करवट बदलती शाम-ए-अवध

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जी हुजूर! शाम-ए-अवध यूं ही दुनिया भर में मशहूर नहीं है. लखनऊ की शाम की रंगीनियत यहां के वाशिंदों के दिलों में तो बसी ही है, साथ ही लखनऊ की शाम को देखने के मुंतज़िर लोगों को भी अपनी ओर बरबस खींचती रही है. ज्यों-ज्यों लखनऊ में शाम गहराती जाती है, लोगों के जेहन में एक खास किस्म की मस्ती का सुरूर ग़ालिब होना शुरू हो जाता है. सदियों से यह क्रम चला आ रहा है. जब लखनऊ में स़िर्फ इक्के-तांगे चलते थे, तब भी लखनऊ की शाम ग़ज़ब की थी और आज जब ट्रैफिक जाम है, तब भी लखनऊ की शाम ग़ज़ब की ही है. पहले जब टीले वाली मस्जिद के पीछे सूरज कहीं मलिहाबाद के आम के बागान में छिप जाता था तो लखनऊ लैंप पोस्टों एवं कंदील में जलते चिरागों से रौशन हो उठता था और आज जब वह ऊंची इमारतों के पीछे छिप जाने के लिए मजबूर हो जाता है तो भी लखनऊ बिजली से जलने वाले बल्बों, मरकरी या नियॉन से जगमगा उठता है.

शाम होते ही शेरो-शायरी की महफिल सजाने वाला लखनऊ आज एफएम की गुनगुनाहट जी रहा है. कथक से सजने वाली महफिलें डीजे और लेटनाइट डांस पार्टियों की सूरत अख्तियार करने में संकोच नहीं कर रही हैं. आधी रात तक या इससे भी ज्यादा देर तक हिंदुस्तान की सियासत, अदबी दुनिया में आ रही गिरावट, नई नस्ल से नाराजगी ज़ाहिर करके एक-दूसरे की सुनने और अपनी कहने वालों की अड्डेबाजी अब पार्किंग के नीचे दब गई सी लगती है. देर रात तक शह और मात देने वालों के हाथों में शतरंज के मोहरों की जगह ताश के पत्तों ने ले ली है.

बदलते समय के साथ-साथ आधी रात तक गुलजार रहने वाले लखनऊ के मिजाज में भी बदलाव ज़रूर आया है. शाम होते ही शेरो-शायरी की मह़िफल सजाने वाला लखनऊ आज एफएम की गुनगुनाहट जी रहा है. कथक से सजने वाली महफिलें डीजे और लेटनाइट डांस पार्टियों की सूरत अख्तियार करने में संकोच नहीं कर रही हैं. आधी रात तक या इससे भी ज़्यादा देर तक हिंदुस्तान की सियासत, अदबी दुनिया में आ रही गिरावट, नई नस्ल से नाराज़गी ज़ाहिर करके एक-दूसरे की सुनने और अपनी कहने वालों की अड्डेबाज़ी अब पार्किंग के नीचे दब गई सी लगती है. देर रात तक गुलजार रहने वाले जीमखाना जैसे क्लब आज भी गुलजार ही हैं, बस थोड़ा सा बदलाव आया है, इसमें बैठने वाले पुराने रईसों की जगह बड़े-बड़े अफसरों ने ले ली है. हुजूर अर्ज़ किया है, तवज्जो चाहता हूं या फिर आपकी ख़िदमत में हाजिर है…. तशरी़फ रखिए…. जैसे लखनवी अंदाज के जुमले और संबोधन हाय…. वेल्कम…. बी सीटेड…. अमां लिसेन यार…. काइंड अटेंशन प्लीज में तब्दील हो चुके हैं. हुजूर आप क्या नोश फरमाना पसंद करेंगे के आग्रह ने मेरे लिए एक बटर चिकन और फ्राइड फिश, आपको जो चाहिए आर्डर कर दीजिए से हार माननी शुरू कर दी है. देर रात तक क्लबों में बैठकर शतरंज पर शह और मात देने वालों के हाथों में शतरंज के मोहरों की जगह ताश के पत्तों ने ले ली है. लैश, मैरिज और पप्लू से हज़ारों के वारे-न्यारे होने लगे हैं.

हजरतगंज आज भी देर रात तक गुलजार है. साड़ी में हौले-हौले क़दम रखती हुई दुकानों में लटकी और महंगी साड़ियों पर हसरतभरी नज़र डालकर पति से इस साड़ी की तारी़फ करने वाली महोदया के पास अब इतनी फुर्सत कहां? वह तो जींस-टॉप पहने, कान में मोबाइल लगाए अपने हनी यानी हसबैंड से उसकी लोकेशन लेने में लगी रहती हैं. हजरतगंज की मुख्य सड़क पर रिक्शों का घुसना मना है और अब लखनवियों को पैदल चलना गंवारा नहीं है, सो रात दस बजे से ही बाइक्स और कारें आना शुरू हो जाती हैं. रात में चिकन का कुतार्र्-पायजामा पहन कर चहलक़दमी करते हुए गंज आने वाले जेंटलमैन अब बरमूडा पहन कर आते हैं या फिर केप्री धारण कर. रात में एक ग्लास ठंडाई का मजा लेकर या कुल्हड़ में बादाम का दूध पीकर हाज़मा दुरुस्त करने वाले लोग अब समय के साथ आगे बढ़ते हुए कोल्ड ड्रिंक विद आइसक्रीम लेकर अपना डाइजेशन ओके करते हैं. चांदी के वर्क में लिपटी पान की मलाईदार गिलौरी अब रात भर अपनी बिक्री की आस लगाए हुए बासी हो जाती है. वहीं पान मसाले का पाउच मुंह चिढ़ाता हुआ अपना इस्तेमाल करा लेता है. लखनऊ की रातों ने अपने अंदर कुछ नई चीज़ों को शामिल कर लिया है. मोबाइल फोन के आने और टेलीविजन पर सैकड़ों चैनल दिखाए जाने से जहां बच्चे बोल्ड हुए हैं, वहीं मां-बाप ब्राड माइंडेड हो चुके हैं. लखनवी शाम ने भी बेशर्मी को ब्राड माइंड होकर एक्सेप्ट करना सीख लिया है. वेव, सहारा गंज और फन सिटी जैसे मॉल दिन में भी शाम का और शाम को रात का मज़ा सा देने लगे हैं. इन मॉल्स के फूड प्लाजा देर रात तक युवा कपल्स से भरे रहते हैं. पिता जी या भइया देख न लें की दहशत उड़न छू हो गई है. इसमें हर्ज़ ही क्या है, मैं खुद समझदार हूं, मैं अब बच्ची नहीं हूं और आपको मुझ पर फेथ करना चाहिए जैसे अकाट्य तीर युवा वर्ग के पास हैं, इसलिए देर रात तक बाहर रुकने से मना कर पाना अब पैरेंट्‌स के हाथ में भी नहीं रहा.

अब तो लखनऊ की रात का असली मज़ा लेना है तो आपको किसी मॉडल शॉप में जाना पड़ेगा. यूं तो ग्यारह बजे तक की सीमा है, लेकिन दरवाज़ा बंद होने के बाद आधी रात के बाद भी मयनोशी की सेल्फ सर्विस चलती रहती है. ये मॉडल शॉप लखनऊ के हर इलाक़े में हैं. नई जनरेशन को शराब पीने के लिए जगह का जुगाड़ नहीं करना पड़ता. पॉश इंदिरा नगर एवं गोमती नगर जैसे इलाकों में तो इन मॉडल शॉप्स की संख्या का़फी ज़्यादा है. इनमें मॉडलनुमा लड़के बैठकर बोलचाल की शैली और गाली विद्या की देर रात तक प्रगति करते हैं. लखनऊ की करवट में रात नौ बजे के बाद गुलजार होने वाले डिस्कोथेक भी अंगडाई लेने लगे हैं. नई पीढ़ी इनकी तरफ तेजी से लपक रही है. रेस्टोरेंट में एक तरफ डीजे की व्यवस्था ने शोहदेबाज़ी को सड़कों से हटाकर यहां जगह दे दी है. सड़क पर ज़रा सी हरकत करते हुए देख लिए जाने पर पिट जाने का खतरा यहां बिल्कुल नहीं है. एक-दूसरे की बाहों में थिरकते युवा शरीर यहां अब मिलने लगे हैं.

कहां तक बताऊं हुजूर आपको….अब देर रात किसी प्रेक्षागृह में कथक का कार्यक्रम देखने के लिए भले आपको कई जन्म और लेने पड़ें, लेकिन घबराइए मत….हम आपको नाइट रेनडांस तो दिखा ही सकते हैं. लखनऊ के पांच सितारा और इस स्तर के अन्य होटलों ने रेनडांस की व्यवस्था कर रखी है. अपनी पत्नी को भिगोइए और दूसरे की भीगी-भीगी पत्नी देखिए. वाटर पार्क में तो रात की एंट्री फीस ही बढ़ जाती है…. भले ही तेज रफ्तारी के कारण, ग्लोबलाइजेशन के कारण, मीडिया एवं कम्युनिकेशन बूम के कारण और फैशन के कारण लखनऊ की रात की तस्वीर बदली नज़र आती हो, लेकिन इतना बदलाव आने के बावजूद आज भी अमीनाबाद की धक्का-मुक्की झेलकर सस्ता सामान खरीदती महिलाएं उसी तरह हैं…. रात ग्यारह बजे तक गड़बड़झाला में तीन सौ का समान पचास रुपये में बेचने का मोलभाव चल रहा है…. नज़ीराबाद की सड़क पर बेंच पर बैठकर रात भर कश्मीरी चाय पीने-पिलाने के दृश्य जिंदा हैं…. आज भी चौक के चौराहे पर पान की दुकानों पर महफिलें आबाद हैं. पहनावा बदल गया है, लेकिन पसंद नहीं बदली…. और यह बदलाव स़िर्फ इसलिए आया है, क्योंकि जीपीओ की घड़ी खामोश है और घंटाघर ने भी गज़र बजाकर लोगों को वक्त बताना बंद कर दिया है, क्योंकि वक्त बहुत आगे निकल गया है. दूसरी तरफ नवाबी शहर लखनऊ की सड़कों, इमारतों एवं पार्कों ने भी करवट लेनी शुरू कर दी है. पतली सड़कों और संकरी गलियों का दम घुटने लगा, क्योंकि इन्हें भी न्यूयार्क, टोरंटो और दिल्ली के सपने आने लगे हैं. लखनऊ अपने पुराने प्रतीक चिन्हों से भी ऊबने लगा है. चौक चौराहे पर बनी बुर्जियों ने इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि वे यातायात की नई पीढ़ी की आंखों में चुभने लगी थीं. जिनकी छांव में बैठकर इक्के-तांगे वाले सुस्ताया करते थे, उन्हीं को नई कारों ने गालियां देना शुरू कर दिया…. रास्ते में अड़ी हैं बुर्जियां, इन्हें गिरा क्यों नहीं दिया जाता? खामखां हैं यहां पर! अपनी बेइज्जती पर आंसू बहाती बुर्जियों को एक दिन सड़क चौड़ीकरण का ज़हर मिल गया. दोनों उसे पीकर परलोक सिधार गईं और अपनी जगह एक गोल चौराहे को दे गईं. लखनऊ सिमटने लगा, शहर बढ़ने लगा…. बेचारा मेडिकल कॉलेज तो अपनी पहचान ही तलाश रहा है. आखिर किस नाम से पुकारा जाए? किंग जार्ज के नाम से शुरू हुआ यह शिफाखाना खुद अपने डीएनए टेस्ट में लगा है कि आखिर कौन हूं मैं, मेरा नाम क्या है? किंग जार्ज के वंशज सन्‌ सैंतालिस में चले गए. धीरे-धीरे गांधी जी का प्रभाव और उनके प्रति आदर बढ़ा तो इस मेडिकल कॉलेज का नाम कस्तूरबा गांधी मेडिकल कॉलेज रखा गया…. चलो मेडिकल कॉलेज इस बात से खुश था कि वह केजीएमसी ही रहा. वक्त का पहिया मेडिकल कॉलेज को भी घुमाता रहा. एक दिन छत्रपति शाहू जी ने केजीएमसी को अपना नाम दे दिया. लखनऊ तो तहज़ीबी शहर है. हालांकि लखनऊ छत्रपति शाहू जी से कतई परिचित नहीं था, नाम तक नहीं सुना था, लेकिन उसने आदाब करके इस वल्दियत को भी तस्लीम कर लिया. अब केजीएमसी की तरफ कोई आंख उठाकर भी न देख सके, इसलिए खुद छत्रपति शाहू जी महाराज स्वयं प्रवेश द्वार पर खड़े हो गए. अब मच्छी भवन के अवशेष सीएसएमयू में नवीकृत हो गए. नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा. आज़ाद हिंद फौज के इस संस्थापक और जंगे आज़ादी के वीर बांकुरे को लखनऊ ने अपने सम्मान की पलकों पर उठाया और मंकी ब्रिज के पास वाले चौराहे को सुभाष चौराहा बनाया, लेकिन सामाजिक परिवर्तन की लहर ने उसे परिवर्तन चौक में तब्दील कर दिया. हम परिवर्तित होने के सिवा कर भी क्या सकते हैं? सो परिवर्तित हो गए. अगर सामान्य ज्ञान में पूछा जाए कि प्रसिद्ध बादशाह बाग़ कहां है, तो एक से एक विद्वान बगलें झांकने लगेंगे. उन्हें बगलें झांकने पर विवश होना है, क्योंकि उस बादशाह बाग़ पर विश्वविद्यालय का कब्ज़ा है और वहां कैंटीन स्थापित है. जिस बादशाह बाग़ में लखनऊ के नवाब ताजी हवा खाने के लिए शाम के वक्त तशरी़फ लाया करते थे, उसी बादशाह बाग़ में जींस-टॉप पहने लड़के-लड़कियों को एक-दूसरे का हाथ पकड़े क्लास अटेंड करते हुए देखा जा सकता है. इन नए बादशाहों को यह भी नहीं पता कि वे बादशाह बाग में रोज अपनी टेंपरेरी बेगम बदलने की फिराक में रहते हैं. एलयू में ईलू के गीत गाने वालों को अब ज़रूरत नहीं है वे कि इतिहास को संभाल कर रखें. लखनऊ का हार्ट भी धीरे-धीरे शिफ्ट हो रहा है. हार्ट ऑफ द सिटी कहे जाने वाले हजरतगंज और आसपास के इलाक़े को अब हार्ट अटैक होने लगा है, क्योंकि कारों और मोटरसाइकिलों ने यहां की सारी नसें जाम कर दी हैं, इसलिए हार्ट खिसक कर गोमती नगर जा पहुंचा है. नया लखनऊ, नया हार्ट. गोमती नगर किसी भी तरह से पुराने लखनऊ से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता. पुराना लखनऊ आसिफुद्दौला, गाजिउद्दीन हैदर और राजा टिकैत राय के संरक्षण में था, वहीं नए लखनऊ यानी गोमती नगर ने अंबेडकर और लोहिया की रियाया बनना स्वीकार किया है. लोहिया पथ से ही जाना पड़ेगा और अंबेडकर द्वार से प्रवेश कर ही गोमती नगर मिलेगा. यह नया लखनऊ पुराने लखनऊ को हिकारत से देखना चाहता है, क्योंकि इसके पास चौड़ी सड़कें हैं, शॉपिंग मॉल हैं, पब्लिक स्कूल हैं, अंबेडकर स्मारक है, लोहिया पार्क है, सहारा अस्पताल है, आलीशान मकानों का समुद्र है, बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं और छोटे-छोटे कपड़े. और पुराना लखनऊ, उसके पास है ही क्या? वही अदब, वही घिसी-पिटी तहज़ीब, वही छोटी-बड़ी दुकानें, वही इमामबाड़ा, घंटाघर, बड़े-बड़े कपड़े, का़फी बड़े दिल, एक-दूसरे के लिए खड़े रहने का जज़्बा, अपनापन और दरियादिली. लखनऊ की जेलों में बंद होने वाले कैदियों को एकरसता हो चली थी. वही जेल रोड, वही गोल चौराहा, वही स्टेशन के पीछे का इलाक़ा यानी वही सब कुछ…. हुंह…. कोई चेंज नहीं. कैदखाने में भी मोनोटोनी. कुछ चेंज होना चाहिए. ग़रीब कैदियों की पुकार सुनी गई. जेल तोड़ दी गई. कैदियों के लिए पच्चीस किलोमीटर दूर जेल बनाई गई. उन्हें भी थोड़ा अच्छा लगा…. लेकिन सवाल उठा कि जेल तोड़ तो दी गई, अब इस जगह का क्या किया जाए…. क्या खाली पड़ी रहने दी जाए? इस ज़मीन ने कहा, हमें स्मारक में बदलो. हम जेल थे, हम स्मारक बनना चाहते हैं. सो यहां पर भी एक स्मारक कांशीराम जी के नाम पर बन गया. पुराने से क्या फायदा, नया होना चाहिए.

अच्छा, अब नहर को ही ले लीजिए. अगर इसके किनारे-किनारे बुद्ध विहार बना दिया गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा. वैसे भी नहर का इस्तेमाल था ही क्या? शहर के अंदर कैसी सिंचाई? नए-नए प्रतीक चिन्हों से लखनऊ की पहचान बदल रही है, नए-नए महापुरुषों के नाम लखनऊ के आकाश पर चमकने लगे हैं. लखनऊ के एक मोहल्ले के दो सौ साल पूरे होने पर हम जश्न मनाएंगे. नवाब वाजिद अली शाह गले लगाकर इन नए महापुरुषों को अवध एवं लखनऊ की तहज़ीब, अदब, इमारतों और पहचान चिन्हों को सौंप कर एक बार फिर लखनऊ के दिल से निर्वासित होकर चले जाएंगे, क्योंकि लखनऊ का दिल शिफ्ट हो रहा है. तब हम तेज म्यूजिक की धुन पर पॉप सांग स्टाइल में गाते हुए मिलेंगे :

लखनऊ ऐसे मिटा, यूं मिटाएं लखनऊ

आसमां की क्या है ताक़त, जो बचाए लखनऊ…

आइए एक सपना देखें

हम इतिहास बनाने वालों में नहीं हैं, क्योंकि हमारे आसपास इतिहास बनाने वालों की लंबी भीड़ है. अगर हम शब्दों के द्वारा जो हो रहा है, सिर्फ उसे ही व्यक्त कर सके तो समझेंगे कि हमने पत्रकारिता के बुनियादी धर्म का पालन करने की कोशिश की है. उत्तर प्रदेश ने आजादी की लड़ाई में बहुत बड़ा योगदान दिया है. समाजवाद के भारतीय प्रतीक आचार्य नरेंद्र देव और डॉ. राम मनोहर लोहिया उत्तर प्रदेश के थे, जिनका व्यक्तित्व अंतरराष्ट्रीय था. दलित शब्द से झलकती बेबसी को बहुजन की ताकत का प्रतीक बनाने वाले मान्यवर कांसीराम ने उत्तर प्रदेश को सफल प्रयोगशाला बनाया. अयोध्या विवाद ने पहले सारे देश को मानसिक रूप से बांट दिया और अब देश को नया रास्ता तलाशने का संकेत भी दे रहा है. बुंदेलखंड, रुहेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित अवध के रंग लिए उत्तर प्रदेश बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा, चिकित्सा के अभाव से पीड़ित तो है, लेकिन विकास के लिए छटपटा रहा है. यह छटपटाहट ही नया रास्ता दिखाएगी. पत्रकारिता का दोहरा धर्म है. एक ओर उसे जनता की तकलीफें सरकार को बतानी होती हैं, दूसरी ओर सरकार द्वारा किए कामों की जानकारी जनता को देनी होती है. जनता के ऊपर सरकार द्वारा किए कामों का कैसा प्रभाव, अच्छा या बुरा या सामान्य पड़ रहा है, यह भी सरकार को बताना होता है. साथ ही यह भी कर्तव्य है कि जो सरकार में नहीं हैं, जिन्हें जनता ने विरोधी दल की भूमिका के लिए चुना है, वे अपना कर्तव्य पूरा भी कर रहे हैं या नहीं, यह भी जनता के सामने लाना होता है. हम कोशिश करेंगे कि हम इन कसौटियों पर खरे उतरें. जो भी चौथी दुनिया से जुड़ना चाहें या जानकारी देना चाहें, उनका स्वागत है. उत्तर प्रदेश की इस यात्रा में सभी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद चाहिए. हम छोटे हैं, लेकिन सपना बड़ा है. आइए साथ-साथ एक सपना देखें और उसे पूरा करने के लिए साथ-साथ चलें.

- संतोष भारतीय

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