शुरू हो गया खेल के बाद का असली खेल

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राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन असफल होने या उसे रद्द किए जाने की भविष्यवाणी करने वाले लोग आज बगलें झांक रहे हैं. खेलों की शुरुआत से पहले अ़खबारों और टीवी चैनलों पर तमाम तरह की खबरें आ रही थीं कि तैयारियां पूरी नहीं हैं और लोग यह कयास लगाने लगे थे या यूं कहें कि मनाने लगे थे कि इसका आयोजन न हो. लेकिन खेलों के सफल आयोजन के बाद आज वे सारी भविष्यवाणियां ग़लत साबित हो चुकी हैं. 3 अक्टूबर को जब इन खेलों की शुरुआत हुई थी तो कई लोग आसमान टूटने की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन 14 अक्टूबर को इसके समापन तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. स्टेडियम की छतें नहीं गिरीं, न ही गंदगी के चलते कोई बीमारी फैली और न ही सुरक्षा में खामी का कोई मामला सामने आया. आतंकी हमलों की बात तो दूर, खेलगांव में परिंदा भी पर नहीं मार सका. इससे पहले मीडिया ने मानो राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के खिला़फ अभियान ही शुरू कर दिया था.

राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन से उत्साहित आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी अब एशियाड और ओलंपिक के आयोजन के लिए दावेदारी पेश करने की सोच रहे हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें पहले खुद पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से बाहर निकलना होगा. खेलों के समापन के ठीक बाद कलमाडी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया है. आश्चर्य की बात तो यह है कि दोनों ही पक्षों ने भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के खिला़फ जांच का स्वागत किया और इसमें पूरा सहयोग करने का आश्वासन भी दिया है.

मीडिया बार-बार यह बता रहा था कि खेलों की शुरुआत से पहले तैयारियां पूरी नहीं हो पाएंगी. ऐसी खबरों से घबरा कर कई देश इसमें भाग लेने से इंकार करने की धमकियां देने लगे, लेकिन अंत में राष्ट्रमंडल में शामिल सभी 71 देशों ने इसमें हिस्सा लिया. अच्छी बात यह रही कि खेलों के दौरान कोई समस्या नहीं आई, सब कुछ शांतिपूर्वक संपन्न हो गया. यदि कोई छोटी-मोटी समस्या आई भी तो लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया. रही-सही कसर भारतीय खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन ने पूरी कर दी. भारत के एथलीट जिस तरह एक के बाद एक पदक अपने नाम करते गए, आयोजन समिति के प्रति आम लोगों का गुस्सा खेलों की शुरुआत के बाद रोमांच और गर्व में तब्दील होता गया. किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि भारत 36 स्वर्ण पदकों सहित कुल 101 पदक जीतेगा और पदक तालिका में दूसरे नंबर पर रहेगा.

ओलंपिक पदक विजेता एवं फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री मणि शंकर अय्यर ने यह दावा किया था कि भारत एक भी पदक नहीं जीत पाएगा, लेकिन अब उनके पास अपने बयानों पर शर्मिंदा होने के अलावा और कोई चारा नहीं है. खेलों की शुरुआत से पहले अधूरी तैयारियों की बात तो जैसे लोग भूल चुके हैं. फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि खेलों के आयोजन के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों एवं राजनेताओं को भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के मद्देनज़र जांच का सामना करना होगा. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को पूरी दुनिया के सामने भारत की बढ़ती हैसियत के उदाहरण के रूप में पेश किया गया था, लेकिन तैयारियों में हुई देरी ने यह साबित कर दिया कि देश की नौकरशाही सरकार के शोपीस इवेंट के आयोजन में कितनी अक्षम है. हमारे सरकारी तंत्र की सारी कमज़ोरियां सतह पर आ गईं, लेकिन क्या हम इससे कोई सबक लेंगे? इस तरह के खेलों का आयोजन राष्ट्रीय गौरव की बात होती है और पूरी दुनिया के सामने देश की बढ़ती ताक़त का प्रदर्शन करने का एक ज़रिया भी, लेकिन हमारे सरकारी तंत्र ने सब कुछ गुड़-गोबर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

बहरहाल, राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन से उत्साहित आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी अब एशियाड और ओलंपिक के आयोजन के लिए दावेदारी पेश करने की सोच रहे हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें पहले खुद पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से बाहर निकलना होगा. खेलों के समापन के ठीक बाद कलमाडी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया है. आश्चर्य की बात तो यह है कि दोनों ही पक्षों ने भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के खिला़फ जांच का स्वागत किया और इसमें पूरा सहयोग करने का आश्वासन भी दिया है. शीला दीक्षित ने कहा कि शक़ की सुई आयोजन समिति की ओर घूमती है, जिसके मुखिया सुरेश कलमाडी हैं. खेलों के आयोजन के लिए केंद्र सरकार ने क़रीब 1600 करोड़ रुपये का क़र्ज़ उपलब्ध कराया था और यदि कोई अनियमितता हुई है तो वह इसी राशि के इस्तेमाल में हुई है. उन्होंने हालांकि दिल्ली सरकार के कुछ विभागों में भी भ्रष्टाचार से इंकार नहीं किया.

दूसरी ओर सुरेश कलमाडी ने कहा कि आयोजन समिति को बेवजह बलि का बकरा बनाया जा रहा है. इस आयोजन के लिए जरूरी आधारभूत संरचना का विकास सरकारी एजेंसियों को करना था. दिल्ली शहर की खूबसूरती और इसे बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की थी. आयोजन समिति का एकमात्र दायित्व खेलों का संचालन था. समिति प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त जांच समिति और अन्य केंद्रीय जांच समितियों को हरसंभव सहयोग देने के लिए तैयार है. इस बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी एजेंसियों ने आयोजन समिति के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की दोबारा जांच शुरू कर दी है. केंद्रीय एवं राज्य सेवा के सभी ऐसे अधिकारी, जिन्हें प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया था, उन्हें फिलहाल अपने पद पर बने रहने के लिए कहा गया है. आयोजन समिति के अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया है कि वह पैसों के लेनदेन से संबंधित फाइलों को पूरी तरह तैयार करें और उन्हें सुरक्षित रखें. खेलों की समाप्ति के साथ ही आयोजन समिति की गतिविधियां भी सीमित हो गई हैं. इसके कुल 1700 कर्मचारियों में से क़रीब अस्सी प्रतिशत को 30 अक्टूबर से पहले ही हटाया जा चुका है. समिति ने अपने कार्यों के संचालन के लिए एनडीएमसी से भवन किराए पर लिया था और इसके लिए वह हर माह 5.36 करोड़ रुपये बतौर किराया भुगतान कर रही थी. समिति ने अब इस भवन की तीन मंजिलें ही अपने पास रखने का फैसला किया है.

(लेखक द ट्रिब्यून के ब्यूरो चीफ रह चुके हैं)

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