आनंद भारती को अंदर से एक ख़ास तरह का सुकून मिला. जोशी ने उन्हें थूकते देखा तो वह हतप्रभ था. वह भी जब-जब ट्रैफालगर स्न्वायर जाता था तो उसके अंदर भी कुछ इसी तरह के भाव आते थे. उसका बस चलता तो वह स्टैचू को तोड़ देता. थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप चलते रहे. अचानक आनंद भारती को लखनऊ की याद आ गई. आजादी के साठ साल बाद भी लखनऊ के लोग हैवलॉक को ढो रहे थे. उसकी याद में लखनऊ में एक रोड है. कई बार लोगों ने रोड का नाम बदलने के लिए निवेदन और आवेदन सरकार से किए, लेकिन किसी के पास समय कहां है औपनिवेशिक जुए को अपने सिर से उतार कर फेंक देने का! सब अपने-अपने धर्म और जाति के लोगों के स्टैचू लगाने में मस्त हैं. लखनऊ शहर जीता-जागता म्यूज़ियम हो गया है. यह बात दीगर है कि अंग्रेजों ने जनरल हैवलॉक की अप्रसांगिकता समझ ली थी. 2003 में लंदन के मेयर केन लिविंगस्टोन ने मूर्ति को हटाने की मुहिम चलाई थी. उनका कहना था कि हमें इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कोई प्रतीक चिन्ह इस स्न्वायर पर लगाना चाहिए, ताकि नौजवान पीढ़ी उससे प्रेरणा ले सके, लेकिन उनकी मुहिम कामयाब न हुई.
आनंद भारती सोचते हुए सोहो पहुंच चुके थे. सोहो बोले तो रेडलाइट एरिया. लंदन का रंडीखाना. छोटा-मोटा बाज़ार भी है यहां. गलियां पक्की और खुली-खुली हैं. वह चारों ओर नज़र दौड़ा रहे थे कि एक छह फुट के लंबे काले अफ्रीकी आदमी ने उनके पास आकर मुस्कराते हुए गुड ईवनिंग की. चाल-ढाल से वह दलाल लग रहा था. इशारों में उसने दोनों को टटोलने की कोशिश की. आनंद भारती ने भी उसके हर सवाल का सकारात्मक जवाब दिया. वह बोलने लगा, दुनिया के जिस देश की औरत चाहेंगे, हमारे पास है. बोल के तो देखो. वह उनके साथ चलने लगा. जोशी काले अफ्रीकी से मज़ा लेने लगा. जोशी ने उस काले से इज़रायली औरत की मांग की. उसने अपनी असमर्थता ज़ाहिर कर दी. तिस पर जोशी उससे बोला, अब तुम्हीं बता दो कि तुम्हारे पास कौन से देश की लड़की है. इज़रायली को छोड़कर आप ही बता दें. इंडिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, जहां की कहेंगे, पेश कर दूंगा. काले अफ्रीकी ने जोशी से आत्मविश्वास के लहज़े में कहा. सोहो में ओल्ड काम्पटन स्ट्रीट पर चलते हुए एक गे क्लब का बोर्ड चमका. उसके बाहर भी दो हट्टे-कट्टे काले अफ्रीकी पहरा दे रहे थे. शीशे से अंदर का नज़ारा साफ दिख रहा था. अंदर लड़के बियर पीते हुए एक- दूसरे से लपट-झपट रहे थे. शायद संगीत भी बहुत तेज बज रहा था. कुछ लड़के नाच भी रहे थे. दरवाजे बंद होने के चलते संगीत की आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी. दो कच्ची उम्र के लड़के तो एक-दूसरे होंठों में होंठ डाले मस्ती में झूम रहे थे. इस दृश्य को देखने के बाद आनंद भारती ने साथ चल रहे काले अफ्रीकी से पूछा, किसी भी देश के लड़के भी मिल सकते हैं क्या? उसने कहा, यस.
आनंद भारती को सब-कुछ अजीब सा लग रहा था. दिल्ली में भी यह सब होता है, लेकिन लुके-छिपे. समलैंगिकों को साथ रहने के अपने अधिकार के लिए आंदोलन करना पड़ता है. लेकिन यहां सब खुल्लमखुल्ला चल रहा था. दिल्ली में एक गे पार्टी में आनंद भारती जा चुके हैं. हो-हल्ले वाले संगीत के बीच एक फिरंगी उन पर भी फिदा हो गया था. उन्हें आश्चर्य हुआ था कि फिरंगी को एक दढ़ियल आदमी के अंदर क्या दिख रहा है. उस पार्टी में लड़के लिपस्टिक लगाए थे. कुछ तो लड़कियों वाली ड्रेसेज भी पहने हुए थे. नाज-नखरे भी ऐसे कर रहे थे कि बस पूछिए मत. कुछ सुंदर लड़के, जिनकी त्वचा मक्खन की तरह मुलायम थी, दूसरे लड़कों के निशाने पर थे, लेकिन वे आसानी से हाथ नहीं रख रहे थे. उनके दलाल भी थे. वे नमकीन लड़कों के लिए कस्टमरों से लेनदेन की बात कर रहे थे. जलती-बुझती रोशनी के बीच आनंद भारती ने देखा था कि एक लड़के ने अपनी स्कर्ट ऊपर कर रखी थी और पीछे से दूसरा लड़का अपनी जीन्स की चेन खोले हुए उससे चिपटा हुआ था. विचित्र प्यास थी. अजीब दुनिया थी वह.
अगले अंक में जारी…
|
|
|









