प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी के एक बयान ने देश में एक नए विवाद की शुरुआत कर दी है. गिलानी ने 1972 में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा स्कूलों एवं कॉलेजों के राष्ट्रीयकरण के फैसले को ग़लत क़रार दिया तो देश में शिक्षा की मौजूदा हालत से निराश लोगों ने उनकी हां में हां मिलानी शुरू कर दी. वहीं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के समर्थक अपने नेता के समर्थन में उतर आए. बयान से शुरू हुए इस विवाद में दोनों पक्ष दो ध्रुवों में बंट चुके हैं, लेकिन यह बात स्पष्ट है कि अधिकांश लोग उन परिस्थितियों से पूरी तरह अंजान हैं, जिनमें शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीयकरण की नीति को अंजाम दिया गया था. उन्हें उन कारणों की भी जानकारी नहीं है, जिनके चलते इस नीति के इतने गंदे परिणाम आज हमारे सामने हैं. मौजूदा दौर में जीवन के हर क्षेत्र में बाज़ारवाद हावी है, राज्य की भूमिका सीमित होती जा रही है. सामाजिक क्षेत्र में इसका असर यह होता है कि ग़रीब और कमज़ोर तबके के लोगों को उनके अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है और इसके लिए किसी को कोई अफसोस भी नहीं होता. कितने दु:ख की बात है कि गिलानी के बयान के पक्ष-विपक्ष में बोलने वाले लोगों ने भुट्टो की राष्ट्रीयकरण की नीति के ऐतिहासिक एवं सैद्धांतिक पहलुओं को समझने की कोशिश नहीं की, न ही यह समझने का प्रयास किया कि उन्होंने इसे क्यों लागू किया और इसकी असफलता की वजहें क्या रहीं. आज जब इसे एक ग़लती क़रार दिया जाता है तो इसकी सबसे बड़ी वजह शायद मौजूदा समय में देश में सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों की ख़राब हालत है.
लेकिन इसका मतलब यह है कि राष्ट्रीयकरण से पहले पाकिस्तान का शिक्षा तंत्र पूरी तरह चाक-चौबंद था. जबकि सच्चाई यह है कि शिक्षा व्यवस्था में उस समय भी तमाम तरह की खामियां थीं, हालांकि उनका स्वरूप थोड़ा अलग था. इन खामियों का उपाय तलाशना ज़रूरी था, लेकिन ये उपाय तभी प्रभावी हो सकते थे, जब उन्हें ढंग से लागू किया जाता और राष्ट्रीयकरण की नीति के साथ ऐसा नहीं हो सका. 1972 से पहले तक देश में सार्वजनिक शिक्षा क्षेत्र, कम से कम स्कूल स्तर पर, निजी क्षेत्र से कहीं ज़्यादा विस्तृत था. उस समय देश भर में निजी क्षेत्र में एक भी विश्वविद्यालय नहीं था. सरकारी स्कूलों की हालत बहुत अच्छी तो नहीं कही जा सकती,
लेकिन संतोषजनक ज़रूर थी. इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का प्रदर्शन भी ठीकठाक रहता था, लेकिन उस दौर में शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या उसका संकुचित स्वरूप था. सरकारी स्कूलों के नेटवर्क के विस्तार की गति धीमी थी और यह तेजी से बढ़ती जनसंख्या की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफी था. सरकारी शिक्षण संस्थानों की पहुंच समाज के सभी वर्गों तक नहीं थी और निजी क्षेत्र इसकी भरपाई करने में सक्षम नहीं था. दूसरी समस्या यह थी कि कुछेक अपवादों को छोड़कर निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थान कुप्रबंधन के शिकार थे. शिक्षकों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता था और भ्रष्टाचार चरम पर था. 1969 में कराची डिवीज़न के कमिश्नर ने कराची के निजी कॉलेजों की हालत की जांच-पड़ताल के लिए एक कमेटी का गठन किया था. कमेटी को इन कॉलेजों में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था का पता लगाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी और उसकी रिपोर्ट चौंकाने वाली थी.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि इन संस्थानों में शिक्षकों को समय पर वेतन नहीं मिलता, कई बार उन्हें कई महीनों तक तनख्वाह नहीं मिलती. इतना ही नहीं, उन्हें जितना वेतन दिया जाता है, उससे ज़्यादा रकम पर उनके दस्तखत ले लिए जाते हैं. कमेटी ने एक ऐसे कॉलेज का उदाहरण भी दिया था, जहां एक पार्टटाइम शिक्षक प्रिंसिपल का काम कर रहा था. इसके अलावा अयोग्य शिक्षकों की बहाली की प्रथा भी काफी प्रचलित थी. कुछ ऐसी ही रिपोर्ट हमूदूर रहमान कमीशन ने भी दी थी, जिसे अयूब खां के जमाने में विश्वविद्यालयों में व्याप्त अशांति के कारणों का पता लगाने के लिए गठित किया गया था. उस समय वेस्ट पाकिस्तान कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष रहीं अनीता गुलाम अली पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि साल 1970 में एसोसिएशन ने भुट्टो को अपनी मांगों की एक सूची भेजी थी. अन्य बातों के अलावा इसमें सरकार से यह मांग की गई थी कि निजी कॉलेजों के शिक्षकों को सरकार ख़ुद वेतन दे और इन संस्थानों पर नज़र रखने के लिए एक नियामक संस्था गठित की जाए.
राष्ट्रीयकरण व्यवस्था की इन कमज़ोरियों को दूर करने में सफल नहीं रहा. लेकिन इसकी वजह यह नहीं थी कि सरकार इसके आर्थिक भार को ढोने में सक्षम नहीं थी, जैसा कि अक्सर लोग मानते हैं. इसका असल कारण इस नीति का कमज़ोर कार्यान्वयन और ख़राब प्रबंधन था, जिसकी आगोश में निजी शिक्षण संस्थान पहले से ही थे. राष्ट्रीयकरण के बाद इन संस्थानों के योग्य और अनुभवी शिक्षकों की जगह सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थकों को भर दिया गया. यह बात पहले से ही स्पष्ट है कि विचारधारात्मक प्रतिबद्धता योग्यता का विकल्प नहीं हो सकती. सही अर्थों में देखा जाए तो स्कूलों के राष्ट्रीयकरण में कोई बुराई नहीं थी, बुराई इसके क्रियान्वयन में थी, जिसने शुरुआत में ही इसे नकारा बना दिया.
ऐसा भी नहीं था कि सरकार राष्ट्रीयकरण के चलते बढ़े आर्थिक बोझ को ढोने में अक्षम थी. इससे पहले भी सरकार निजी शिक्षण संस्थानों को सब्सिडी उपलब्ध करा रही थी, ताकि वे समाज के हर तबके तक पहुंच सकें. अब यह बात और है कि इसका ज़्यादातर हिस्सा इन संस्थानों के मालिकों की जेबों में चला जाता था. राष्ट्रीयकरण के बाद सब्सिडी को ख़त्म कर दिया गया और उसके बाद फिर कभी दोबारा लागू नहीं किया गया.
1972 से पहले हो या मौजूदा दौर, समय की ज़रूरत यही है कि निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों को नियमित किया जाए और इसके साथ-साथ सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों का विस्तार किया जाए. इसके लिए प्रबंधन व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और यही वजह है कि जियाउल हक के जमाने में निजी क्षेत्र को दोबारा पटरी पर लाने के लिए राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया वापस लेने की शुरुआत हुई तो भी इसका कुछ खास फायदा नहीं हुआ.
आज भी जबकि निजी शिक्षण संस्थानों का तेजी से विकास हो रहा है और देश भर के एक-तिहाई से भी ज़्यादा छात्र इनमें पढ़ रहे हैं, स्थिति में ज़्यादा बदलाव नहीं आया है. सच तो यह है कि देश के शिक्षा तंत्र की हालत बहुत ही ख़राब है. निजी क्षेत्र सस्ती दरों पर शिक्षा उपलब्ध नहीं करा सकता, क्योंकि उसका एकमात्र उद्देश्य अपने निवेश पर लाभ कमाना है. न ही वह दूरदराज के कम आय वाले इलाक़ों में अपना विस्तार करेगा.
यह काम सरकार ही कर सकती है, क्योंकि उसके पास ही इसके लिए संसाधन मौजूद हैं और यह सरकार की राजनीतिक मजबूरी भी है.
राष्ट्रीयकरण की नीति की खामी यह थी कि इसे पेशेवर रूप से लागू नहीं किया गया. गिलानी इस बात को जितनी जल्दी समझ लें, पाकिस्तान के लिए उतना ही अच्छा है. उच्चस्तरीय शिक्षा उपलब्ध करा रहे बड़े-बड़े निजी शिक्षण संस्थानों के विकास से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. अधिकांश बच्चे, जिन्हें शिक्षा की ज़रूरत है, वे कम आय वाले परिवारों से ताल्लुक रखते हैं, जो निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का ख़र्च नहीं उठा सकते. इसके बावजूद सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बचने की कोशिश में निजी क्षेत्र के साथ भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ रही है. पूरी दुनिया में अधिकांश जगहों पर शिक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है और वह अपनी इस ज़िम्मेदारी को भलीभांति निभा भी रही है. भुट्टो की राष्ट्रीयकरण नीति की आलोचना करके गिलानी संभवत: शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की ज़िम्मेदारी को कम करने का बहाना ढूंढ रहे हैं.
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