समर में उतरे स्वाजातीय उम्मीदवारों ने बढ़ा दी है. भाजपा ने वीरेंद्र सिंह और राजद ने राजेश कुमार टुन्नू को मैदान में उतारा है. रवींद्र प्रताप निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में किस्मत आज़मा रहे हैं. भाकपा के प्रदेश सचिव रहे पूर्व सांसद जलालुद्दीन अंसारी भी मतदाताओं के चक्रव्यूह में फंसे हैं. लोजपा ने गया शहर से अपने ज़िला अध्यक्ष अताउल्लाह खान को प्रत्याशी बनाया है, जो जलालुद्दीन अंसारी के रास्ते में रोड़े बिछा सकते हैं. मंत्री एवं सांसद रहे बेलागंज के विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव की मुश्किलें भी परिसीमन से बढ़ी हैं. भूमिहार बहुल और सुरेंद्र यादव समर्थित कई गांव जैसे भोरी, भवनपुर एवं गुलजाना आदि बेलागंज से कटकर टिकारी विधानसभा क्षेत्र के हिस्से बन गए हैं. टिकारी से चुनाव लड़ रहे कैबिनेट मंत्री अनिल कुमार को भी जद-यू के जातीय समीकरण में भितरघात की आशंका है. कुल मिलाकर गया के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे दिग्गजों की डगर आसान नहीं है.

दलबदलुओं की चांदी, कार्यकर्ता उपेक्षित

चुनाव के पूर्व यात्रा, कार्यकर्ता सम्मेलन और सदस्यता अभियान चलाने वाले राजनीतिक दलों का असली चेहरा टिकट बंटवारे के दौरान नज़र आया. हाथ में बायोडाटा और पार्टी की व़फादारी का तमगा लेकर घूम रहे कार्यकर्ताओं की हालत बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले वाली रही. मगध प्रमंडल में यह स्थिति ज़्यादा देखने को मिली. सभी दलों ने टिकट बंटवारे में कार्यकर्ताओं की व़फादारी को दरकिनार कर दलबदल करके आने वालों को टिकट से नवाज़ा. कोई भी दल इस मामले में स़फाई देने की स्थिति में नहीं है. सभी दलों के कार्यकर्ता- नेता इस रवैये से मायूस हैं. अखिल भारतीय कांगे्रस कमेटी के सदस्य रहे अभिराम शर्मा को जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से जद-यू का टिकट मिला तो दूसरी ओर कुर्था विधानसभा क्षेत्र से जद-यू की मंत्री रहीं सुचित्रा सिन्हा को कांग्रेस ने हाथोंहाथ लिया. इनके पति नागमणि दलबदल में रिकॉर्ड कायम कर चुके हैं. नवादा की निर्दलीय विधायक पूर्णिमा यादव और उनके पति एवं गोविंदपुर से निर्दलीय विधायक कौशल यादव को इस बार जद-यू ने अपना प्रत्याशी बनाया है. गया ज़िले के वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र से भाजपा छोड़कर आए अमरेंद्र सिंह डब्लू को लालू का आशीर्वाद मिला. गया शहर से कांगे्रस ने राजद के नेता मोहन श्रीवास्तव को टिकट दे दिया. वहीं लोजपा ने जद-यू के व्यवसायी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजू बर्णवाल को गया शहर विधानसभा क्षेत्र में अपने बंगले की रखवाली की ज़िम्मेदारी सौंप दी. बोधगया सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को अपनी सुरक्षा कम्युनिस्ट पार्टी के तीन बार विधायक रहे बालिग राम में नज़र आई. शेरघाटी विधानसभा क्षेत्र में जद-यू ने राजद छोड़कर आए विनोद यादव को गले लगाया. वैसे टिकट के लालच में दल बदलने वाले बहुत से नेताओं को निराशा हाथ लगी, उनकी हालत जाएं तो जाएं कहां वाली है. नए दल में वह बाहरी हैं और पुराने दल से निकल आए हैं. दल बदल कर आने वालों को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भले ही स्वीकार कर लिया हो, लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए वे अभी तक बाहरी हैं. नतीजा यह है कि ऐसे टिकटधारियों का जुड़ाव कार्यकर्ताओं से नहीं हो पा रहा है. दल बदल कर आए उम्मीदवारों को पार्टी के स्थानीय नेताओं एवं टिकट के दावेदारों का अपेक्षित समर्थन न मिलने से परेशानी झेलनी पड़ रही है और चुनाव परिणाम पर भी असर पड़ने की आशंका है. कुल मिलाकर मगध प्रमंडल का राजनीतिक माहौल गर्म है. दलबदलुओं ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को असमंजस में डाल दिया है और वे भी आगे मतलब की राजनीति का सहारा ले सकते हैं. दलीय व़फादारी करने वालों के लिए टिकट बंटवारे का यह खेल एक झटका है.

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