असम: शांति वार्ता के लिए तैयार हो रही जमीन

प्रतिबंधित संगठन उल्फा और केंद्र सरकार के बीच शांति वार्ता के लिए सकारात्मक माहौल तैयार हो रहा है. राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि तमाम अनिश्चितता, असुविधा, मंथर गति, क़ानूनी अड़चनों के बावजूद 2011 में होने वाले असम विधानसभा चुनाव से पहले उल्फा और सरकार की बातचीत शुरू हो सकती है. बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता में वापसी, केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की विशेष तत्परता और बांग्लादेश में रह रहे उल्फा नेताओं पर बढ़ते दबाव के चलते उनके असम आगमन के बाद संकेत मिलने लगा था कि उल्फा और सरकार के बीच शांति वार्ता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. पिछले महीने असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि बांग्लादेश में रहने वाले उल्फा के अधिकांश नेता असम लौट चुके हैं और असम सरकार म्यांमार में रहने वाले उल्फा कैडरों एवं नेताओं को सेफ पैसेज देने के लिए तैयार है. गोगोई ने कहा कि अगर उल्फा या एनडीएफबी के 80 फीसदी सदस्य शांति वार्ता में शामिल होने के लिए तैयार हैं तो हमें परेश बरुआ या रंजन दैमारी की सहमति का इंतज़ार करने की कोई ज़रूरत नहीं है. केंद्रीय गृहमंत्री शांति वार्ता के लिए शर्त रख चुके हैं कि उग्रवादियों को हिंसा रोकनी होगी, हथियार डालने होंगे और संप्रभुता की मांग छोड़नी होगी.

मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि परेश बरुआ को छोड़कर उल्फा के ज़्यादातर नेता गिरफ़्तार हो चुके हैं या हथियार डाल चुके हैं. कुछ नेताओं को सेफ पैसेज दिया गया है. भीमकांत बूढ़ागोहाईं, प्रदीप गोगोई, मिथिंगा दैमारी एवं राजू बरुआ आदि नेताओं को जमानत पर रिहा कर दिया गया है. सरकार की तऱफ से वार्ता के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की कोशिश चल रही है. केंद्र और राज्य सरकार उल्फा के सेनाध्यक्ष परेश बरुआ को छोड़कर बाक़ी तमाम नेताओं को शांति वार्ता के लिए राजी कर चुकी है और ऐसा लगता है कि वार्ता की राह की सबसे बड़ी रुकावट संप्रभुता की मांग छोड़ने के लिए उल्फा के नेता सहमत हो चुके हैं. अपने नौ साल के कार्यकाल में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने शांति प्रक्रिया शुरू करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया. विधानसभा चुनाव सामने देखकर वह इसके लिए सक्रिय हुए. उनके राजनीतिक विरोधी कहते हैं कि चुनावी फायदे को ध्यान में रखकर ही गोगोई सरकार इस मसले पर गंभीरता दिखा रही है. जेल से रिहा होने के बाद उल्फा के सलाहकार 84 वर्षीय भीमकांत बूढ़ागोहाईं ने उल्फा अध्यक्ष अरविंद राजखोवा समेत तमाम नेताओं को रिहा करने की मांग की, ताकि संगठन की केंद्रीय समिति और साधारण परिषद की बैठक आयोजित कर संप्रभुता की मांग के बग़ैर शांति वार्ता के पक्ष में निर्णय लिया जा सके. उस स्थिति में परेश बरुआ को बहुमत का निर्णय स्वीकार करना पड़ेगा या अपनी जिद पर अड़े रहने के कारण अलग-थलग रहना होगा. तीन दशकों से असम में हिंसा का दौर जारी है और जनता हिंसामुक्त माहौल तैयार करने के लिए बातचीत पर जोर देती रही है. जाने-माने बुद्धिजीवी डॉ. हीरेन गोहाईं जेल में बंद उल्फा नेताओं से मिलकर वार्ता के लिए ज़मीन तैयार करते रहे हैं. उनके नेतृत्व में ही वार्ता के पक्ष में एक सम्मेलन आयोजित हो चुका है. दूसरी तऱफ इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख पी सी हालदार को केंद्र की तऱफ से मध्यस्थ बनाया गया है. हालदार कई बार जेल में बंद उल्फा नेताओं से बातचीत कर चुके हैं. वार्ता के समर्थन में गठित संस्था जातीय अभिवर्तन के मुख्य संयोजक डॉ. हीरेन गोहाईं सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि शांति प्रक्रिया की रुकावटें दूर हो गई हैं और वार्ता शुरू होने की संभावना नज़र आने लगी है.

मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हालदार को जहां वार्ता की शर्तों का निर्धारण करना होगा, वहीं जेल में बंद उल्फा नेताओं की रिहाई का रास्ता भी सुगम बनाना होगा. परेश बरुआ के बिना वार्ता को सही अंजाम तक पहुंचा पाना कितना आसान होगा, यह तो व़क्त ही बताएगा, लेकिन सरकार को यक़ीन हो चला है कि उल्फा सेनाध्यक्ष अपने संगठन के अधिकतर नेताओं से अलग-थलग पड़ गए हैं और उनकी स्थिति कमज़ोर हो चुकी है.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, परेश बरुआ चीन और म्यांमार के बीच आवाजाही कर रहे हैं और कहीं भी निश्चित ठिकाना बना पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं. उन्हें पाकिस्तान या बांग्लादेश में भी ठिकाना नहीं मिल पा रहा है.

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि अगर उल्फा संप्रभुता की मांग छोड़ देता है तो उसकी अन्य मांगों पर बातचीत करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए. कश्मीर में मध्यस्थों के ज़रिए बातचीत चल रही है और अलगाववादियों की हर मांग पर वार्ता की नीति अपनाई जा रही है. नगा उग्रवादियों के संगठन एनएससीएन के साथ भी मध्यस्थों के ज़रिए कई वर्षों से बातचीत चल रही है. असम की जनता उल्फा समेत तमाम उग्रवादी संगठनों के साथ शांति वार्ता शुरू करने के पक्ष में है, ताकि राज्य में अमन-चैन क़ायम हो सके और रक्तपात का सिलसिला बंद हो.