कश्मीरियों की व्यथा कब तक अनसुनी की जाएगी

अरुंधति राय के इस वक्तव्य कि कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा नहीं है, पर काफी बवाल मचा. भाजपा ने मांग की कि अरुंधति के ख़िला़फ देशद्रोह का मुक़दमा क़ायम किया जाना चाहिए. भाजपा महिला मोर्चा के सदस्यों ने उनके दिल्ली स्थित निवास में तोड़फोड़ की और बजरंग दल ने उन्हें कई तरह की धमकियां दीं. इस वक्तव्य ने कई वर्गों को नाराज़ किया और अरुंधति को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किए जाने की चर्चा कई दिनों तक चलती रही. अलग-अलग कारणों से, कश्मीर हमारे देश की जनता के एक बड़े हिस्से की दुखती रग बन गया है. कश्मीर समस्या का हल क्या हो, इस बारे में हमारे अरुंधति राय से मतभेद हो सकते हैं और प्रजातंत्र में ऐसे मतभेद पूरी तरह जायज़ भी हैं, परंतु इस मामले में दो तथ्यों को हम सभी को स्वीकार करना होगा. पहला यह कि कश्मीर का भारत में विलय कभी नहीं हुआ. कश्मीर केवल भारत का हिस्सा बना और वह भी इस शर्त पर कि रक्षा, मुद्रा, विदेशी मामलों और संचार को छोड़कर अन्य सभी मामलों में उसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त रहेगी. दूसरा यह कि कश्मीर मामले पर अरुंधति के बयानों, लेखों एवं भाषणों से कश्मीरियों की व्यथा से परिचित होने में हमें मदद मिली है. अरुंधति पर किए जा रहे हमले संबंधित लोगों की कश्मीर के भारत का हिस्सा बनने के इतिहास के बारे में अज्ञानता को प्रतिबिंबित करते हैं. धर्म आधारित राष्ट्रवाद के पैरोकार, कुछ बुद्धिजीवी एवं आमजन एक प्रकार की देशभक्ति की भावना के वशीभूत होकर यह मानते हैं कि भारत के लिए अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार करना सबसे महत्वपूर्ण है, भले ही इसके लिए कश्मीरियों की समस्याओं को दरकिनार क्यों न करना पड़े.

कश्मीर की समस्या जटिल है, जिसका कोई आसान हल दिखाई नहीं देता. इसका एक कारण यह है कि इस मामले से कई पक्षों के हित जुड़े हुए हैं. इनमें शामिल हैं अमेरिका समर्थित पाकिस्तानी सेना, कश्मीर की आम जनता, वहां के अतिवादी, भारतीय सेना, भारत सरकार एवं कश्मीर के राजनीतिक दल और नेता. कश्मीरियों ने अतिवादियों और सेना, दोनों के घोर अत्याचार सहे हैं. उनके दु:ख और व्यथा को समझना ज़रूरी है. संवाद तो आवश्यक है ही, सेना की उपस्थिति भी कम की जानी चाहिए.

कश्मीर भारत में कैसे मिला? हम सभी को मालूम है कि स्वतंत्रता के समय देश में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे. इनमें से जूनागढ़, कश्मीर एवं हैदराबाद को छोड़कर शेष सभी भारत में विलय के लिए सहर्ष राजी हो गए. देश के विभाजन के समय राजे-रजवाड़ों को यह स्वतंत्रता दी गई थी कि वे या तो भारत या फिर पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं, परंतु इस मामले में निर्णय लेने से पहले वे अपनी जनता की भावनाओं और अपनी भौगोलिक स्थिति का ख्याल रखें. जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद के शासकों द्वारा अपने राज्यों का भारत में विलय न करने के पीछे उनकी अलग-अलग सोच थी. जूनागढ़ के नवाब पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे. हैदराबाद के निजाम या तो स्वतंत्र बने रहना चाहते थे अथवा पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते थे. इसका कारण यह था कि पाकिस्तान ने देशी रियासतों के शासकों को अधिक शक्तियां देने का वादा किया था. भौगोलिक दृष्टि से जूनागढ़ और हैदराबाद का पाकिस्तान में विलय मुश्किल था, क्योंकि वे पाकिस्तान की सीमा से बहुत दूर स्थित थे. दूसरी बात यह कि इन दोनों राज्यों की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी. सैन्य बल का इस्तेमाल करके इन दोनों राज्यों को भारत में अपना विलय करने के लिए मजबूर कर दिया गया. इस तरह यह अध्याय बंद हुआ. अब बचा कश्मीर. कश्मीर की स्थिति इन दोनों राज्यों से अलग थी. उसकी सीमाएं भारत और पाकिस्तान दोनों से मिलती थीं. कश्मीर की 80 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी और वहां के निवासियों के लंबे समय से उन इलाक़ों में संपर्क-संबंध थे, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गए थे. कुल मिलाकर कश्मीर द्विराष्ट्र सिद्धांत के पैरोकारों का स्वर्ग था.

कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने भारत या पाकिस्तान दोनों में विलय करने से इंकार कर दिया. पाकिस्तानी सैनिकों ने कबाइलियों का वेश धरकर कश्मीर में वही करने की कोशिश की, जो भारतीय सेना ने हैदराबाद और जूनागढ़ में किया था, परंतु कश्मीर के मामले में अंतर यह था कि वहां नेशनल कांफ्रेंस का व्यापक प्रभाव था और उसके नेता शेख अब्दुल्ला पाकिस्तानी शासक वर्ग की सामंती सोच से अच्छी तरह वाक़ि़फ थे. कश्मीर पर हमला होते ही महाराजा हरी सिंह अपनी जान बचाने के लिए जम्मू भाग गए और उन्होंने अपने एक दूत को दिल्ली भेजकर भारत सरकार से मदद मांगी. भारत सरकार चाहती थी कि अपनी सेना भेजने से पहले वह कश्मीर के साथ किसी तरह का समझौता कर ले. इन परिस्थितियों में कश्मीर के साथ इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें रक्षा, संचार, मुद्रा एवं विदेशी मामलों को छोड़कर अन्य सभी मामलों में कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता दी गई. इसके बाद भारतीय सेना कश्मीर पहुंची, परंतु तब तक पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद युद्ध विराम हो गया. कश्मीर में चुनाव हुए, जिसमें शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री नहीं) चुने गए.

पंडितों सहित सभी कश्मीरियों की व्यथा समझने के लिए हमें यह भी जानना ज़रूरी है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के ज़रिए कश्मीर इलाक़े पर अपना प्रभाव जमाने का षड्‌यंत्र किया. इसका कश्मीर के भविष्य के घटनाक्रम पर गहरा असर पड़ा. कश्मीर अमेरिका की कम्युनिस्ट विरोधी रणनीति के लिहाज़ से महत्वपूर्ण क्षेत्र था. कश्मीर सोवियत संघ और चीन के बीच स्थित था. अमेरिका कश्मीर विवाद को हवा देता रहा, ताकि पाकिस्तान के ज़रिए उसे वहां अपनी पैठ बनाने का मौक़ा मिल सके. इधर भारत में सांप्रदायिक तत्व सक्रिय हो गए और कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की मांग करने लगे. भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस मांग को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया. महात्मा गांधी की हत्या से भारतीय गणतंत्र के धर्म निरपेक्ष मूल्यों के प्रति शेख अब्दुल्ला की आस्था को गहरा आघात पहुंचा. शेख अब्दुल्ला को भारत की धर्म निरपेक्षता, गांधी एवं नेहरू पर गहरा भरोसा था. गांधी जी की हत्या के बाद कश्मीर का भारत में ज़बरदस्ती विलय कराने के लिए सांप्रदायिक ताक़तों का दबाव बहुत बढ़ गया. इससे भी शेख अब्दुल्ला बहुत व्यथित हो गए. उन्हें ऐसा लगने लगा कि कहीं कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने का निर्णय ग़लत तो नहीं था. उस समय नेहरू लगातार इस बात पर जोर दे रहे थे कि कश्मीरियों का दिल जीतना सबसे महत्वपूर्ण है.

इसके विपरीत छद्म राष्ट्रवादी अनवरत कश्मीर का भारत में बलपूर्वक विलय कराने का राग अलाप रहे थे. सांप्रदायिक तत्वों के बढ़ते शोर से पहले से ही परेशान पंडित नेहरू पर तब दबाव और बढ़ गया, जब शेख अब्दुल्ला ने अमेरिकी राजदूत और चीन से वार्ताएं शुरू कर दीं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को गिरफ़्तार कर जेल में डलवा दिया और यहीं से कश्मीरियों के अलगाव की प्रक्रिया शुरू हुई. इसके बाद अमेरिका के सहयोग एवं समर्थन से पाकिस्तान ने कश्मीरियों के असंतुष्ट वर्ग को हर तरह की मदद मुहैय्या करानी शुरू कर दी. 1980 के दशक में अलक़ायदा के उभरने के साथ ही समस्या और विकट हो गई. अमेरिका द्वारा स्थापित मदरसों में प्रशिक्षित अलक़ायदा के लड़ाकों ने काफिर और जिहाद जैसे शब्दों के अर्थ को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया. इससे कश्मीर समस्या का सांप्रदायिकीकरण हो गया. कश्मीर में इस्लाम के नाम पर राजनीति की जाने लगी. बची-खुची कसर भारतीय सेना ने पूरी कर दी. अतिवादियों को कुचलने घाटी में पहुंची सेना ने कश्मीरियों के रोजमर्रा के जीवन में बेजा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया. निर्दोष मारे जाने लगे. देश की रक्षा के नाम पर सेना क्रूरता करने लगी. सेनाओं की यह सोच होती है कि बंदूक़ ही सत्ता का एकमात्र स्रोत है. जब कोई सेना नागरिक इलाक़े में लंबे समय तक रहती है, तब यह सोच मुसीबत का सबब बन जाती है. सेना की मौजूदगी मात्र से आमजनों में अलगाव का भाव पनपता है. सेना की मनमानी का शिकार अक्सर निर्दोष होते हैं. महिलाएं और बच्चे सबसे ज़्यादा दु:ख भोगते हैं. कश्मीर में सेना द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन और उसकी लगातार मौजूदगी के कारण सामान्य जीवन के पटरी से उतर जाने से आमजन इतने कुंठित हो गए हैं कि वे अपना गुस्सा व्यक्त करने के लिए पत्थर फेंक रहे हैं.

कश्मीर की समस्या जटिल है, जिसका कोई आसान हल दिखाई नहीं देता. इसका एक कारण यह है कि इस मामले से कई पक्षों के हित जुड़े हुए हैं. इनमें शामिल हैं अमेरिका समर्थित पाकिस्तानी सेना, कश्मीर की आम जनता, वहां के अतिवादी, भारतीय सेना, भारत सरकार एवं कश्मीर के राजनीतिक दल और नेता. कश्मीरियों ने अतिवादियों और सेना, दोनों के घोर अत्याचार सहे हैं. उनके दु:ख और व्यथा को समझना ज़रूरी है. संवाद तो आवश्यक है ही, सेना की उपस्थिति भी कम की जानी चाहिए. प्रजातंत्र की जड़ें गहरी की जाएं और कश्मीर के लोगों की मन:स्थिति को सहानुभूति पूर्वक समझा जाना चाहिए. भगवा लबादा ओढ़े राजनेताओं के आक्रामक रवैये से कश्मीरियों के घावों पर नमक छिड़कने के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा. इससे समस्या और बढ़ेगी. कश्मीर में हर स्तर पर प्रजातांत्रिक व्यवस्था लागू की जानी चाहिए और असंतुष्टों की आवाज़ को ध्यान पूर्वक सुना जाना चाहिए. उनका अपमान या विरोध करने से काम नहीं चलेगा, इससे कश्मीरियों के कष्ट ही बढ़ेंगे.

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