लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, मशहूर इस्लामिक स्कॉलर एवं धर्मगुरु मौलाना कल्बे रूशैद रिजवी स्पष्ट, बेझिझक और तथ्यपरक टिप्पणियों-विचारों के लिए जाने जाते हैं. जब वह बिहार विधानसभा के वर्तमान चुनाव के पूर्व विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करके वापस पटना लौटे तो चौथी दुनिया ने उनसे राज्य की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों, चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी गठबंधन की कामयाबी-नाकामयाबी जैसे अनेक बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा क्या होगा, क्या इस बार भी मतदाता सत्ता स्थानांतरण के पक्ष में मतदान करेंगे?
निस्संदेह बिहार के लोग इस बार बदलाव के पक्ष में मतदान करेंगे. नीतीश सरकार में भ्रष्टाचार को जिस तरह से बढ़ावा मिला है और बेलगाम अफसरशाही ने जनसंवेदनाओं को जिस प्रकार रौंदा है, उससे अवाम में बड़ी नाराज़गी और आक्रोश है. मैं स्वयं बिहारी हूं, राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण करता रहता हूं, सभी समुदायों एवं जातियों के लोगों से मिलता और बातें करता रहता हूं. वर्तमान चुनाव के अवसर पर भी मैंने कई क्षेत्रों का दौरा किया. इस दौरान मैंने जो चीज शिद्दत के साथ महसूस की है, वह यह है कि लोग नीतीश कुमार की दोहरी नीतियों, जनविरोधी फैसलों एवं नीचे से ऊपर तक फैले भ्रष्टाचार से बेहद खफा हैं और इस सरकार से मुक्त होना चाहते हैं.
क्या नीतीश सरकार में राज्य का विकास नहीं हुआ है और क्या मतदाता विकास के पक्ष में मतदान नहीं करेंगे?
इस बात में कोई शंका नहीं है कि बिहार ने तऱक्क़ी की है, लेकिन समझने वाली बात यह है कि यह विकास सामान्य ढंग से होने वाला विकास है या वर्तमान नीतीश कुमार सरकार कोई जादू की छड़ी घुमाकर या अपने बलबूते पर राज्य को विकास के रास्ते पर लाई है. राज्य में जो भी काम हुए हैं, वे केंद्र सरकार की देन हैं. राज्य सरकार ने केंद्रीय राशि का पूरा और सही ढंग से उपयोग किया होता तो आज विकास की सूरत कुछ दूसरी नज़र आती. विकास के कामों के लिए राज्य को जो धनराशि मिली, उसका सिर्फ 68 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में लाया जा सका है. ऐसे में यह सरकार अगली योजना में कितनी धनराशि दिला सकेगी, यह एक बड़ा सवाल है. इसलिए इस सरकार को विकास के लिए पुरस्कृत करने के बजाय प्राप्त धनराशि का सदुपयोग न करने और राज्य को वास्तविक विकास से काफी दूर रखने की सजा दी जानी चाहिए. राज्य के समझदार मतदाता निश्चित रूप से ऐसा ही करेंगे. जनता एक विकसित और आत्मनिर्भर बिहार चाहती है और विगत 5 वर्षों के दौरान नीतीश सरकार की जो कार्यशैली रही है, क्या उससे ऐसी उम्मीद की जा सकती है? राज्य का युवा वर्ग तो वर्तमान सरकार से कुछ ज़्यादा ही मायूस है. बिहार की बागडोर संभालने के बाद नीतीश कुमार ने यह वादा किया था कि युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वह राज्य में ही सारी सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे. उन्हें शिक्षा और रोज़गार के लिए अन्य राज्यों में नहीं जाना पड़ेगा. उन्होंने यह भी दावा किया था कि राज्य के युवा वर्ग को अब दूसरे राज्यों के अपमान और नफरत का सामना नहीं करना पड़ेगा, मगर नीतीश सरकार में हुआ इसके ठीक विपरीत. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते हुए बिहार के नौजवानों को मुंबई और दूसरे शहरों में सबसे अधिक अत्याचार सहना पड़ा. मुख्यमंत्री के रूप में मात्र राजनीतिक बयानबाजी करके नीतीश चुप हो गए. उन्होंने बिहार और बिहारियों के सम्मान की बात तो जरूर की, मगर वह सम्मान दिलाने में पूरी तरह से असफल रहे. नतीजा यह है कि आज भी राज्य के बच्चे शिक्षा एवं रोजी-रोटी के लिए घर और राज्य छोड़ने पर मजबूर हैं.
विगत विधानसभा चुनाव में राज्य के मुसलमानों का मामूली झुकाव हुआ था तो नीतीश कुमार सत्तासीन हो गए थे. इस बार मुसलमानों का रुख़ क्या रहेगा?
नीतीश की पार्टी और उनका गठबंधन एनडीए, दोनों ही मुसलमानों को बेवकूफ समझते हैं. वे समझते हैं कि टोपी पहन कर मुसलमानों को टोपी पहनाई जा सकती है. आप ख़ुद सोचें कि नीतीश कुमार की हुकूमत ने 5 वर्षों के दौरान मुसलमानों के हक में क्या किया है. उन्होंने न तो मुसलमानों को सत्ता में सम्मानजनक और उचित भागीदारी दी और न पार्टी ने उन्हें इज़्ज़त दी. जो लोग उनकी पार्टी या सरकार में थोड़ी-बहुत जगह बनाने में सफल भी हुए, उन्हें अपमानित करके बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. फिर ऐसे हालात पैदा कर दिए गए, जिनकी वजह से उन्हें ख़ुद ही पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा. नरेंद्र मोदी का मुद्दा बार-बार उठाकर मुसलमानों में अपनी पैठ बनाने और सेक्युलर पहचान बनाए रखने की कोशिश की गई, मगर मुसलमानों और कल्याणकारी योजनाओं को नज़रअंदाज किया गया. नीतीश कुमार ने अपनी ही सरकार के 10 सूत्रीय अल्पसंख्यक कल्याण कार्यक्रम पर अमल नहीं किया. मुसलमानों से संबंधित केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन के प्रति वह उदासीन रहे. राज्य की दूसरी राजभाषा उर्दू को न केवल उन्होंने नुक़सान पहुंचाया, बल्कि माध्यमिक परीक्षा में इसकी अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया गया. उर्दू निदेशालय निष्क्रिय हो गया.
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