नीतीश सरकार की उपलब्धियां गिनाकर वोट पाने की चाहत रखने वाले प्रत्याशियों को इस बार झटका लग सकता है. वजह, जीत के बाद उन्होंने आम जनता से सरोकार रखना भी मुनासिब नहीं समझा, शिलान्यास और उद्घाटन करके मीडिया के सामने बड़ी-बड़ी बातें ज़रूर कीं. एक बार फिर लगभग वही प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं. जनता एक बार फिर उनके भाग्य का फैसला करने के लिए तैयार है. राजनीतिक पंडितों के मुताबिक़, इस बार कई राजनीतिक पार्टी के दिग्गजों की प्रतिष्ठा खतरे में है. मतदाताओं की खामोशी से हलकान प्रत्याशी उन्हें लुभाने की भरपूर कोशिशें कर रहे हैं, बावजूद इसके कोई भी प्रत्याशी जीत का दावा नहीं कर पा रहा है. हालांकि चारों विधानसभा क्षेत्रों के सभी 46 प्रत्याशी ताल ज़रूर ठोक रहे हैं. चुनावी बिसात बिछ चुकी है, मोहरे भी सजकर तैयार हैं. खगड़िया विधानसभा क्षेत्र में जद-यू की निवर्तमान विधायक पूनम देवी यादव की राह इस बार आसान नही है, क्योंकि उनकी जेठानी सुशीला देवी ने उनके खिला़फ मोर्चा खोल दिया है. इतना ही नहीं, नगर परिषद के सोलह वार्ड पार्षदों ने उनके द्वारा लगाए गए आरोपों के विरोध में स्वर बुलंद करके यह स्पष्ट कर दिया कि अगर उन्होंने इसके लिए मा़फी नहीं मांगी तो खामियाज़ा भुगतने के लिए तैयार रहें. पूनम की जेठानी सुशीला तो इस बार उनके लिए कांटा ही बन गई हैं. वर्षों से समाजसेवा करते आ रहे इंजीनियर धर्मेंद्र भी इस बार पूनम की नैया डुबोने के लिए तैयार बैठे हैं. कांग्रेस द्वारा खगड़िया से मज़बूत प्रत्याशी न उतारना शायद कोई राजनीतिक रणनीति है, लेकिन प्रीति वर्मा भी चुनावी गणित उलटने में सक्षम हैं. कुल 15 उम्मीदवार खगड़िया विधानसभा क्षेत्र के चुनावी समर में हैं, लेकिन इन चारों के अलावा लोजपा के बाग़ी उम्मीदवार मोहम्मद शहाबुद्दीन भी अप्रत्याशित फैसला लाने में सक्षम हैं. यह कहना शायद बेहतर होगा कि क्षेत्र में चतुष्कोणीय मुक़ाबला दिख रहा है. यहां 15 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला 1 लाख 7 हज़ार 617 पुरुष और 90 हज़ार 9 सौ 42 महिला मतदाताओं द्वारा होगा. बेलदौर विधानसभा क्षेत्र में जद-यू विधायक पन्नालाल पटेल की राह बहुत कठिन है. जनता का आरोप है कि पटेल ने विकास की बात तो दूर, चुनाव के बाद सीधे मुंह बात करना भी मुनासिब नहीं समझा. इस बार निर्दलीय प्रत्याशी विजय कुमार पांडव पन्नालाल पटेल के साथ-साथ लोजपा प्रत्याशी सुनीता शर्मा के लिए भी ग्रह बनकर मैदान में उतरे हैं. भाकपा से पूर्व विधायक सत्य नारायण सिंह मैदान में हैं, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी उमा देवी की मज़बूती का अंदाज़ा उन्हें भी है. अन्य उम्मीदवार भी अपनी-अपनी जीत के लिए तमाम तरह की जुगत भिड़ा रहे हैं. बावजूद इसके यह कहना ज़रूरी है कि इस बार निर्दलीय प्रत्याशी विजय कुमार पांडव के इर्द-गिर्द ही जीत की तहरीर लिखे जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. पांडव के बड़े भाई एवं कोसी विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भरत यादव उनके लिए अगर रहबर बन गए तो उनका जीतना लगभग तय है.
एक लाख 3 हज़ार एक पुरुष और 91 हज़ार 957 महिला मतदाताओं वाले अलौली (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र में जद-यू द्वारा रामचंद्र सदा जैसे कमज़ोर प्रत्याशी को उतारना लोगों को हैरान कर रहा है. राजनीतिक पंडितों के मुताबिक़, जिस उम्मीदवार की पहचान ही अलौली में नहीं है, उसे रामविलास पासवान के भाई एवं लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस के खिला़फ उतार कर जद-यू हाईकमान नें दिन में ही तारा देखने का प्रयास किया है. वैसे यह अलग बात है कि जद-यू के बाग़ी उम्मीदवार राजेश कुमार सदा को अंतिम क्षणों में कांग्रेस ने टिकट देकर चुनावी माहौल गरम कर दिया है.
परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से परिवहन मंत्री रामानंद सिंह जद-यू की ओर से उम्मीदवार हैं. पिछले चुनाव के बाद जनता से कटे रहना उन्हें बेहद भारी पड़ने वाला है. इस बार मतदाताओं का रुझान राकेश कुमार उ़र्फ सम्राट चौधरी के प्रति है. कांगे्रस प्रत्याशी के रूप में चौथम के प्रखंड प्रमुख नरेश प्रसाद बादल मैदान में हैं, लेकिन यहां के मतदाताओं की मानें तो जद-यू और राजद के बीच ही आमने-सामने की टक्कर होगी. लोगों का कहना है कि परिवहन मंत्री बनने के बाद रामानंद घर तक पहुंचने के लिए काले शीशे वाली गाड़ी का प्रयोग करने लगे. इस दौरान वाहन के सामने आने वाले ग़रीब दुकानदारों को उनके सुरक्षा गार्डों ने जमकर धुना. इस बार यहां 1 लाख 27 हज़ार 8 सौ 65 पुरुष और 1 लाख 10 हज़ार 4 सौ 39 महिला मतदाताओं द्वारा कुल 10 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला किया जाएगा.
एक लाख 3 हज़ार एक पुरुष और 91 हज़ार 957 महिला मतदाताओं वाले अलौली (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र में जद-यू द्वारा रामचंद्र सदा जैसे कमज़ोर प्रत्याशी को उतारना लोगों को हैरान कर रहा है. राजनीतिक पंडितों के मुताबिक़, जिस उम्मीदवार की पहचान ही अलौली में नहीं है, उसे रामविलास पासवान के भाई एवं लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस के खिला़फ उतार कर जद-यू हाईकमान नें दिन में ही तारा देखने का प्रयास किया है. वैसे यह अलग बात है कि जद-यू के बाग़ी उम्मीदवार राजेश कुमार सदा को अंतिम क्षणों में कांग्रेस ने टिकट देकर चुनावी माहौल गरम कर दिया है. हैरत तो तब हुई, जब अमौसी नरसंहार कांड के मुख्य अभियुक्त एवं पूर्व नक्सली सरगना बोढ़न सदा को भाकपा माले ने अलौली से अपना उम्मीदवार बनाकर कोढ़ में खुजली वाला काम कर दिया. फैसला तो आ ही जाएगा, लेकिन अगर नीतीश के विकास कार्यों से प्रभावित मतदाता निवर्तमान विधायकों की कारगुज़ारियों को मा़फ नहीं कर सके तो इस बार खगड़िया की तीन विधानसभा सीटों पर अपना क़ब्ज़ा बरक़रार रखना जद-यू के लिए आसान नहीं होगा.
तीन देवियों की चुनावी जंग
खगड़िया विधानसभा क्षेत्र का नतीजा चाहे जो भी हो, लेकिन इस बार देवरानी और जेठानी के बीच होने वाली जंग रोमांचक होगी. खगड़िया के प्रसिद्ध सियासी घराने के पूर्व विधायक रणवीर यादव की पत्नी एवं जद-यू प्रत्याशी पूनम देवी यादव और खगड़िया के दिवंगत सांसद रामशरण यादव की पुत्रवधू एवं ज़िला परिषद अध्यक्ष सुशीला देवी के बीच मुख्य मुक़ाबला होगा, क्योंकि लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान ने खगड़िया की निवर्तमान जद-यू विधायक पूनम यादव को सबक सिखाने के इरादे से उनकी जेठानी एवं ज़िला परिषद अध्यक्ष सुशीला देवी को चुनावी समर में उतार दिया है. पूनम इसके पहले लोजपा के टिकट पर खगड़िया से जीत चुकी थीं, लेकिन बाद में लोजपा का दामन छोड़कर जद-यू के पाले में चली गईं. उधर कांग्रेस ने अपना टिकट प्रीति वर्मा को देकर तीन देवियों की जंग का शंखनाद कर दिया है.
प्रशासन के लिए चुनौती
खगड़िया ज़िले के अलौली विधानसभा क्षेत्र में चुनाव कराना ज़िला प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है. लगभग पैंतीस सालों से अलौली का प्रतिनिधित्व करने वाले रामविलास पासवान के अनुज एवं लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस ने 1973 से इलाक़े में जो चाहा, वही हुआ, लेकिन वर्षों पहले उनके भाई रामचंद्र पासवान के इचरुआ स्थित गेस्ट हाउस को जब नक्सलियों ने बम से उड़ाकर अपनी उपस्थिति का एहसास कराया तो प्रशासन के भी कान खड़े हो गए. प्रशासनिक चहलकदमी बढ़ती गई और नक्सली गतिविधियां भी. इस घटना के बाद प्रशासन ने भी मान लिया कि यह इलाक़ा नक्सल प्रभावित हो गया है. इसी इलाक़े में पिछले साल नक्सलियों ने 16 किसानों की एक साथ हत्या कर दी थी. नक्सल प्रभावित घोषित किए गए खगड़िया ज़िले के इस एकमात्र विधानसभा क्षेत्र में प्रशासन शांतिपूर्वक चुनाव करा पाता है या नहीं, यह सवाल आम जनता के मन में हिलोरें मार रहा है.
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