कितना और क्यों ज़रूरी है मीडिया ट्रायल

मीडिया ट्रायल, इस बहुप्रचारित शब्द को लेकर काफी लंबी-चौड़ी बहस हो चुकी है और अभी भी हो रही है. इसके पक्ष और विपक्ष में ख़ूब सारे तर्क भी दिए जा रहे हैं. दरअसल, किसी भी निर्णय तक पहुंचने से पहले हमें इससे जुड़ी हर एक बारीक़ी और अर्थ को समझना होगा. सबसे पहले सवाल यह उठता है कि मीडिया ट्रायल जैसा शब्द आया कहां से? यह एक नई अवधारणा है या तबसे इसका अस्तित्व है, जबसे चौथे स्तंभ की शुरुआत हुई? कोई यह तर्कभी दे सकता है कि मांग के हिसाब से ही इस दुनिया में कोई चीज अस्तित्व में आती है. इसलिए यदि मीडिया ट्रायल शुरू हुआ तो इसके लिए व्यवस्था में शामिल संस्थाओं की निष्क्रियता या असफलता जैसे तर्क ही सूझते हैं. एक ऐसे व़क्त में, जब अन्य संस्थाएं असफल हो रही हों, तब न्यायपालिका की तरह मीडिया ख़ुद को सामने खड़ा कर अपने तरह से उस शून्य को भरने की कोशिश करता है, जो अन्य संस्थाओं की असफलता की वजह से पैदा हुआ है और इस तरह न्यायिक सक्रियता या मीडिया ट्रायल जैसी अवधारणाओं का जन्म होता है. और हां, मीडिया ट्रायल कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि काफी समय से यह चला आ रहा है. दुनिया भर में हुए आंदोलनों या ख़ुद भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रेस की भूमिका को कौन नकार सकता है. या आपातकाल के दौरान प्रेस ने जो भूमिका निभाई, उसे कौन भूल सकता है? इसलिए आज मीडिया ट्रायल जैसा शब्द चौंकाता नहीं है.

ऐसे लोग जो मीडिया में कुछ समय के लिए भी काम कर चुके हैं, उन्हें पता है कि कैसे उन्हें किसी खास ख़बर को करने, न करने या औरों से अलग अंदाज़ में करने के लिए कहा जाता है, ताकि उससे किसी खास गुट के हित या उनके हित, जिससे मीडिया हाउस संबद्ध है, पूरे हो सकें. कई बार मीडिया हाउस विज्ञापनदाताओं को ध्यान में रखते हुए भी किसी खास ख़बर को करने से परहेज करते हैं.

मीडिया ट्रायल का अस्तित्व पारंपरिक न्याय व्यवस्था, ग़ैर सरकारी संगठनों, कई दबाव और हित समूह तथा नागरिक समाज के साथ मिलकर है. मीडिया इनमें से कई संस्थाओं के साथ मिलकर काम करता है. मीडिया ट्रायल आम आदमी की आकांक्षा और जनमत को अभिव्यक्ति देने का एक माध्यम है. मीडिया प्राय: किसी पक्षपातपूर्ण ज्यूडिसियल ट्रायल के समर्थन या विरोध या कार्यपालिका के किसी खास निर्णय के समर्थन या विरोध में आगे आता है. पिछले दिनों कुछ चर्चित न्यायिक या भ्रष्टाचार के मामले मीडिया के माध्यम से ही आम आदमी की नज़र में आए. मीडिया की वजह से ही किसी खास मामले में हुए भ्रष्टाचार की ख़बर आम आदमी तक पहुंची. जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू, रिजवानुर रहमान, शिवानी भटनागर, रुचिरा गिरहोत्रा जैसे मामले या सुकना भूमि घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, आईपीएल में भ्रष्टाचार, कई सारे स्टिंग ऑपरेशन, ये सारे खुलासे मीडिया की वजह से ही संभव हो सके. ये सारे ऐसे मामले हैं, जिनमें मीडिया ने जनता की आवाज़ कार्यपालिका और न्यायपालिका तक पहुंचाई और सफलतापूर्वक कई निर्णयों को बदलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

हालांकि मीडिया ज़्यादातर मामलों में न्यायपूर्ण दिखता है, लेकिन कुछ ऐसे भी मामले हैं, खासकर वे, जो ख़ुद मीडिया हाउसों के हितों से जुड़े हों, वहां मीडिया पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगा है. यह भी आरोप लगता रहा है कि मीडिया अपने व्यापारिक हितों को साधने के लिए एक अलग तरह की पत्रकारिता करने लगा है. कई बार अपने मालिकों के हित का ध्यान रखते हुए कुछ ख़बरें ज़बरन प्लांट कराई जाती है. कभी-कभी तो कोई ख़बर किसी पत्रकार की व्यक्तिगत सोच, उसके पक्षपातपूर्ण व्यवहार और छुपे हित को दर्शाती हुई नज़र आती है. लेकिन दु:खद बात यह है कि मीडिया भावना में बहकर किसी घटना का विश्लेषण करता है या उस पर निर्णय लेता है और इस चक्कर में मामले से जुड़े तथ्य गौण हो जाते हैं.

कभी-कभी किसी एक ही मुद्दे पर अलग-अलग मीडिया हाउस अलग-अलग प्रतिक्रिया देने लगते हैं. इस देश में मीडिया ने एक खास राज्य सरकार की कटु आलोचना की, क्योंकि सत्ता पक्ष के एक विधायक के साथ स्थानीय लोगों ने दुर्व्यवहार किया था. मीडिया ने यह कहकर आलोचना की कि सरकार चक्रवात प्रभावित लोगों के लिए कुछ करने में असफल रही है, इसलिए लोगों का गुस्सा जायज़ है. इस तरह मीडिया ने लोगों के गुस्से को जायज़ ठहराया.

एक बार फिर स्थानीय लोगों ने विपक्ष के एक विधायक के साथ दुर्व्यवहार किया. इस बार फिर मीडिया ने सरकार की आलोचना की. इस बात पर कि सरकार उक्त विधायक को उचित सुरक्षा मुहैया कराने में असफल रही. इस मामले में मीडिया ने लोगों के गुस्से को जायज़ नहीं ठहराया. हालांकि सच्चाई यह है कि उक्त दोनों मामलों में वे लोग ग़लत थे, जिन्होंने क़ानून को अपने हाथ में लिया और विधायकों के साथ बदतमीजी की. इसके लिए उन्हें सज़ा मिल सकती थी, लेकिन मीडिया ने एक मामले में लोगों के गुस्से को जायज़ ठहराया और दूसरे मामले में ऐसा नहीं किया. दोनों ही मामलों में सरकार की आलोचना की गई. यहीं आकर मीडिया की निष्पक्षता और उसे मिला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सवालों के घेरे में आ जाता है. लॉर्ड एक्टन ने सही कहा था कि अधिकार आपको भ्रष्ट करता है और पूर्ण अधिकार आपको पूरी तरह भ्रष्ट करता है. यदि किसी को यह अधिकार मिल जाता है कि वह किसी को गोली मार सकता है तो उससे यह आशा की जाती है कि उसे पता होगा कि किसे मारना है, कब मारना है और कैसे मारना है. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो फिर उसे नियंत्रित करने की ज़रूरत होती है. इसी प्रकार मीडिया को भी ख़ुद ज़्यादा उत्तरदायी बनाने की ज़रूरत है, जब वह अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा हो. बिना उत्तरदायित्व के मिले अधिकार की जांच और इसके इस्तेमाल में सावधानी भी ज़रूरी है. ऐसे लोग जो मीडिया में कुछ समय के लिए भी काम कर चुके हैं, उन्हें पता है कि कैसे उन्हें किसी खास ख़बर को करने, न करने या औरों से अलग अंदाज़ में करने के लिए कहा जाता है, ताकि उससे किसी खास गुट के हित या उनके हित, जिससे मीडिया हाउस संबद्ध है, पूरे हो सकें. कई बार मीडिया हाउस विज्ञापनदाताओं को ध्यान में रखते हुए भी किसी खास ख़बर को करने से परहेज करते हैं. इन्हीं वजहों से मीडिया की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाती है. बरखादत्त का उदाहरण सामने है. मीडिया ट्रायल के साथ एक सबसे बड़ी समस्या यह है कि मीडिया ज़्यादातर हाई प्रोफाइल और चर्चित मामलों में ही दख़ल देता है. जबकि लाखों ऐसे मामले, जिनके लिए आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है, चर्चा में नहीं आ पाते. फिर भी सब यह मानते हैं कि मीडिया ट्रायल एक ऐसी घटना है, जिसका इस्तेमाल समाज के एक बड़े तबके की बेहतरी के लिए किया जा सकता है. आज स्टिंग ऑपरेशन और आरटीआई के समय में सारे नीति निर्माता और सरकारी अधिकारी सतर्क हैं. उन्हें मालूम है कि अब वे ऐसा कुछ नहीं कर सकते, जो कल तक करते आ रहे थे. अब नेता, पुलिस और नौकरशाह सभी पहले से ज़्यादा ज़िम्मेदार हो गए हैं. अबसे पहले यह कोई सोच नहीं सकता था कि कोई मंत्री जेल भी जा सकता है. कोई आईएएस या आईपीएस गिरफ़्तार भी हो सकता है या किसी ताक़तवर नेता को सज़ा भी मिल सकती है. जैसा कि आज के दौर में देखने को मिल रहा है. मनु शर्मा, संतोष सिंह, हरियाणा के पूर्व आईजीपी आर के शर्मा, हरियाणा के ही पूर्व डीजीपी एच के एस राठौर को मिली सज़ा ने तुरंत न्याय दिलाने में मीडिया ट्रायल की भूमिका और प्रभाव को ही साबित किया है.मीडिया से यह उम्मीद है कि वह अपनी ताक़त का विवेक और जवाबदेही के साथ इस्तेमाल करेगा, ताकि बजाय पारंपरिक न्याय व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया की वर्तमान व्यवस्था को बदलने के, यह और आगे बढ़ता रहे और आम आदमी के लिए सुगम बन सके. इसी तरह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है, ताकि वह यह सुनिश्चित कर सके कि मीडिया स्वतंत्रता के अधिकार का बेजा इस्तेमाल न कर पाए.

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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