
भारत में टेनिस के खेल की एक खासियत रही है. यहां ऐसे खिलाड़ी कम ही पैदा हुए हैं, जो विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकें, लेकिन हर दौर में कम से कम एक खिलाड़ी ज़रूर रहा है, जो अपनी उपलब्धियों से हमें गौरव का एहसास कराता रहा है. पहले रामनाथ कृष्णन, फिर रमेश कृष्णन एवं विजय अमृतराज और उसके बाद लिएंडर पेस एवं महेश भूपति. बीच में सानिया मिर्ज़ा भी आईं, लेकिन उनकी उम्मीदों का सितारा चमकने से पहले ही रास्ते से भटक गया. अब जबकि लिएंडर पेस एवं महेश भूपति अपने करियर के आख़िरी पड़ाव पर हैं, सानिया कोर्ट से ज़्यादा अपना परिवार बसाने में व्यस्त हैं, ऐसे में भारतीय टेनिस प्रेमियों के दिल में एक ही सवाल कौंध रहा था कि अंतरराष्ट्रीय टेनिस में भारत का अगला झंडाबरदार कौन होगा? पिछले एक साल के प्रदर्शन पर ग़ौर करें तो सोमदेव देवबर्मन ने एक नई उम्मीद पैदा की है. हालांकि एटीपी रैंकिंग में वह अभी भी टॉप 100 से बाहर हैं, लेकिन हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों और खासकर कॉमनवेल्थ एवं एशियाई खेलों में उनके प्रदर्शन को देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि आने वाले दिनों में भारतीय टेनिस नायकविहीन नहीं रहेगा.
पहले राष्ट्रमंडल खेल में सिंगल्स का स्वर्ण पदक और फिर एशियाई खेलों में सिंगल्स और डबल्स में दोहरा स्वर्ण पदक, सोमदेव देवबर्मन भारतीय टेनिस केलिए नई उम्मीद बन कर आए हैं, लेकिन उन्हें अभी लंबा सफर तय करना है.
25 वर्षीय सोमदेव देवबर्मन को टेनिस जगत में पहली बार ख्याति तब मिली, जब वह अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया में लगातार तीन बार एनसीएए सिंगल्स चैंपियनशिप में जगह बनाने में कामयाब रहे और लगातार दो बार खिताब अपने नाम किया. टूर्नामेंट के 124 सालों के इतिहास में यह उपलब्धि हासिल करने वाले वह केवल तेरहवें खिलाड़ी थे. पेशेवर टेनिस में उनका पहला पड़ाव न्यूयॉर्क का रोसेस्टर फ्यूचर्स टूर्नामेंट था, जिसमें सिंगल्स और डबल्स (ट्रीट हुई के साथ मिलकर) खिताब उन्होंने जीता. इसके एक सप्ताह बाद ही पिट्सबर्ग फ्यूचर्स टूर्नामेंट में भी वह सिंगल्स और डबल्स चैंपियन बने. साल 2009 के चेन्नई ओपन में वह पहली बार किसी एटीपी टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंचने में कामयाब रहे, हालांकि खिताबी मुक़ाबले में उन्हें क्रोशिया के मारिन सिलिक से मात खानी पड़ी. इसके बाद साल 2009 के अधिकांश टूर्नामेंटों में उनका प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया. अधिकांश ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों तो वह मुख्य ड्रॉ में भी जगह नहीं बना पाए. साल 2010 की शुरुआत भी उनके लिए कुछ खास नहीं रही. फ्रेंच ओपन और यूएस ओपन के पहले राउंड में ही उन्हें पराजित होना पड़ा, हालांकि जोहान्सबर्ग में हुए साउथ अफ्रीका ओपन के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचने में वह सफल रहे.
सोमदेव के खेल का असली रंग तब देखने को मिलता है, जब वह भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं. इसकी पहली झलक 2009 के डेविस कप में देखने को मिली, जब उन्होंने चाइनीज ताइपे के ख़िला़फ भारत को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई.
सोमदेव के खेल का असली रंग तब देखने को मिलता है, जब वह भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं. इसकी पहली झलक 2009 के डेविस कप में देखने को मिली, जब उन्होंने चाइनीज ताइपे के ख़िला़फ भारत को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इस मुक़ाबले के रिवर्स सिंगल्स में उन्होंने एटीपी रैंकिंग में 59वें स्थान के खिलाड़ी येन हसून लू को हराया. साल 2010 में ब्राजील के ख़िला़फ डेविस कप मुक़ाबले में भारतीय टीम की जीत में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस साल अक्टूबर में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की सिंगल्स स्पर्धा में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ग्रेग जोन्स को सीधे सेटों में हराकर स्वर्ण पदक जीता. उनकी इस जीत को ज़्यादा अहमियत नहीं दी गई, क्योंकि शीर्ष स्तर के अधिकांश खिलाड़ी इन खेलों से नदारद थे. लेकिन सोमदेव ने इसकी कसर ग्वांगझू में हुए एशियाई खेलों में दोहरा स्वर्ण पदक जीतकर पूरी कर दी. उन्होंने पहले सनम सिंह के साथ मिलकर पुरुष डबल्स का स्वर्ण पदक जीता और इसके अगले ही दिन उजबेकिस्तान के डेनिस इस्तोमिन को हराकर सिंगल्स का स्वर्ण पदक भी अपने नाम कर लिया. एशियाड की जीत इसलिए ज़्यादा महत्वपूर्ण थी, क्योंकि एशियाई देशों के सभी शीर्ष खिलाड़ी इसमें भाग ले रहे थे और सोमदेव ने ख़ुद से ऊंची रैंकिंग के खिलाड़ियों को पराजित कर स्वर्णिम ताज हासिल किया. ख़ुद सोमदेव भी मानते हैं कि जब देश के प्रतिनिधित्व की बात आती है तो उनके प्रदर्शन का स्तर बढ़ जाता है. सोमदेव यदि रमेश कृष्णन, विजय अमृतराज और लिएंडर पेस जैसे खिलाड़ियों के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं तो उनके सामने चुनौतियां बड़ी हैं. अपने करियर के शीर्ष पर रमेश कृष्णन एटीपी रैंकिंग में 23वें स्थान तक पहुंचे थे, जबकि विजय अमृतराज 16वें स्थान तक पहुंचने में कामयाब रहे थे. इन दोनों खिलाड़ियों ने केवल डेविस कप में ही नहीं, बल्कि ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों में भी शीर्ष स्तरीय खिलाड़ियों को कई बार हराया था. इंडियन एक्सप्रेस के नाम से मशहूर लिएंडर पेस और महेश भूपति हालांकि सिंगल्स से ज्यादा सफल डबल्स में रहे हैं और एटीपी की डबल्स रैंकिंग में विश्व के शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल रहे हैं, लेकिन पेस अपने करियर के शुरुआती दिनों में सिंगल्स मुकाबलों में भी प्रभावशाली प्रदर्शन करने में कामयाब रहे थे. रमेश कृष्णन और लिएंडर पेस जूनियर रैंकिंग में विश्व के नंबर एक खिलाड़ी रह चुके हैं. इनके मुकाबले सोमदेव सिंगल्स में 94वें स्थान तक पहुंचने में ही सफल रहे हैं. वह इस रैंकिंग को भी ज्यादा दिनों तक बनाए नहीं रख सके और जल्द ही शीर्ष 100 यिों की सूची से बाहर हो गए. उन्हें यदि इन महान खिलाड़ियों की तर्ज पर अंतरराष्ट्रीय टेनिस में खास मुकाम हासिल करना है तो उन्हें खेल के सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमता को बढाना होगा. टेनिस कोर्ट में उन्हें रक्षात्मक शैली का खिलाड़ी माना जाता है और उन्हें अपनी आक्रामकता बढानी होगी. अपनी सर्विस में सुधार के साथ-साथ अलग-अलग कोर्ट पर खेलने में महारत हासिल करनी होगी.
हालांकि साल 2010 उनके लिए अच्छे परिणाम लेकर आया है और उनसे उम्मीदें भी बढ़ गई हैं, लेकिन वह किसी जल्दी में नहीं हैं. उनका मानना है कि उनका काम मेहनत करना है और इसमें वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते, बाकी चीजें काफी हद तक क़िस्मत पर निर्भर करती हैं. इससे यह पता चलता है कि कामयाबी के बावजूद उनके पैर ज़मीन पर हैं. युवा खिलाड़ी अक्सर शुरुआती कामयाबियों के बाद अपने रास्ते से भटक जाते हैं, क्योंकि सफलता के साथ आने वाले पैसे, प्रतिष्ठा और दबाव को बर्दाश्त करने के लिए वह मानसिक रूप से तैयार नहीं होते. हम सानिया मिर्ज़ा का हश्र देख चुके हैं. भारत की टेनिस प्रेमी जनता को सोमदेव से काफी उम्मीदें हैं. हालिया सफलताओं के बाद भारतीय टेनिस को आगे ले जाने की बड़ी ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर है. उन्हें ग़लतियों से बचना होगा और लगातार कड़ी मेहनत करनी होगी. यदि वह ऐसा करने में कामयाब हुए तो सोमदेव वास्तव में भारतीय टेनिस के अगले सूर्य हो सकते हैं.
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