बिहार विधानसभा चुनाव के चार चरण संपन्न हो चुके हैं. अभी दो चरणों का मतदान शेष है. विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, रात के अंधेरे में लोगों को पैसा देने की भी बात सामने आई है, कई उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि आपराधिक है, सभा के दौरान अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल जैसे अहम बिंदुओं पर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई क़ुरैशी से चौथी दुनिया (उर्दू) की संपादक वसीम राशिद ने एक लंबी बातचीत की. प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:
बिहार विधानसभा चुनाव में एक नेता दूसरे नेता को गंगा में बहा देने की बात कर रहा है तो कोई मंच पर खड़ा होकर किसी को पीटने की बातें करता है. चुनावी रैलियों में जिस तरह की भाषा का प्रयोग हो रहा है, वह वरुण गांधी के भाषण की याद ताज़ा करता है. चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक क्या कर रहे हैं? आप कार्रवाई क्यों नहीं करते?
चुनाव में ऐसी घटनाएं तो होती हैं. एक-दूसरे के ख़िला़फ बयानबाज़ी हो जाए तो मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट इंपैरिमेंट के लिए हर क्षेत्र में हमारी 5-10 टीमें होती हैं, जो घूमती रहती हैं, हर वीआईपी और नेता के भाषण को रिकॉर्ड करती हैं. एक-दो घटनाएं पिछले दिनों सामने आई हैं. हम लोग राय ले रहे हैं. हमारे पास गंगा में फेंकने वाली शिक़ायत भी आई है. यह चीज़ें उचित नहीं हैं. पर्यवेक्षक अलर्ट रहते हैं, उस घटना की रिकार्डिंग भी आ गई है. हमारी लीगल टीम ने उसे देखा है, हम भी देखेंगे. सभी नेताओं से हमारी यही अपील होती है कि वे मॉडल कोड पर सख्ती से अमल करें. पूर्व के चुनावों के मुक़ाबले इस बार बिहार में काफ़ी नियम-क़ानून हैं. इस बार शिक़ायतें भी बहुत कम आई हैं. ऐसी छोटी-मोटी घटनाएं सामने न आतीं तो और अच्छा रिकार्ड क़ायम होता. हम नेताओं को नोटिस देते हैं कि आपने ऐसा कहा, आप इसका स्पष्टीकरण दीजिए कि आपने क्या कहा और क्यों कहा. अगर हम उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं होते हैं तो पुन: स्पष्टीकरण देने को कहते हैं. नेताओं को चुनाव आयोग से नोटिस जाना बहुत बड़ी बात होती है, क्योंकि उनकी जनता में साख है, उसे चोट लगती है और जनमत संग्रह की नौबत आ जाए तो वह उनके लिए अच्छी चीज़ नहीं होती, जिसे वह नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं. हम जो एक्शन लेते हैं, वह तो लेंगे ही, साथ ही अपील करना चाहेंगे कि ऐसे अवसर न आएं, क्योंकि चुनाव साफ़-सुथरे होने चाहिए.
लगभग 44 प्रतिशत प्रत्याशियों पर आपराधिक मु़क़दमे चल रहे हैं. आयोग प्रत्याशियों से शपथपत्र तो जमा कराता है, लेकिन ऐसे लोग को चुनाव लड़ने से रोक नहीं पाता. क्या मान लिया जाए कि चुनाव आयोग एक बिना दांतों वाली बेज़हर संस्था है?
दरअसल लोगों को जानकारी नहीं है, इसलिए भी वे चुनाव आयोग को दोषी मानते हैं कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग चुनाव में खड़े हो रहे हैं. चुनाव में कौन खड़ा हो सकता है और कौन नहीं, यह एक्ट ऑफ पार्लियामेंट से संबंधित मामला है. इसके लिए क़ानून बनाया जाता है, हमारा इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता. उस व़क्त के क़ानून के मुताबिक़ जब तक आरोप अदालत में साबित न हो जाएं, तब तक आरोपी को निर्दोष माना जाता है, इसलिए हम उन्हें अयोग्य घोषित नहीं कर सकते. हालांकि विधि आयोग ने अनुशंसा की थी. अक्सर होता यह है कि विरोधी पार्टी झूठे आरोप लगाकर फ़र्ज़ी मुकदमा कर देती है. आप अच्छे प्रत्याशी हैं, आपको हराना मुश्किल है तो एक झूठा मुकदमा चुनाव से कुछ दिनों पहले कर दो कि उनके ख़िलाफ़ तो मुकदमा है. वैसे अगर कोई आपराधिक पृष्ठभूमि वाला प्रत्याशी होता है तो हम उसके पीछे एक गाड़ी लगाते हैं, जिसमें मजिस्ट्रेट होता है, वीडियो टीम होती है, वह बराबर उसकी निगरानी करती है, पूरी रिकार्डिंग होती रहती है. वह प्रत्याशी पीछे मुड़कर देखता और डरता है कि हर चीज़ रिकार्ड हो रही है. हमने संसद को लिखा, सरकार को लिखा, लेकिन वे कोई कानून ही नहीं बनाते. हमने पिछले दिनों सभी राष्ट्रीय पार्टियों को बुलाया. सात राष्ट्रीय और 35 क्षेत्रीय पार्टियां आईं. सबने कहा कि आपका यह रिफ़ॉर्म हमें स्वीकार नहीं है.
कई प्रत्याशी नामांकन के वक़्त सैकड़ों गाड़ियों के साथ ज़िला मजिस्ट्रेट कार्यालय पहुंचे. एक-एक उम्मीदवार करोड़ों रुपये ख़र्च कर रहा है. खुलेआम रुपये बांटे जा रहे हैं. क्या पैसे वालों के खिलाफ कार्यवाही करने में चुनाव आयोग को डर लगता है?
हम ऐसी कोई बात टीवी या अख़बार में देखते हैं तो किसी शिक़ायत का भी इंतज़ार नहीं करते, तुरंत कार्यवाही करते हैं. इस बार चुनाव में बहुत सख्ती हो रही है. एक बड़े नेता का बयान है कि वह हेलीकॉप्टर में बैठ गए, अधिकारियों ने उनका बैग चेक नहीं किया तो उन्होंने ख़ुद कहा कि हमारा बैग चेक कर लीजिए, चुनाव का मामला है. जब कोई नामांकन के लिए आता है तो उस समय वह प्रत्याशी नहीं होता. हमारा क़ानून उस वक़्त लागू होता है, जब यह प्रत्याशी हो जाता है. मनी पॉवर हमारे लिए एक बड़ी समस्या है. बिहार में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में. किसी राज्य में कम, किसी में अधिक. इसके ख़िलाफ़ हमने मुहिम शुरू की है. बिहार में हम अपने मेजर को टेस्ट कर रहे हैं, ताकि दूसरी जगहों पर अधिक सख्ती कर सकें. जो चीज़ें देखने में आती हैं, उन्हीं पर अमल किया जाता है. हमारी टीमें घूमती हैं. हम जगह-जगह रेड करते हैं, लोग पकड़े भी गए हैं, लेकिन हमारे पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि हम ब्लैक मनी पर कंट्रोल कर लें. हमारी अपनी टीम है, लेकिन हम मीडिया पर भी निर्भर हैं, क्योंकि हमसे ज़्यादा मीडिया की टीमें घूमती रहती हैं. पूरे भारत में लगभग 4500 आईएएस अधिकारी हैं, उनमें से 10-15 प्रतिशत अधिकारी बिहार में लगे हुए हैं, 150-200 पर्यवेक्षक लगे हुए हैं. हम शराब के लिए भी तीन माह पूर्व से कार्यवाही करते हैं. कहां-कहां शराब बनती है और कहां-कहां से आती है, इसकी लिस्ट तैयार करते हैं. बिहार में दूसरे राज्यों से भी शराब आती है. रास्ते में हम नाकाबंदी करते हैं. बावजूद इसके काफ़ी मात्रा में शराब पकड़ी गई. हमारे पास कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं कि बटन दबाते ही सारे लोग साधु हो जाएं. हम तीन-चार बार बिहार गए, क्योंकि हम एक साल पूर्व से ही चुनाव पर नज़र रखते हैं. सबसे पहले वोटिंग कार्ड पर ध्यान देते हैं, फिर देखते हैं कि कौन सा अधिकारी कैसा है, उनमें कोई ग़द्दार तो नहीं है. आवश्यकता के अनुसार अधिकारियों का तबादला भी करते हैं, ताकि कोई गड़बड़ न हो. हमने देखा कि वहां का माहौल अच्छा है, अधिकारी अच्छे हैं, हमारी तैयारी भी बहुत अच्छी है. यही कारण है कि लोगों में काफ़ी उत्साह है. हमने बूथ लेवल पर रणनीति बनाई, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की सूची तैयार की और कई लोगों की गिरफ़्तारियां भी हुईं. चुनाव बहुत पारदर्शी हो रहे हैं.
हर राजनीतिक पार्टी मानती है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ हो सकती है. ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग इतना प्रतिक्रियावादी क्यों है? जब इस पर कोई सवाल उठाता है तो उसे मौक़ा देने के बजाय गिरफ़्तार कर लिया जाता है. अगर ईवीएम सही हैं तो उनके संबंध में आप लोगों को खुलेआम चैलेंज क्यों नहीं करते, ताकि लोगों को पूरा भरोसा हो जाए?
सभी पार्टियां हमारे पास आई थीं. सबने कहा कि इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन बहुत अच्छी चीज़ है, बहुत अच्छा काम कर रही है. उन्होंने एक बात कही कि जब हम बटन दबाते हैं तो वोट स्टोर हो जाता है, लेकिन यह पता नहीं कि वह कहां स्टोर हो रहा है. यह यक़ीन की बात है. इसका हमारे पास सबूत नहीं होता. अगर इसका सबूत हो जाए और इसकी रसीद मिल जाए तो इससे हमें संतुष्टि होगी. हम यह नहीं मानते कि छेड़छाड़ होती है. ईवीएम पर हमें पूरा भरोसा है.
पचास साल पूर्व आयोग के पास जितनी सुविधाएं थीं और अब जिस तरह की सुविधाएं मौजूद हैं, उनमें ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है. ऐसे में बिहार में 6 चरणों में चुनाव कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
आयोग बहुत ख़ुश होगा, अगर पूरा चुनाव एक ही चरण में हो जाए, क्योंकि सबसे ज़्यादा मेहनत आयोग को ही करनी पड़ती है. हमारी कोशिश यह होती है कि चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष हों. अगर गुंडागर्दी और बूथ कैप्चरिंग की कोशिश होगी तो ऐसा हम बिल्कुल नहीं होने देंगे. जब-जब हम बिहार गए, वहां हमने सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ बैठक की. सभी पार्टियों ने कहा कि सीआरपीएफ़ ज़रूर होनी चाहिए, क्योंकि स्थानीय पुलिस पर दबाव रहता है. 6 चरणों में चुनाव कराने का मक़सद स़िर्फ और स़िर्फ निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव है.
एक आरोप यह है कि आयोग ने इतने सारे क़ानून लागू कर दिए हैं कि देश में चुनाव महज़ एक तकनीकी काम रह गया है. आयोग ने ऐसा कोई क़दम नहीं उठाया, जिससे लोगों की हिस्सेदारी बढ़े. क्या आपके पास ऐसी कोई योजना है?
इस बार चुनाव में पहले के मुक़ाबले वोटिंग में लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जो लोगों के उत्साह को उजागर करती है. शोरशराबे और ढोल-तमाशे पर हमने पूरा कंट्रोल किया है. रात के 10-11 बजे के बाद लाउडस्पीकर पर पाबंदी लगा दी गई, क्योंकि परीक्षार्थियों और बीमार- बूढ़े लोगों को दिक़्क़तें होती थीं. हम पहले केवल तीन गाड़ियां चलाने की अनुमति देते थे, लेकिन इस बार हमने 10 गाड़ियों की अनुमति दी. हम पाबंदियां स़िर्फ इसलिए लगाते हैं कि ख़र्चों पर क़ाबू पाया जा सके और चुनाव शांतिपूर्ण तरीक़े से हों.
आप देश के पहले मुस्लिम मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, इतना बड़ा पद प्राप्त करके कैसा महसूस कर रहे हैं?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है. यहां सभी धर्म बराबर हैं. इस तरह की बातें करना कि पहले मुसलमान, पहले सिख या ईसाई, अच्छा नहीं लगता. जिस पृष्ठभूमि से हम आते हैं, उसमें हर तरह के पद होते हैं. उन्हीं में से एक पद यह भी है और मुझे इस पर गर्व है. यह काम बहुत अहम है, क्योंकि पूरा देश इस पर भरोसा रखता है. इस पर खरा उतरना बड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि भारत का लोकतंत्र इसी संस्था पर टिका हुआ है. इस संस्था की जितनी ज़िम्मेदारी है, उस पर हमें गर्व है और उसका पूरा एहसास भी. हमारी कोशिश यही है कि हम संस्था की शान में इज़ाफ़ा करें. हमारी यही दुआ है कि लोकतंत्र की इस संस्था की छवि और प्रतिष्ठा हमेशा बुलंद रहे.
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कुरैशी से बातचीत में बहुत ही उम्दा सवाल उठाये गए हैं. तारीफ करने के मै वाकई मजबूर हूँ/ शुक्रिया
संजय पति तिवारी