
दून स्कूल का शीर्ष प्रबंधन इस बात को लेकर चिंता में है कि स्कूल के बच्चों के शिक्षण में कौन सी वर्गीय-खोट है जो कोबाड गांधी को पैदा करती है. दून स्कूल के उच्च वर्गीय चरित्र पर कोबाड गांधी एक सवाल की तरह चस्पा है, जिसने उच्च वर्ग में पैदा होते हुए भी उच्च कुलीन वर्ग का चरित्र नहीं अपनाया और शोषितों-उत्पीड़ितों के हित के संघर्ष के लिए अपना जीवन अति-वामपंथ को न्यौछावर कर दिया. लेकिन दून स्कूल के प्रोडक्ट के रूप में निकले कोबाड गांधी ने स्कूल प्रबंधन के उच्च वर्गीय चरित्र को ज़रूर हिला कर रख दिया है. अब स्कूल के माहौल और छात्रावासों के माहौल को सूक्ष्म निगरानी में रखा जा रहा है कि कहीं अति-वामपंथ का ग्लैमर बच्चों में तो नहीं घर करता जा रहा है. स्कूल प्रबंधन के सूत्र तो यह भी बताते हैं कि स्कूल में नियुक्त होने वाले शिक्षकों व अन्य स्टाफ की पृष्ठभूमि पर भी ग़ौर फरमाया जाने लगा है. दून स्कूल की ग़ौरवशाली पृष्ठभूमि में कोबाड गांधी का नाम भी अवश्य जुड़ता है. भले ही आप कोबाड गांधी के अपनाए हुए रास्ते को लेकर सैद्धांतिकअसहमति रखते हों. राजनीतिक सोच, कार्यशैली और व्यक्तित्व परस्पर विरोधी होने के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और प्रख्यात नक्सली नेता कोबाड गांधी में समानता है. ये सब दून स्कूल के ही पढ़े लिखे हैं. विश्व प्रसिद्ध काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और पूर्व केंद्रीय मंत्री कर्ण सिंह भी दून स्कूल की देन हैं. उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर, केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, केंद्रीय मंत्री जतिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री अरुण सिंह, पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय दिनेश सिंह और भी न जाने कितनी विख्यात हस्तियों का नाम इससे जुड़ा हुआ है. लेकिन कोबाड गांधी ने दून स्कूल के इस इतिहास में अपने नाम का अध्याय ही जोड़ दिया. महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित जन गण मन… को 1935 में ही अपना गान चुनने वाला दून स्कूल स्थापना के 75वें वर्ष में अब खुद की जय हो… की नए सिरे से तलाश शुरू कर दी है. दून स्कूल की धुन यह भी है कि अब वहां के प्रोडक्ट राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कैनवास पर अपनी छाप क्यों नहीं छोड़ रहे. दून स्कूल से निकलने वाले भारतीय राजनीतिज्ञों की अगर लंबी चौड़ी लिस्ट है तो पाकिस्तानियों में भी इसका आकर्षण कम नहीं रहा है.
पाकिस्तान के पूर्व मंत्री खान मोहम्मद अली, स्वात के वली मियांगुल औरंगजेब, पंजाब के पूर्व गवर्नर लेफ्टिनेंट जनरल गुलाम जिलानी ने यहीं तालीम हासिल कर ज़िंदगी के मोर्चे पर फतह हासिल की. नौकरशाही में तो दून स्कूल का दबदबा है. इस स्कूल से अनुशासन का पाठ प़ढकर निकलने वालों में प्रमुख रूप से स्वर्णजीत सेन पूर्व डीजीपी आंध्रप्रदेश, पीपी शर्मा मुख्य सचिव झारखंड, विनोद कुमार ग्रोवर, दिलीप मेहता, केपी शंकर मेनन, नागेंद्र नाथ झा, उमा शंकर वाजपेई, महेश्वर दयाल, अशोक बी. गोखले, वजाहत हबीबुल्लाह, इंदरपाल खोसला व रामचंद्र साठे शामिल हैं. देहरादून की हरी-भरी वादियों में स्थित दून स्कूल का नाम शुरू से ही देश के सबसे प्रतिष्ठित निज़ी स्कूलों में लिया जाता रहा है. इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि बच्चे के पैदा होने के साथ ही अभिभावक उसका पंजीकरण इस स्कूल के लिए करा देते हैं. वायसराय ऑफ इंडिया की कार्यपरिषद के सदस्य अधिवक्ता सतीश रंजन दास ने सन 1935 में दून स्कूल की स्थापना की थी. स्कूल के लिए क़रीब 70 एकड़ में फैले चांदबाग एस्टेट को खरीदा गया. इसी स्थान पर भव्य दून स्कूल का निर्माण किया गया. सतीश रंजन दास स्वतंत्रता सेनानी चितरंजन दास व भारत के मुख्य न्यायाधीश सुधि रंजन दास के भाई थे. इस विद्यालय के पहले प्रधानाध्यापक आर्थर ई फुट बनाए गए. वे ब्रिटेन के एटान स्कूल के विज्ञान शिक्षक थे. वे इससे पहले भारत कभी नहीं नहीं आए थे. उन्होंने सबसे पहले जेके मार्टिन को उप प्रधानाध्यापक नियुक्त किया. छात्रों के सार्वभौमिक विकास के लिए अंग्रेजी पब्लिक स्कूल की तर्ज़ पर इस स्कूल में भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा दी जाती है.
इससे पहले 1928 में इंडियन कंपनी एक्ट के तहत इंडियन पब्लिक स्कूल सोसाइटी का गठन किया गया. इसी के अधिकार क्षेत्र में दून स्कूल की स्थापना की गई. यह स्कूल बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के जरिए संचालित होता है. रवींद्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित जन गण मन… को 1935 में ही विद्यालय ने अपना गान चुन लिया था. बाद में सन 1946 में भारत ने इसे राष्ट्रगान के लिए चुना. इस विद्यालय का उद्देश्य भारतीय युवाओं को उदारवादी शिक्षा प्रदान करना है जिससे उनमें धर्मनिरपेक्षता, अनुशासन व समानता के सिद्धांतों के प्रति आदर भाव जागृत हो सके. इसी शिक्षा का प्रभाव रहा कि दून स्कूल ने देश को सैन्य अधिकारियों की बड़ी फौज भी दी. पाकिस्तानी नौकरशाही में भी दून स्कूल से शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों का वर्चस्व है. उद्यमियों में कई ऐसी हस्तियां हैं जो दून स्कूल का पूर्व छात्र कहलाने में गौरव महसूस करती हैं. दून स्कूल ने केवल राजनीतिज्ञ, सैन्य अधिकारी, उद्यमी ही देश को दिए हैं तो यह कहना ग़लत होगा. कला, संस्कृति, शिक्षा के क्षेत्र में इस विद्यालय की दखल बहुत गहराई तक है.
वर्ष 2008 में एजुकेशन वर्ल्ड द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में इस विद्यालय को भारत में सबसे सम्मानित आवासीय विद्यालय का दर्ज़ा दिया गया. दून स्कूल में कक्षा सात व आठ में प्रवेश के लिए पंजीकरण होते हैं. पंजीकरण के बाद दाखिले प्रवेश परीक्षा के जरिए होते हैं. बच्चे की जितनी अधिक उम्र होती है उसका पंजीकरण शुल्क बढ़ता जाएगा. पंजीकरण फार्म दून स्कूल की वेबसाइट से डाउनलोड कर सकते हैं. इसके साथ एक हज़ार रुपये की प्रोसेसिंग फीस लगानी होगी. इसके साथ ही फार्म एक हज़ार रुपये का ड्राफ्ट दून स्कूल के हेडमास्टर के नाम भेजकर भी प्राप्त किया जा सकता है. इसके साथ 50 रुपए पोस्ट ऑफिस शुल्क भी भेजना होगा. स्कूल में प्रत्येक एकेडमिक ईयर में दो टर्म की पढ़ाई होती है. पहला टर्म स्प्रिंग टर्म जो कि एक फरवरी से शुरू होकर 31 मई तक चलता है. इसके बाद दूसरा टर्म ऑटम टर्म पहली अगस्त से शुरू होकर 30 नवंबर तक चलता है. दून स्कूल में आईसीएसई व आईएससी बोर्ड के साथ ही इंटरनेशनल बैक्यालॉरिएट (आईबी) से पढ़ाई होती है. आईबी डिप्लोमा उन युवाओं के लिए का़फी ़फायदेमंद होती है जो विदेशों में जाकर आगे की पढ़ाई करते हैं.
दून स्कूल की फीस
पंजीकरण शुल्क
0-3 वर्ष 11,000
3-5 वर्ष 14,000
5-6 वर्ष 16,500
7-8 वर्ष 21,000
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