समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पुत्र एवं सांसद अखिलेश यादव से बात करें तो उनमें एक परिपक्व राजनीतिज्ञ के उभरते व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति मिलती है. युवा नेतृत्व के संकट से लेकर उत्तर प्रदेश से जुड़े कई अन्य राजनीतिक मसलों पर उनसे चौथी दुनिया के एडिटर इंवेस्टीगेशन प्रभात रंजन दीन ने एक लंबी बातचीत की. प्रस्तुत हैं मुख्य अंशः
उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा नेतृत्व का अकाल है, दो चेहरों को छोड़कर. इनमें एक चेहरा राहुल गांधी का है तो दूसरा अखिलेश यादव का. अन्य युवा चेहरे उत्तर प्रदेश की राजनीति की औपचारिकता भर हैं. राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के सांसद ज़रूर हैं, लेकिन उनके बारे में पूरा देश जानता है कि उनके लिए उत्तर प्रदेश कितनी प्राथमिकता पर है. यह जो संकट है राज्य में युवा नेतृत्व का, इस खाई को कैसे पाटेगी आपकी पार्टी?
आपने बहुत बड़ा सवाल खड़ा किया है. देखिए, जहां तक देश और खास तौर पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा नेतृत्व का मसला है तो कांग्रेस समेत सभी पार्टियां इस सवाल से रूबरू हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी इस सवाल से उबरने की पूरी कोशिश कर रही है. सपा के तमाम युवा संगठनों ने यह प्रयास किया है कि नौजवान पार्टी के साथ खड़े हों. बहुत हद तक हम उसमें सफल भी रहे हैं. उसी का परिणाम है कि आज सबसे शानदार युवा संगठन सपा का है… संघर्ष में सपा ही आगे रही है युवाओं और नौजवानों को लेकर. जबसे मैं राजनीति में हूं, आज मैं पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष भी हूं, लेकिन हमेशा युवाओं के साथ ही संघर्ष में रहा. नौजवानों के साथ ही लगातार काम किया. छात्रसंघ के सवाल पर या छात्रसंघ के विजयी पदाधिकारियों के शपथ ग्रहण के सवाल पर हम लोग ही कैंपस से लेकर सड़क तक लड़े, सपा ही आगे बढ़कर संघर्ष करती रही. एक समय ऐसा था, जब छात्रसंघ बहाल था, छात्रसंघ का चुनाव हुआ करता था. समाजवादी पार्टी के पास ही पूरा का पूरा छात्र नेतृत्व रहा करता था. सपा से जुड़े छात्र ही छात्रसंघों में पहुंचते थे और बहुत बड़ी संख्या में छात्रसंघ से निकले हुए नौजवान आज हमारे संगठन में हैं. जहां तक कांग्रेस के युवा नेता का सवाल है, बहुत घूम-घूमकर प्रचार हो रहा है. उसमें अ़खबार भी साथ दे रहे हैं, मीडिया भी साथ दे रहा है. ऐसा दिखाया जा रहा है कि जैसे युवा नेतृत्व अकेले कांग्रेस के पास है, युवा चेहरे केवल कांग्रेस के पास हैं. यह सही है कि कांग्रेस ने युवा चेहरों को मौक़ा दिया है, मंत्री भी बना दिया, बहुत अच्छे पदों पर बैठा दिया संगठन में. यह सही है कि इन्हें मौक़ा मिला है काम करने का. देश के तमाम युवा इनकी तऱफ देख रहे हैं कि ये कुछ काम करेंगे, उनकी समस्याओं का समाधान होगा, उनकी निराशा दूर होगी, लेकिन केंद्र की सत्ता संभालने वाली कांग्रेस के ये युवा नेता नाकाम साबित हो रहे हैं. इनकी असफलता का सवाल अब व्यापक शक्ल लेने लगा है. अब तो हम जहां भी जनता के बीच जाएंगे और जनता के बीच संघर्ष और समाधान की बात करेंगे तो हम पर भी सवाल उठेंगे. वे कहेंगे कि इतने बड़े-बड़े नेता जब कुछ नहीं कर पाए तो यह नेतृत्व क्या कर पाएगा. इसलिए अगर ये कुछ काम नहीं कर पा रहे, समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढ पा रहे, बेरोजगारी कैसे खत्म हो, युवाओं की निराशा कैसे खत्म हो, सरकार में होने के बावजूद अगर कुछ नहीं कर पा रहे तो ये लोग सवाल अपने पर नहीं, बल्कि तमाम अन्य युवा नेतृत्वों के मत्थे भी तो छोड़े जा रहे हैं.
वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है. जिन सवालों का आपने ज़िक्र किया, उसके परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस नेतृत्व जिन सवालों के घेरे में है और भीषण भ्रष्टाचार के कारण बसपा नेतृत्व जिन सवालों के घेरे में है, इन घेरों से निकलने और राज्य में सपा की ताज़गी भरी युवा छवि को विकल्प के रूप में पेश करने की क्या कोई योजना है?
देखिए हम कर रहे हैं संघर्ष, वे कर रहे हैं सत्ता की राजनीति. हमारा उद्देश्य है संघर्ष में रहकर अपने साथ युवाओं को जोड़ना और वे सत्ता में रहते हुए भी युवाओं को नहीं जोड़ पा रहे हैं. जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, 2012 के चुनाव का सवाल है, यह सही है कि उन्होंने (कांग्रेस ने) मिशन 2012 बनाया है, लेकिन इधर जनता को दिखाई ही नहीं दे रहा है कि वे मिशन 2012 के लिए कर क्या रहे हैं. मैं टिप्पणी नहीं कर रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश की जो बर्बादी है, उत्तर प्रदेश की विकास योजनाओं को रोकने का जो काम किया जा रहा है, उत्तर प्रदेश का जो पैसा भ्रष्टाचार के ज़रिए बर्बाद हो रहा है, लूट हो रही है, इतना संगठित भ्रष्टाचार लोगों ने कभी नहीं देखा होगा, जैसा बसपा की सरकार कर रही है. कांग्रेस पार्टी को कर्नाटक में भ्रष्टाचार दिखता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में खुलेआम लूट है, खुलेआम मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और पूरी सत्ता संगठित होकर भ्रष्टाचार कर रही है, लेकिन कांग्रेस को यह दिखाई नहीं दे रहा है. अगर उत्तर प्रदेश बर्बाद हो रहा है तो कहीं न कहीं कांग्रेस भी इसके लिए ज़िम्मेदार है और प्रदेश की जनता यह देख रही है. इसलिए हम समाजवादियों को लगता है कि यदि हम तैयारी से अपनी नीतियों को लेकर जनता के पास जाएंगे, अपने कार्यक्रमों को लेकर जाएंगे तो उसका सार्थक परिणाम सामने आएगा. आज जनता को भी यह महसूस हो रहा है कि बेरोजगारी भत्ता कितना बड़ा फैसला था समाजवादी पार्टी का… विद्या धन कितना बड़ा फैसला था… जो हम लोगों ने विश्वविद्यालय बनाए, कॉलेज बनाए, सड़के बनाईं, पुल बनाए, प्रदेश को आगे बढ़ाने का काम किया, चीनी मिलें लगवाईं… आज जनता याद कर रही है कि सपा की सरकार होती तो चीनी मिलें बिकती नहीं और लगतीं… लेकिन यह सरकार चीनी मिलें बेच रही है. हम लोगों ने फैसला ले लिया था नौजवानों के लिए नौकरी का भी और बेरोज़गारी भत्ते का भी, लेकिन तमाम योजनाओं का पैसा यह सरकार लगवा रही है पत्थरों में, मूर्तियों में, स्मारकों में. इतने पत्थर आज़ादी के बाद किसी भी सरकार ने नहीं लगवाए होंगे, जितने उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार ने लगवा दिए. केवल इसलिए कि उनका नाम इतिहास में आ जाए. काम से इतिहास बनता है या पत्थर लगाने से? यह उन्हें कौन समझाए? इतिहास उत्तर प्रदेश का बने न बने, पर खुद का इतिहास बनाना चाहते हैं. अपने ही महापुरुषों को छोटा दिखाना चाहती है सरकार. यह सरकार इस प्रयास में है कि भीमराव अंबेडकर का नाम भी उसके सामने छोटा पड़ जाए, कांशीराम भी पीछे छूट जाएं. मुख्यमंत्री अपनी मूर्तियां, पत्थर के हाथी, पत्थरों के पार्क और पत्थरों के स्मारक बनवाने में लगी हुई हैं. इतने पैसों से उत्तर प्रदेश का कितना भला हो सकता था, यह बात क्या जनता नहीं समझती है? और हम भी इन मसलों को जब जनता के पास ले जाएंगे तो हमें भरोसा है कि जनता समाजवादियों को मौक़ा देगी. प्रदेश में आम लोगों की ज़िंदगी बेहाल होकर रह गई है, लेकिन सरकार को कोई परवाह ही नहीं.
आपने कहा कि इन मुद्दों को लेकर लोगों के पास जाएंगे… क्या इसकी कोई रूपरेखा बनी है?
पंचायत चुनाव के पहले ही हम लोगों ने प्रदेश भर में सर्वेक्षण कराया और लोगों से आवेदन मंगवाए. पार्टी का उद्देश्य यह है कि 2012 के चुनाव में प्रदेश के लोगों को बसपा की अराजकता से निजात मिले, इसलिए हम लोगों ने प्रयास किया कि जितने भी समाजवादी पार्टी के लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं, जो यह चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी उन्हें मौक़ा दे, टिकट दे चुनाव लड़ने के लिए, ऐसे लोगों से हमने आवेदन मंगवा लिया. आवेदन मंगवाने के बाद प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर उन लोगों से बातचीत की. उन्हीं से पूछा कि कैसे चुनाव जीता जाए, कैसे हम उन्हें विधायक बनवा सकते हैं. इस काम में समय ज़रूर लगा, लेकिन इससे प्रदेश भर की ताज़ा तस्वीर सामने उभर कर आई. पार्टी को यह विचार करने का आधार भी मिला कि विधानसभा सीटों के लिए प्रत्याशी कैसा हो, ज़मीनी स्तर पर तैयारी कैसी हो और लोगों की मौजूदा सरकार के प्रति राय क्या है. ज़मीनी मुद्दे सामने आए. उम्मीदवारों के बारे में फैसला करने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी. यह कह सकते हैं कि समाजवादी पार्टी ने 2012 के चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी हैं. प्रदेश के तक़रीबन सारे ज़िलों में सर्वेक्षण और संभावित प्रत्याशियों से विचार-विमर्श का काम पूरा हो चुका है. बहुत जल्दी पार्टी यह फैसला ले लेगी कि हमारा कौन उम्मीदवार चुनाव मैदान में रहेगा. 2012 में केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति ही नहीं बदलेगी, बल्कि 2014 में पूरे देश की राजनीति को भी बदलने का काम उत्तर प्रदेश ही करेगा. बिहार का विधानसभा चुनाव भी बहुत हद तक उत्तर प्रदेश की भविष्य की राजनीति का संकेत देगा. मिशन बनाकर जो दल घूम रहे हैं (इशारा कांग्रेस व बसपा की तरफ था), उनका मिशन जब बिहार में फेल हो जाएगा तो उत्तर प्रदेश में उसके असर के बारे में आसानी से समझा जा सकता है.
आप कन्नौज के सांसद होने के साथ-साथ सपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. पार्टी का युवा अध्यक्ष क्या विधानसभा चुनावों में युवा प्रत्याशियों को प्राथमिकता देगा?
आप यकीन मानिए कि प्रदेश भर में हम लोगों ने संभावित प्रत्याशियों से जो बातचीत की है या जो भी हमने सर्वे किया है, उसमें बहुत बड़ी संख्या में युवकों ने समाजवादी पार्टी से टिकट मांगा है. हम उन्हें मौक़ा भी देंगे, लेकिन हमने एक शर्त ज़रूर रखी है कि उन्हें जनता के बीच रहकर काम करना होगा. अगर जनता के बीच काम करेंगे और इसका हम आकलन कर लेंगे और जनता से पता कर लेंगे कि वाकई उसके बीच रहकर किसी ने काम किया है तो पार्टी ऐसे प्रतिबद्ध युवकों को ज़रूर मौक़ा देगी.
जैसा आपने कहा कि उत्तर प्रदेश के सरकारनीत भ्रष्टाचार के प्रति कांग्रेस आंखें मूंदे हुए है. क्या आपको लगता है कि कांग्रेस और बसपा के बीच कोई अंदरूनी समझदारी है?
मैं लोकसभा का सदस्य हूं. लोकसभा में कई बार कई ऐसे मुद्दे आते हैं, जब बसपा के सांसद पूरी तरह भ्रमित दिखते हैं कि उन्हें निर्णय क्या लेना है. वे तुरंत-तुरंत बदलते रहते हैं. कई ऐसे सवाल आए, जिनमें बसपा के सांसद बोलना चाहते थे, लेकिन अचानक पीछे हट गए. सपा की नीति और रास्ता सा़फ है कि हम भाजपा के साथ नहीं जा सकते. हम दूरी बनाकर रखेंगे भाजपा और कांग्रेस से. जितने भी महत्वपूर्ण सवाल सामने आए लोकसभा में, बसपा ने कांग्रेस को ही अपना समर्थन दिया. कुछ मसलों पर हमने भी कांग्रेस को समर्थन दिया है, लेकिन हमारी स्पष्ट राजनीतिक बाध्यता है कि हम भाजपा को सत्ता के क़रीब कतई नहीं आने देना चाहते. अब देखिए न, नोएडा पार्क का मसला. लोगों ने आंदोलन किया. बसपा सरकार ने पर्यावरण का सत्यानाश कर दिया, लेकिन बाद में कांग्रेस ने ही नो ऑब्जेक्शन दे दिया. ईको पार्क कहकर पत्थरों का पार्क बना दिया और पुराने जेल परिसर में लगे सैकड़ों घने-पुराने पेड़ काट डाले. इस पर केंद्र सरकार के तहत काम करने वाले वन विभाग ने चुप्पी क्यों साधे रखी? कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी का घर जला डाला. घर जलाने वाले को बसपा ने विधान परिषद का सदस्य बना दिया. कांग्रेस चुप्पी क्यों साधे रह गई? कहीं न कहीं लगता है कि कांग्रेस की कोई समझ है या मदद मिल रही है, जिससे शह पाकर बसपा सरकार प्रदेश में मनमानी करने पर उतारू है. अगर केंद्र सरकार अंकुश लगा दे या सख्त रवैया अख्तियार कर ले तो यह पत्थर लगना, यह लूट-भ्रष्टाचार सब एक दिन में रुक जाए.
सामाजिक-राजनीतिक माहौल के साथ-साथ प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक पर्यावरण भी नष्ट कर डाला है. सैकड़ों घने पेड़ काट डाले गए, पत्थरों से शहर को पाट डाला गया और गोमती नदी के किनारों को भी अतिक्रमित कर वहां भी पत्थर मढ़ दिए गए. सपा के पास आ़खिर क्या इलाज है इसका?
बसपा सरकार ने केवल लखनऊ में चार हज़ार एकड़ ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा किया है. उसे पत्थरों से पाट दिया और हज़ारों करोड़ रुपये फूंक डाले. पर्यावरण की तो धज्जियां उड़ाकर रख दीं. इस सरकार ने पर्यावरण के सारे नियम ध्वस्त कर डाले. गोमती नदी और नालों तक पर क़ब्ज़ा हो गया. केवल लखनऊ ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश भर में. इस सरकार ने इतना नुक़सान कर दिया है कि उसका इलाज किसी चमत्कार से तो हो नहीं सकता, लेकिन जब कभी भी जनता हमें मौक़ा देगी और हमारी सरकार आएगी तो जिस पर्यावरण को इस सरकार ने खत्म कर डाला है, उसे बहाल करने की कोशिश ज़रूर करेगी. सोनभद्र, मिर्जापुर, हमीरपुर एवं बुंदेलखंड आदि में बिना मापदंडों के जो पत्थर खोदे गए और पहाड़ों का विध्वंस किया गया, उसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कोई राजनीतिक व्यक्ति हो या कोई नौकरशाह. ऐसे नौकरशाहों की शिनाख्त है और उन्हें जेल जाना होगा.
जिन अधिकारियों ने बसपा के कैडर की तरह आचरण किया, नौकरशाही की आचार संहिता का उल्लंघन किया और सत्ता के शीर्ष गलियारे पर भी वही क़ाबिज हैं. ऐसे नौकरशाहों से कैसे निबटेगी आपकी पार्टी, अगर सत्ता में आई तो?
ऐसे तमाम अधिकारी हैं, जिनकी ज़िम्मेदारियां कुछ दूसरी थीं और वे अपनी आचार संहिता भूल गए. वे अपनी सीमाएं तोड़कर आगे बढ़ गए और सरकारी काम छोड़कर उन्होंने मुख्यमंत्री या उनकी पार्टी के नौकर की तरह काम किया. जिन अधिकारियों ने ऐसा किया है, भ्रष्टाचार किया है, प्रदेश को लूटा है, बर्बाद किया है, समाजवादी पार्टी ने साढ़े तीन साल में ऐसे ही अधिकारियों की सूची तैयार की है, उन्हें सज़ा ज़रूर मिलनी चाहिए.
2007 से लेकर अभी तक जिस तरह बसपा ने अराजक राजनीति और प्रशासन का सृजन किया, उसके खिला़फ सपा ने पुरज़ोर विरोध दर्ज क्यों नहीं किया? समाजवादी पार्टी कहीं अपने आप को कमज़ोर तो नहीं पाती रही मायावती सरकार के सामने?
सबसे पहली लाठी छात्रसभा के नौजवानों पर बरसी थी. जैसे ही बसपा की सरकार बनी थी, समाजवादियों ने मौका दिया था छह महीने का. कुछ महीने गुज़र जाने के बाद सपा के युवा नेताओं ने छात्रसंघ के मसले पर सरकार को घेरा था. समाजवादी लोग केवल सरकार से पूछना चाहते थे कि छात्रसंघ की बहाली का जो आश्वासन सदन में दिया गया था, वह कब पूरा होगा. इस लोकतांत्रिक मांग पर छात्रसभा के नौजवानों को बुरी तरह पीटा गया. जख्मी छात्रों का इलाज कराने के बजाय उन्हें जेल भेज दिया गया, जिसके खिला़फ प्रदेश नेतृत्व एसएसपी आवास के सामने जाकर बैठ गया. उनमें मैं भी शामिल था. उसके बाद से लगातार समाजवादी पार्टी संघर्ष करती रही. यहां तक कि पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं विधानसभा में विपक्ष के नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ भी पुलिस ने हाथापाई की. पार्टी के सदस्यों और नेताओं पर जितने झूठे मुकदमे इस सरकार ने लादे और जेल भेजा, ऐसा कभी नहीं हुआ. यह लोकतांत्रिक राजनीति का काला पन्ना है. क्या इसे समाजवादी पार्टी भूल जाएगी?
आ़खिर में प्रदेश के दलितों और खास तौर पर मुसलमानों के बारे में बताएं कि यह समुदाय कितना बसपा के साथ है और कितना सपा के साथ?
यह केवल कहने-सुनने की बात है कि उत्तर प्रदेश में दलितों की सरकार है. प्रदेश में सबसे ज़्यादा दलितों की हालत खराब है, जिनका तथाकथित रूप से नेतृत्व कर रही है बसपा सरकार. संकट में पड़ने पर मुख्यमंत्री ज़रूर यह कहती हैं कि वह दलित हैं, इसलिए संकट में हैं और संकट दूर होते ही अपना व्यक्तिगत और अपने चाकरों का हित साधने लगती हैं. उन्होंने दलितों के लिए क्या किया? सबसे ग़रीब वे, सबसे भूखे वे, सबसे प्रताड़ित वे…फिर किस बात की दलित सरकार? दलितों को यह साफ समझ में आ गया है कि मायावती केवल दलितों की एक जाति के लिए हैं, वह जाटव जाति भी भ्रम में ही है. दलितों के इस एक वर्ग के लिए भी मायावती ने क्या किया, अपने रिश्तेदारों को छोड़कर? अब दलितों को यह लगने लगा है कि उनका हित समाजवादी पार्टी ही देख सकती है. रही बात मुसलमानों की, तो आप यह मानें कि मुसलमान सपा के ही साथ हैं. मुसलमानों के साथ सपा का पारंपरिक रिश्ता है. कल्याण सिंह का मसला तो मीडिया का मसला है. मुसलमान भी जानते हैं कि कल्याण का साथ केवल इसलिए लिया गया था कि हमें भाजपा को उसकी औकात दिखानी थी.
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अखिलेश यादव का इन्टरव्यू अच्छा लगा । प्रभात सर मेरा निवेदन है कि इन्टरव्यू और बड़ा हो और ज्यादा सवाल हो तो अच्छा है । उत्तर प्रदेश- उत्तरांचल संस्करण भी साइट पर उपलब्ध करवादें कृपया । शिशिर शुक्ला- समाचार4मीडिया.कॉम