गया ज़िले के शेष बचे नक्सल प्रभावित पांच विधानसभा क्षेत्रों में बीस नवंबर को होने वाले मतदान में प्रत्याशियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. बिहार में हुए विकास के दावों को नकारते हुए नवसृजित शेरघाटी, इमामगंज, बाराचट्टी, गुरुआ और टिकारी विधानसभा क्षेत्रों में बुनियादी समस्याएं आज भी जस की तस हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या माओवाद की है. इन क्षेत्रों में जनता बिहार सरकार की नहीं, बल्कि समानांतर सरकार के नुमाइंदों के रहमोकरम पर रहने को विवश है. हर बार की तरह इस बार भी प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने क्षेत्र में मतदान बहिष्कार का आह्वान कर रखा है. ऐसे में मतदान की क्या स्थित रहेगी, यह तो बीस नवंबर को ही पता चलेगा. फिलहाल लोग नक्सलियों के फरमान से दहशतज़दा हैं. मतदान के बाद सुरक्षाबलों की तो वापसी हो जाएगी और फिर नक्सलियों के फरमान की अवहेलना का खामियाज़ा कैसे झेलना होगा, लोग इसी माथापच्ची में लगे हैं. उधर हर प्रत्याशी चुनाव प्रचार में लगा है. यहां टिकारी विधानसभा क्षेत्र ही ऐसा है, जहां विकास की बात की जा रही है. यहां नक्सलियों के फरमान का असर कम है. इन पांच विधानसभा क्षेत्रों में बिहार की पक्ष-विपक्ष की राजनीति के तीन महत्वपूर्ण व्यक्ति जनता की अदालत में फंसे हैं. इमामगंज से जदयू प्रत्याशी एवं बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, शेरघाटी से राजद प्रत्याशी एवं पूर्व मंत्री शकील अहमद खां और टिकारी से जदयू प्रत्याशी एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. अनिल कुमार. सभी अपने जातीय समीकरण बैठाकर विजयश्री हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.
गुरुआ विधानसभा क्षेत्र भी नक्सल प्रभावित माना जाता है. यह क्षेत्र दो नक्सली गुटों के संघर्ष का केंद्र बना हुआ है. यहां राजद ने अपने पूर्व मंत्री शकील अहमद खां के बदले पूर्व ज़िला परिषद अध्यक्ष विंदेश्वर प्रसाद यादव उ़र्फ बिंदी यादव को चुनाव मैदान में उतारा है. भाजपा ने सुरेंद्र सिंह और कांग्रेस ने अनिरुद्ध यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है, लेकिन ज़िला पार्षद राजेंद्र सिंह इन सबका खेल बिगाड़ने में लगे हैं. निर्दलीय प्रत्याशी होकर उन्होंने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है, पर दलीय समीकरण के चलते मुख्य मुक़ाबला बिंदी यादव और सुरेंद्र सिंह के बीच ही नज़र आता है.
अब मतदाताओं का क्या रु़ख होगा, यह तो ईवीएम खुलने पर ही पता चलेगा, लेकिन समस्याओं के अंबार तले दबे और नक्सलियों की दहशत में जी रहे बाराचट्टी, इमामगंज, गुरुआ एवं शेरघाटी के लोगों को चुनाव जीतने वाले नेताओं से भी बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है. नवसृजित शेरघाटी विधानसभा क्षेत्र से राजद प्रत्याशी के रूप में पूर्व मंत्री शकील अहमद खां, जदयू से शेरघाटी प्रखंड प्रमुख विनोद यादव, कांग्रेस से चंद्रिका यादव, जद (एस) से अलेक्जेंडर खां, निर्दलीय बख्तियार राणा, भरत यादव, बच्चू यादव एवं मंजू अग्रवाल चुनाव मैदान में हैं. यहां शकील अहमद खां की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है और इस बार वह चक्रव्यूह में फंसे हैं. इमामगंज सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से जदयू प्रत्याशी एवं विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी नक्सलियों द्वारा क्षेत्र में न घुसने देने की धमकी और वोट बहिष्कार के ऐलान के बावजूद गठबंधन के जातीय समीकरण के चलते से मज़बूत नजर आ रहे हैं. राजद ने यहां से ज़िला परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष रोशन भुइयां एवं कांग्रेस ने सुजीत मांझी को अपना उम्मीदवार बनाया है. यहां किसी की भी जीत नक्सलियों के फरमान के असर और समर्थन पर निर्भर करती है. बाराचट्टी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से जीतन राम मांझी की समधिन ज्योति मांझी जदयू की प्रत्याशी हैं. राजद ने पूर्व विधायक समता देवी, कांग्रेस ने ब़ढन भुइयां, बसपा ने नीलम पासवान और भाकपा माले ने कमलेश पासवान को अपना प्रत्याशी बनाया है. यहां जीत उसी की होगी, जो बाराचट्टी और मोहनपुर प्रखंड के जंगली-पहाड़ी क्षेत्रों के ग्रामीणों के मत पा सकेगा.
नक्सल प्रभावित इन क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत कम होना सभी प्रत्याशियों की परेशानी बढ़ा सकता है. गुरुआ विधानसभा क्षेत्र भी नक्सल प्रभावित माना जाता है. यह क्षेत्र दो नक्सली गुटों के संघर्ष का केंद्र बना हुआ है. यहां राजद ने अपने पूर्व मंत्री शकील अहमद खां के बदले पूर्व ज़िला परिषद अध्यक्ष विंदेश्वर प्रसाद यादव उ़र्फ बिंदी यादव को चुनाव मैदान में उतारा है. भाजपा ने सुरेंद्र सिंह और कांग्रेस ने अनिरुद्ध यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है, लेकिन ज़िला पार्षद राजेंद्र सिंह इन सबका खेल बिगाड़ने में लगे हैं. निर्दलीय प्रत्याशी होकर उन्होंने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है, पर दलीय समीकरण के चलते मुख्य मुक़ाबला बिंदी यादव और सुरेंद्र सिंह के बीच ही नज़र आता है. टिकारी विधानसभा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. अनिल कुमार को राजद ने इस बार घेरने का प्रयास किया है. पूर्व मंत्री बाग़ी कुमार वर्मा को प्रत्याशी बनाकर राज्य स्तर पर दलीय जातीय गठबंधन को तोड़ने का प्रयास किया गया है. बीस नवंबर को होने वाले मतदान में उक्त पांच विधानसभा क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की व्यवस्था और नक्सलियों के फरमान के बीच मतदाता क्या करें और क्या न करें वाली स्थिति में हैं. वहीं दूसरी ओर विभिन्न संगठनों द्वारा मतदाता जागरूकता अभियान जारी है.
बागी के फंदे में प्रौद्योगिकी मंत्री
सूबे के प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. अनिल कुमार टिकारी विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों के नए आयामों के बावजूद इस बार चुनाव में फंसे हुए नजर आ रहे हैं. उन्हें फंसाया है राजद प्रत्याशी एवं पूर्व मंत्री बागी कुमार वर्मा ने. राजनीतिक समीकरण के तहत बागी कुमार वर्मा की जाति वर्तमान में जदयू-भाजपा गठबंधन का वोट बैंक मानी जाती है, लेकिन अपने पिता पूर्व सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र नाथ वर्मा के सहारे राजनीति की सीढ़ी चढ़े बागी कुमार वर्मा के पक्ष में जातीय मतों की गोलबंदी ने अनिल कुमार की नींद हराम कर दी है. कांग्रेस ने यहां से अनिल कुमार के सजातीय स्थानीय नेता राम नंदन सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है, लेकिन भूमिहारों का मत अनिल कुमार के पक्ष में एकजुट है. राजद प्रत्याशी बागी कुमार वर्मा कोयरी समाज के साथ-साथ राजद-लोजपा के यादव, पासवान एवं मुस्लिम और कुछ हद तक राजपूत मतों का भरोसा लेकर अति उत्साहित हैं. जबकि अनिल कुमार को अपने सजातीय भूमिहार मतों पर सौ फीसदी के साथ-साथ जदयू-भाजपा के अति पिछड़ों, महादलितों के अलावा विकास के आधार पर राजपूत मतों पर पूरा विश्वास है.
ऐसे में टिकारी के क्षेत्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजपूत मतदाता ही निर्णायक स्थिति में हैं, लेकिन उन्हें एकजुट करने में अनिल कुमार कितना सफल हो पाते हैं, यह उन्हीं पर निर्भर है. हालांकि क्षेत्र की जनता कहती है कि अनिल कुमार ने क्षेत्र में पांच वर्षों में विकास की जो हवा बहाई है, वैसा अब तक किसी जनप्रतिनिधि द्वारा नहीं हुआ है. उनके महीने में बीस दिन से अधिक क्षेत्र में रहकर लोगों की समस्याओं का समाधान करने की बात भी हर कोई स्वीकार करता है. बावजूद इसके कई लोगों का मानना है कि बागी कुमार वर्मा ने विकास के बावजूद अनिल कुमार को इस बार फंसा दिया है.
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